हैडलाइन्स

नौकरशाहों के लिये पर्वतीय इलाकों में तैनाती मतलब सजा है

उत्तराखंड राज्य बनने से पहले उत्तर प्रदेश सरकारी नौकरशाही शब्दावली में इसका पूरा पर्वतीय पनिशमेंट पोस्ट के रूप में जाना जाता था. इधर सरकारी कर्मचारी ने तेवर दिखाए की उधर लखनऊ से टाइपराईटर की टक-टक उसे पहाड़ पटक देती. उत्तराखंड राज्य बनने के बाद यह उम्मीद की जा रही थी कि लखनऊ के टाइपराईटर की गूंज की दहशत सरकारी कर्मचारियों के बीच न रहेगी पर राज्य बनने के 21 साल बाद भी ऐसा लगता नहीं की पहाड़ में नौकरी की दहशत कर्मचारियों के बीच कम हुई है.
(Doctor Nidhi Uniyal Case)

मसलन बीती शाम से उत्तराखंड से जुड़े सभी पेजों पर दो पत्र वायरल हो रहे हैं. एक पत्र में डॉक्टर निधि उनियाल का इस्तीफा है दूसरे में स्वास्थ्य सचिव द्वारा उनका तबादला देहरादून से अल्मोड़ा किये जाने से संबंधित. डॉक्टर निधि उनियाल का आरोप है कि स्वास्थ्य सचिव की पत्नी द्वारा बेअदबी से बात करने के चलते उन्होंने उनका ईलाज करने से मना किया.

डॉक्टर निधि उनियाल ने कहा की वह अपनी ओपीडी में मरीजों का ईलाज कर रही थी तभी उन्हें स्वास्थ्य सचिव की पत्नी को देखने के लिये उनके घर जाने को कहा गया. डॉक्टर निधि उनियाल ने पहले उन्हें अस्पताल आकर दिखाने को कहा पर जब बात नहीं बनी तो वह अपनी ओपीडी छोड़कर स्वास्थ्य सचिव के घर पहुंची वहां स्वास्थ्य सचिव की पत्नी ने अपनी हनक दिखाते हुये डांट फटकार लगाई. डॉक्टर निधि का कहना है कि इस घटना के चलते स्वास्थ्य सचिव ने बदले की करवाई करते हुये उनका तबादला अल्मोड़ा किया. डॉक्टर निधि उनियाल ने मामले को अपने आत्मसम्मान से जोड़ते हुये अपने पद से इस्तीफ़ा दे दिया.

इस प्रकरण के तूल पकड़ने पर में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने मुख्य सचिव को जांच के आदेश दिये जिसके बाद डॉक्टर निधि उनियाल का तबादला फिलहाल के लिये रोक दिया गया है और अपर सचिव की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित की गयी है. वर्तमान में पूरे मामले की जांच चल रही है.
(Doctor Nidhi Uniyal Case)

इस पूरे घटना क्रम में एक बात जो समझ आती है वह यह कि आज भी अफसरों द्वारा पर्वतीय क्षेत्र में नौकरी करने को सजा के तौर पर देखा जाता है. उत्तराखंड की सबसे बड़ी समस्याओं में स्वास्थ्य एक है. पर्वतीय इलाकों में आधे से अधिक पद खाली हैं जिसका एक मुख्य कारण यह है कि पर्वतीय इलाकों में आज भी कोई नौकरी नहीं करना चाहता है.

पर्वतीय क्षेत्रों में बड़े-बड़े मेडिकल कॉलेज, इंजिनियरिंग कॉलेज, पॉलिटेक्निक कालेज, महाविद्यालय खोले गये हैं लेकिन कोई भी स्तरीय शिक्षा देने असमर्थ हैं. स्तरीय उच्च शिक्षा के लिये पहाड़ के बच्चों को आज भी मैदानों का ही रुख करना पड़ता है. पहाड़ के अस्पताल केवल रेफल सेंटर बनकर रह गये हैं. मशीनें होने के बावजूद उन्हें चलाने वाला कोई नहीं है.

उक्त घटना पर अफसरों के इस तरह के रवैये से पता चलता है कि आज भी पर्वतीय क्षेत्रों में सेवा देने के लिये नियुक्ति नहीं की जाती बल्कि सजा देने के लिये नियुक्ति की जाती है. यह केवल स्वास्थ्य विभाग से जुड़ा मामला नहीं है उत्तराखंड सरकार के तमाम विभागों में आज पर्वतीय इलाकों में तैनाती किसी चुनौती से कम नहीं है.
(Doctor Nidhi Uniyal Case)

-काफल ट्री फाउंडेशन

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  • बेशक ऐसा ही है और हो भी क्यों नहीं, जब जुगाड़ू नौकरशाह और कर्मचारी शहरों में गोह की भांति कुंडली जमाकर बैठ जाते हैं तो जिनको पहाड़ों में पोस्टिंग मिलती है वे रिटायर भी वहीं से होते हैं । दूसरे शहर में नौकरी पर भत्ते अधिक और पहाड़ की दुर्गम सेवा में भत्ते तुलनात्मक रूप से बहुत कम तो फिर कोई पहाड़ क्यूं चढ़े ?

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