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पृथ्वी दिवस पर पिथौरागढ़ के युवाओं द्वारा चलाई जाने वाली हरेला सोसायटी को जानिये

पिथौरागढ़ में पिछले कुछ सालों में आपको जगह-जगह पर स्कूल के बच्चे और उनके साथ 16 से 30 तक की उम्र के कुछ युवा आपको सफाई करते हुए कहीं भी कभी भी मिल जायेंगे. पिथौरागढ़ में एक जगह है चंडाक. मुख्यालय से लगभग सात किमी की दूरी पर स्थित चंडाक को जाने वाली सड़क बड़े लम्बे समय से शहर भर के लोगों का शराब या सिगरेट पीने का अड्डा रही है. कुछ साल पहले तक उल्का देवी मंदिर से ऊपर कहीं भी आपको बियर की बोतल, शराब की बोतल, सिगरेट के डब्बे, नमकीन के पैकेट फैंके मिल जाते थे. फिर जब से मार्निंग वाक का हिसाब चला तो घंटाकरण के ऊपर लोगों के घरों के कूड़े के थैले इस सड़क के दाएं-बाएं देखे जा सकते थे. पिछले कुछ सालों में आपको घंटाकरण से चंडाक तक की सड़क लगभग साफ दिखेगी.

ऐसा नहीं है कि कोई हर रोज जाकर यहां सफाई का काम करता है बावजूद इसके यह सड़क साफ है क्योंकि हरेला सोसायटी के वालेंटियर ने लोगों को इतना जागरुक किया है कि लोग सामान्य रूप से कचरा नहीं फैलाते हैं और करने वालों को टोकते जरूर हैं. मजे की बात यह है कि आज भी इस सड़क में शहर भर के कई युवा खुले में शराब पीते नजर आ जायेंगे लेकिन उसके बाद बोतल अपने साथ ले जाना नहीं भूलते. लोगों में इस हद तक जागरूकता फैलाने का काम किया है पिथौरागढ़ के युवाओं की टोली हरेला सोसायटी ने.

हरेला सोसायटी का पूरा नाम हैन्डस अप्लाइंग रिकोन्सिलेसन इकोलॉजी थ्रू लोकल आर्किटाइप्स (Hands Applying Reconciliation Ecology through Local Archetypes) है. पागल लोग, बच्चों को बिगाड़ने वाले लोग जैसे कई नामों से जाने वाली हरेला सोसायटी की टीम फिलहाल बच्चे बिगाड़ने वाले नाम से पिथौरागढ़ में मशहूर हो चुकी है. आज पृथ्वी दिवस (Earth Day) पर पढ़िये हरेला सोसायटी पिथौरागढ़ में किस तरह से काम कर रही है. हरेला सोसायटी के संस्थापक सदस्य मनु डफाली से एक बातचीत – संपादक

टीम हरेला 2018

हरेला सोसायटी का आइडिया कैसे आया?
मेरी पढ़ाई ही पर्यवारण से जुड़ी रही है. देश और विदेश में मैंने पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर काम किया तो ख्याल आया कि जिस जगह के कारण मैंने इतना कुछ सीखा है तो क्यों न पहले उसपर काम किया जाय.

हरेला सोसायटी के लिये पिथौरागढ़ चुनने की वजह?
जैसा मैंने कहा कि मैंने सबकुछ यहीं सिखा यहां के गाड़ गधेरे जिनमें मैंने तैरना सीखा वो सब गायब हो गए तो लगा कि सबसे पहले अपनी ही जगह से शुरुआत करनी चाहिये.

हरेला सोसायटी कैसे बनी इस बारे में कुछ बताईये?
दरसल जब हरेला सोसायटी बनाने की सोची तब पिथौरागढ़ में 300 से ज्यादा रजिस्टर्ड एनजीओ थे जो कागजों पर पर्यावरण संबंधी काम कर रहे थे. जमीनी हकीकत कुछ और थी. हम एक जैसा सोचने वाले कुछ चार-पांच दोस्तों ने मिलकर ही इसे 2012 में बनाया था और पर्यावरण को लेकर लोगों के बीच काम करना शुरू किया.

हरेला सोसायटी के अधिकांश लोग अपने नाम के आगे डफाली शब्द का प्रयोग करते हैं उसका क्या अर्थ है?
ये एक दिलचस्प चीज है. एक हिमालयी पक्षी होता है मोनाल. मोनाल में नर को स्थानीय भाषा में डफिया कहा जाता है. तो पहाड़ों में घुमने वाले पक्षी को डफिया कहते हैं और उसी से एक शब्द डफाली बना. जिसका मतलब है पहाड़ों में घुमने वाला. हम हरेला में घुमने पर बहुत ज्यादा तवज्जो देते हैं कि जैसे किताबों के साथ-साथ हमने घूमना चाहिये. वहीं से मैंने अपने नाम के आगे डफाली शब्द प्रयोग करना शुरू किया और लोगों को भी पसंद आया तो उन्होंने ने भी अपने नाम के आगे डफाली लिखना शुरू कर दिया.

