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जन्मदिन की शुभकामनायें जिम कॉर्बेट साहब

जेम्स ए. जिम कार्बेट (25 जुलाई 1875-19 अप्रैल 1955)

जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क से दुनिया भर के लोग भली भाँति परिचित हैं. इस पार्क को यह नाम जेम्स एडवर्ट जिम कॉर्बेट से मिला. (Edward James Corbett)

देश के इस पहले नेशनल पार्क की स्थापना 8 अगस्त 1936  को ‘हेली नेशनल पार्क’ के तौर पर की गई थी लेकिन 1956 में प्रकृति प्रेमी जिम कॉर्बेट के प्रति सम्मान ज़ाहिर करते हुए इस पार्क का नाम जिम कॉर्बेट नैशनल पार्क रखा गया. आइए जानते हैं कि जिम कॉर्बेट के बारे में—

जिम कॉर्बेट का जन्म आज ही के दिन, यानी 25 जुलाई 1875 को में, नैनीताल में ही हुआ था. उन्हें पर्यावरण संरक्षक के रूप में जाना जाता है. जिम को ब्रिटिश इंडियन ऑर्मी में कर्नल की रैंक प्राप्त थी. जिम का निधन 19 अप्रैल 1955 को केन्या में हुआ था. उन्हें पर्यावरण और पशु-पक्षियों से काफी लगाव भी था. पहाड़ और जंगल से गहरे लगाव की वजह से वह जानवरों को उनकी आवाज से पहचान लेते थे.

जिम कॉर्बेट शिकारी होने के साथ ही एक बेहतरीन लेखक थे. उन्होंने अपनी शिकार कथाओं के साथ ही जंगल की समझ देतीं मशहूर किताबें लिखीं. शिकार के दौरान कॉर्बेट ऐसे पेड़ के नीचे सोते थे, जिस पर लंगूर हों क्योंकि उन्हें पता था कि आदमखोर बाघ अगर आया तो लंगूर चुप नहीं रहेंगे. कभी वे भैंसों के बाड़े में जाकर रात में झपकियां लेते थे, क्योंकि आदमखोर की आहट दूर से ही भांपकर भैंसों में भी हलचल होती है.

कॉर्बेट के कुछ चुनिंदा, दिलचस्प और खास प्रसंग

साल 1906 की बात है, जब कॉर्बेट की एक शिकारी के रूप में विलक्षण प्रतिभा के चर्चे दूर-दूर तक हो रहे थे. तब उनके एक शिकारी दोस्त ने उन्हें एक शिकार के लिए प्रेरित किया. यह शिकार लोगों के भले के लिए किया जाना था. चंपावत टाइगर भारत-नेपाल की सीमा में 200 ग्रामीणों की मौत का कारण बन चुका था. जब तक इसे निपटाया गया यह आदमखोर बाघिन भारत में ने 234 जानें ले चुकी थी. इस आदमखोर बाघिन का शिकार करने में सेना के शिकारियों सहित कई शिकारी नाकाम रह चुके थे.

कई चर्चाओं के बाद कॉर्बेट ने मंत्रालय से संपर्क किया और बंगाल टाइगर प्र​जाति की चंपावत की आदमखोर बाघिन शिकार के लिए अपनी पेशकश और शर्तें रखीं. पहली, कि उस बाघिन के शिकार पर रखा गया इनाम हटाया जाए. दूसरी, सारे शिकारियों को जंगल से वापस बुलाया जाए. मंत्रालय राज़ी हुआ. कॉर्बेट को उस शेरनी की निगरानी में कुछ महीनों का समय लगा और तब तक वह बाघिन लोगों को शिकार बनाती रही. फिर कॉर्बेट की गोली ने उसका शिकार कर लोगों में फैला आतंक दूर किया.

जिम कॉर्बेट के शिकार के कई किस्से किंवदंती बन चुके हैं. पवलगढ़ टाइगर की बात हो या चौगरथ शेरनी की, कई कुख्यात आदमखोर बाघ-बाघिनों के शिकार का श्रेय कॉर्बेट के खाते में गया और शिकारी के रूप में उनकी कीर्ति की वजह बना. कुछ किताबों में इस तरह का ज़िक्र मिलता है कि कॉर्बेट एक या दो सहयोगियों और एक बंदूक के साथ जंगल में घुस जाते थे फिर  आदमखोर के शिकार के लिए लंबा इंतज़ार करते थे. कई सहयोगी और स्थानीय लोग उनके इस जोखिम के कायल हुए बगैर नहीं रह पाते थे. यह भी दिलचस्प है कि कॉर्बेट अक्सर लोगों की जान बचाने के लिए शिकार करते थे और कोई रकम नहीं लेते थे. उन्हें सड़क से संसद तक धन्यवाद दिया जाता था.

शिकारी होने के साथ ही कॉर्बेट ने बाघों पर उस समय जो अध्ययन किया था, वह भारत ही नहीं बल्कि दुनिया के लिए भी बहुत नया था. मसलन, चंपावत टाइगर के शिकार के बाद कॉर्बेट ने मुआयना कर यह जानना चा​हा कि वो शेरनी आदमखोर क्यों हो गई थी. तब उन्होंने पाया कि कुछ साल पहले किसी ने उसके मुंह में गोली मारी थी, जिसकी वजह से उसके दांत क्षत-विक्षत हो चुके थे इस वजह से वह जंगल में सामान्य रूप से जीवों का शिकार नहीं कर पा रही थी.

बाघों के बर्ताव, उनके संरक्षण और प्रकृति यानी जंगल के बाकी जीव जंतुओं को लेकर उनके अध्ययन ने कई परतें खोलीं और यह जागरूकता भी फैलाई कि किस तरह वन्यजीवों का संरक्षण किया जाना चाहिए और यह क्यों ज़रूरी है.

जब नैनीताल की सीमा में तत्कालीन व्यवस्था ने भारत के पहले नेशनल पार्क यानी हेली नेशनल पार्क की स्थापना की, तब उसके पीछे कॉर्बेट का बड़ा सहयोग और नज़रिया था. कॉर्बेट के इस कदम से उनके कई शिकारी दोस्त नाराज़ भी हुए, क्योंकि उन्होंने शौकिया शिकार को एक तरह से प्रतिबंधित करने का काम करवाया था.

ब्रितानी कवि और लेखक मार्टिन बूथ ने जब जिम कॉर्बेट की जीवनी लिखी तो उसका शीर्षक रखा ‘कारपेट साहिब.’ इसकी वजह यही थी कि वे स्थानीय लोगों के बीच इसी नाम से मशहूर रहे थे. असल में, पहाड़ी लोग उनका नाम ठीक से नहीं बोल पाते थे इसलिए 20वीं सदी की शुरुआत में शेर सिंह नेगी जैसे उनके शिकार सहयोगियों ने उन्हें कारपेट साहिब कहना शुरू किया और धीरे-धीरे जिम कॉर्बेट इसी नाम से लोकप्रिय हो गए.

यह भी दिलचस्प है कि केन्या जाने से पहले कॉर्बेट जो बंदूक शेर सिंह को दे गए थे, वह अब भी कॉर्बेट की अमिट याद के तौर पर शेर सिंह के वारिसों के पास सुरक्षित है.

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Sudhir Kumar

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