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नये समय में नए अर्थ ग्रहण करते पुराने शब्द

टॉक्सिक (जहरीला) को ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी ने इस साल का अंतर्राष्ट्रीय शब्द चुना है. ऐसा नहीं है कि सबसे अधिक लोगों ने ऑक्सफोर्ड की साइट पर इस शब्द का मतलब जानने की कोशिश की और इसे छांट लिया गया बल्कि इसका इस्तेमाल राजनीति, पर्यावरण, स्त्री-पुरुष संबंध समेत दुनिया में बहुत सी नई प्रवृत्तियों को अभिव्यक्त करने के लिए भी किया जा रहा है इसलिये इसका चुनाव हुआ.

दूसरे नंबर पर जो शब्द था, वह है ‘टेकलैश‘ यानि तकनीक पर इजारा रखने वाली बड़ी कंपनियों के खिलाफ बढ़ती नाराजगी. दिखाई दे रहा है कि जहर उगलने वालों का दबदबा बढ़ा है और आधुनिक जीवन, तकनीक का धंधा करने वाली कंपनियों का बंधक होता जा रहा है. सहूलियत की ओट में मनुष्य की निजता और सुरक्षा में सेंध लगाकर, व्यापारिक इस्तेमाल शुरू किया जा चुका है. इधर स्त्रियां गर्भवती होती है और उधर उनके मेलबॉक्स में बच्चों के कपड़ों, बेबी फूड और खिलौनों को खरीदने के ऑफर पहुंचने लगते हैं.

करवा चौथ पर श्री टेलीविजन को पत्र

भारतीय भाषाओं में शब्दों को जांचकर समाज की नब्ज़ टटोलने का ऐसा कोई सांस्थानिक चलन नहीं है लेकिन ऐसे नए बनते-बिगड़ते शब्दों की भरमार है जो ज़माने की सूरते हाल सटीक ढंग से बता देते हैं.

भक्त ऐसा ही एक शब्द है जो पांच साल पहले जितना ही सीधा और शक्तिहीन हुआ करता था अब उतना ही जड़बुद्धि, तिकड़मी और हिंसक अर्थ पा गया है. हिंदू धर्म के भगवानों की तरह भक्तों की भी इन दिनों कई कोटियां पैदा हो गयी हैं. धार्मिक भक्तों की एकनिष्ठता को जब व्यंग्य के साथ सामाजिक शक्ति संरचना के संदर्भ में इस्तेमाल किया जाने लगा तब यह ‘चमचा’ और ‘चंपू’ की कतार में आ गया लेकिन उसमें चमचे जैसी तेजी नहीं थी.

मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद इसके जरिए उनके समर्थकों और अचानक अधिक हिंदूवादी हुई भाजपा कार्यकर्ताओं को पहचाना जाने लगा. राजनीतिक कार्यकर्ता का विकास आजादी के लोकतांत्रिक रंगत वाले आंदोलन के साथ हुआ था जो अपनी पार्टी की विचारधारा के प्रचार के साथ जनमत बनाने का काम करता था. अब वह भक्त और ट्रोल के रूप में विचारविहीन लठैत बना दिया गया है जिसका काम खुद सोचना नहीं बल्कि धार्मिक ध्रुवीकरण के लिए डिजाइन किए गए संदेशों को तकनीक की मदद से प्रसारित करना, विरोधियों के लिए गुंडे व अपने नेताओं के लिए लिए चारण की भूमिका निभाना भर रह गया है. ‘भक्त’ के जरिए लोकतांत्रिक राजनीति की पतन यात्रा को अच्छी तरह समझा जा सकता है.

पहले देहात में फेंकू, बहोरन, कतवारू ऐसे लोगों के बच्चों के नाम हुआ करते थे जिनके बच्चे जन्म के बाद मर जाया करते थे. माना जाता था कि ऐसे नाम रखने से मृत्यु भी जुगुप्सा से भरकर उन्हें बख्श देगी. इन सबमें ‘फेंकू‘ सबसे भाग्यशाली निकला जो वर्तमान प्रधानमंत्री का पर्याय बन गया है.

असंभव चुनावी वादे करने वाले नेताओं की पहले भी कमीं नहीं थी लेकिन उनकी बाजीगरी को महज़ झूठा कहकर संतोष कर लिया जाता था. पिछले पांच सालों में असाधारण चमक और नाटकीयता के साथ सपने दिखाने, अपनी रौ में बहकने, भ्रम फैलाने और एतिहासिक तथ्यों का धड़ल्ले से अपने पक्ष में विकृत इस्तेमाल करने की महीन कारीगरी को ‘फेंकू’ के अलावा शायद और किसी तरह व्यक्त नहीं किया जा सकता था.

मीटू इज स्वीटू

समकालीन राजनीति की एक और कारीगरी ‘फेक न्यूज’ के साथ ध्वनि और अर्थ की प्रचंडता ने अनायास इसे और भारी बना दिया है. ऊंची हांकना, फेंकना और लपेटना पहले से प्रचलित शब्द थे लेकिन फेंकू ने इस दौर में वह मुकाम हासिल किया है जो आने वाली कई पीढ़ियों तक बड़बोले नेताओं पर चिपकता रहेगा.

पप्पू‘ इससे जरा पुराना शब्द है जो राहुल गांधी की अनुभवहीनता और अपरिपक्वता को कई गुना फुलाकर मूर्खता के पर्यायवाची के रूप में भक्तों के द्वारा बेतरह इस्तेमाल किया जाता रहा है. राफेल घोटाले के बाद राहुल गांधी ने एक नया तेवर पाया है, पहले की तरह उनकी आक्रामकता निशाने से बहक कर व्यर्थ नहीं जा रही है लिहाजा ‘पप्पू’ अब अपना अर्थ खो रहा है.

जिस तरह राजनीति का यथार्थ से संबंध टूटा है और वह इवेंट मैनेजमेंट बनती जा रही है उससे लगता है आने वाले दिनों में फेंकुओं और पप्पुओं दोनों की आपूर्ति में कमीं नहीं होने पाएगी.

जुमला, छप्पन इंची, सर्जिकल स्ट्राइक, एंटीनेशनल, असहिष्णु, गौगुंडे, मुसंघी कई ऐसे शब्द हैं जो पिछले पांच साल में बदली राजनीति का सटीक पता देते हैं और राजनीति के दायरे से बाहर निकल कर समाज में बहुत दूर तक चले गए हैं. इनमें सबसे प्रमुख सेल्फी है जो सामान्य मनुष्य के अकेलेपन, आत्ममुग्धता और अलक्षित रह जाने के दुख को हाहाकारी ढंग से ध्वनित करता है.

(मीडिया विजिल से साभार)

असमय राग जैजैवंती की मोहिनी तान

 

अनेक मीडिया संस्थानों में महत्वपूर्ण पदों पर अपने काम का लोहा मनवा चुके वरिष्ठ पत्रकार अनिल यादव बीबीसी के ऑनलाइन हिन्दी संस्करण  के लिए नियमित लिखते हैं. अनिल भारत में सर्वाधिक पढ़े जाने वाले स्तंभकारों में से एक हैं. यात्रा से संबंधित अनिल की पुस्तक ‘वह भी कोई देश है महराज’ एक कल्ट यात्रा वृतांत हैं. अनिल की दो अन्य पुस्तकें भी प्रकाशित हैं.

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