नुक्कड़ नाटक

हरेला सोसायटी ने शुरुआत किस तरह से की?
देखिये, अगर आप सीधा किसी के पास जाकर पर्यावरण की बात करेंगे तो कोई आपकी बात नहीं सुनेगा. इसका एक कारण यह भी है कि हमने अपने पर्यावरण को इतना फॉर ग्रांटेड लिया है कि हम उस पर बात करना तक पसंद नहीं करते. इसलिए हमने शुरुआत में युवाओं के बीच में फोटोग्राफी, पेंटिंग, एक्टिंग, नुक्कड़ नाटक से खुद को जोड़ा और उस बीच उनको बातों-बातों में पर्यावरण से जुड़े मुद्दे भी बताये. जैसे कोई बच्चा फोटोग्राफी सीखेने के लिए आता तो हम उन्हें बताते कि पहले यहां पर एक नदी हुआ करती थी. इन कारणों से यह नदी पूरी समाप्त हो गयी. यहां फला पहाड़ था तो इस तरह से युवा खुद-ब-खुद पर्यावरण में रूचि लेने लगा फिर उनके साथ ही हमने अलग-अलग समय पर पर्यावरण से जुड़े मुद्दे लेकर शहर के लोगों को जागरुक करना शुरू किया.

फोटोग्राफी वर्कशाप

क्या अब भी आप इसी तरह से बच्चों को अपने साथ जोड़ते हैं?
इस तरह के वर्कशाप तो आज भी हम चलाते रहते हैं लेकिन अभी हमारे साथ शहर के लगभग 150 से 200 वालेंटियर जुड़े हैं जिसमें 30 से 40 तो कोर टीम का हिस्सा हैं. अब हम पर्यावरण से जुड़े मुद्दे लेकर स्कूल में भी जाते हैं.

हरेला सोसायटी ने पिछले कुछ सालों में चंडाक की सफाई को लेकर लोगों को काफी जागरूक किया है इसके बारे में कुछ बताईये?
चंडाक पिथौरागढ़ का एक लोकप्रिय व्यू पाइंट रहा है. बहुत पुराने समय से यहां लोग पिकनिक मानने भी आते रहे हैं. हमने घंटाकरण से चंडाक तक करीब दो सौ से ज्यादा बार अपने प्रोग्राम चलाये हैं करीब दो हजार से ज्यादा लोगों ने हमारी इसमें मदद भी की है. लोगों में इसका काफी असर भी दिखता है.

हरेला सोसायटी अभी कहां-कहां काम कर रही है?
फिलहाल हम मुख्य रूप से पिथौरागढ़ शहर में ही काम कर रहे हैं. हमने इसके अलावा हैदराबाद, दिल्ली फ्रांस जैसी जगहों पर भी काम की कोशिश की है.

क्योंकि आप बता रहें हैं कि आप फ़िलहाल पिथौरागढ़ शहर में काम कर रहे हैं वहां दो प्रमुख समस्या पानी और वेस्ट मैनेजमेंट की है. हरेला सोसायटी ने अब तक इस पर क्या काम किया है?
यह बड़ा दुर्भाग्य है कि अपना एक मानसून और नियमित वर्षा होने के बाद भी पिथौरागढ़ में पानी की समस्या रही है. हमने कभी पिथौरागढ़ में पानी सुरक्षित करने की नहीं सोची. हमेशा ईधर-उधर से जुगाड़ कर पानी की समस्या को हल का वैकल्पिक समाधान ढूंढा कभी पूर्ण समाधान के बारे में नहीं सोचा. सीधे तौर पर पानी की समस्या को हल करने वाला तो नहीं पर पानी से जुड़ा हुआ एक प्रोग्राम रिवर वाक हरेला सोसायटी चला रही है. जिसमें हम युवाओं को पुराने गाड़-गधेरों के किनारे चलाते हैं और उनको बताते हैं कि कैसे वाटर सोर्स रिचार्ज होते हैं. वेस्ट मेनेजमेंट पिथौरागढ़ शहर की नहीं बल्कि सभी उभरते हुए कस्बों और शहरों की एक बड़ी समस्या है. यहां के गाड़-गधेरों में शहर भर का कूड़ा फेंका जाता है. नैनीपातल को नगरपालिका ने डम्पिंग जोन बना दिया है जिसकी बजह से उसके नीचे आने वाले सभी गावों का पानी खराब हो गया है. हमने प्रशासन को इस संबंध में कई बार प्रपोजल भेजें हैं. हमने कई सारे वेस्ट से काम के सामान बनाए हैं इस साल हमने प्लास्टिक बोतल को अपसाईकल कर उसकी रस्सी बनाने का एक काम किया. दीवाली में लाइट्स आदि बानने जैसे कई अपसाईकल गुड्स प्रोग्राम हमने चलाये.

जुगनू लाईट

रिवर वाक प्रोग्राम क्या है?
इस प्रोग्राम में हम बच्चों को पिथौरागढ़ की नदी जो अब छोटे-छोटे गधेरे रह गए हैं उनके किनारे ले जाते हैं. जैसे रई गाड़ है हम बच्चों को उसके किनारे-किनारे उसके बारे में बतालते हुए ले चलते हैं कि इस नदी का पुराना नाम क्या था पहले इसमें कितना पानी था किन वजहों से इसमें इतना कम पानी हुआ. कैसे ये आस-पास के लोगों के जीवन को प्रभावित करती है. हम नदी के किनारों की सफाई की कोशिश भी करते हैं.

रिवर वाक

हरेला सोसायटी और कौन से प्रोग्राम चला रही है?
2017 से अडॉप्ट ए ट्री (Adopt a Tree) हमारा एक प्रोग्राम है. इसमें हम पांच साल के लिए एक पेड़ देखभाल के लिये लोगों को देते हैं. ये पेड़ मुख्यतः जंगली पेड़ होते हैं. हम वृक्षारोपण के नाम पर लाखों के पेड़ लगा देते हैं फोटो खिंचा लेते हैं उसके बाद पेड़ का क्या होता है, कोई नहीं जानता है. पांच साल बाद उन्हें किसी जंगल या खुले स्थान पर लगाया जा सकता है.

अडॉप्ट ए ट्री प्रोग्राम कितना व्याहारिक है?
दरसल अडॉप्ट ए ट्री को एक आदमी के एक पेड़ लगाने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिये. जब आप एक पेड़ को गोद लेते हैं और पांच साल तक अपने पास रखते हैं उसका ख्याल रखते हैं तो आपके और पेड़ के बीच में एक संबंध बन जाता है. पांच साल बाद आप हमेशा जानना चाहेंगे कि मेरे पेड़ के साथ क्या हुआ? 2017 में शुरू हुए इस प्रोग्राम में अब तक 50-60 पेड़ लोग गोद ले चुके हैं. मजे की बात है कि उनमें से कुछ एक के पिछले दिनों फोन आये थे कि हम मांफी चाहते हैं हम आपका पेड़ वापस नहीं कर सकते क्योंकि इसे अब हम अपने ही घर में रोंप रहे हैं.

दीपेन्द्र महर द्वारा बांज का पेड़ गोद लिया

नेचर ट्रेल (Nature Trail) प्रोग्राम के बारे में बताइये?
नेचर ट्रेल प्रोग्राम के तहत हम बच्चों को उन्हीं के आस-पास के जंगल या पेड़ पौधों के बीच में ले जाते हैं. उन्हें उनके बारे में बताते हैं और फिर अंत में पन्द्रह मिनट के लिये बच्चों को एक-एक पेड़ को गले से लगाने और उनसे बात करने को कहते हैं.

पेड़ों से बातचीत से क्या होता है?
पर्यावरण और हमारे बीच एक प्रकार का संबंध होना जरुरी है और यह संबंध तब जाकर ही बन सकता है जब हम उसके करीब जायेंगे. बच्चे जब तक पेड़-पौंधों के बीच जायेंगे नहीं तब उनको समझेंगे कैसे? हमने कई बच्चे ऐसे देखें हैं जो प्रोग्राम के शुरुआत में बिलकुल हमारी बात नहीं सुनते शैतानी करते रहते हैं लेकिन पन्द्रह मिनट पेड़ के साथ अकेले बिताने के बाद हमने कई बच्चों को रोते हुए तक देखा है. हालांकि मुझे भी कभी समझ नहीं आता कि ऐसा क्या ख़ास होता है इन पन्द्रह मिनटों में लेकिन जो ख़ास होता है उसे आप बच्चों के चेहरे में देख सकते हैं.

इसके अलावा हरेला सोसायटी क्या करती है?
हम पर्यावरण से जुड़े मुद्दों पर रेगुल्यर बेसेस पर लोगों को जागरूक करते हैं. हम स्कूलों में जाकर बच्चों को जागरूक करते हैं. इसमें लोगों को वन पंचायतों के बारे में बताना उनके अधिकारों के बारे में बताना भी शामिल है. इसके अलावा हम कोशिश करते हैं कि लोगों को स्थानीय स्वरोजगार भी उपलब्ध हो जैसे होली के समय में हम नेच्यूरल कलर बनाते हैं.

बुरांश से बनाया गया होली का रंग

हरेला सोसायटी का अगला उदेश्य क्या है?
हमारा उदेश्य हमेशा पर्यावरण संरक्षण रहेगा. फिलहाल हम एक गांव को गोद लेने की सोच रहे हैं जिसे पर्यावरण माडल के रूप में विश्व के सामने रखा जा सके.

हरेला सोसायटी की ओर से कोई सन्देश?
यह सुनने में बहुत निराशावादी और अजीब लगता है लेकिन एक बात हम सबको ध्यान में रखनी चाहिये कि अगर आने वाले दो से तीन सालों में पर्यावरण को बचाने के लिए हमने कुछ भी नहीं किया तो उसके बाद हम कुछ करने लायक भी नहीं रह जायेंगे.

मनु डफाली

शुक्रिया मनु आपको और आपकी टीम को काफल ट्री की टीम की ओर से अनेक बधाईयां.
शुक्रिया.

– गिरीश लोहनी

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Girish Lohani

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