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इतिहास रावत कौम का अन्तिम हिस्सा – पंडित नैनसिंह रावत की डायरी

तिब्बत का पहला भौगोलिक अन्वेषण करने वाले उन्नीसवीं शताब्दी के महानतम अन्वेषकों में से एक माने जाने वाले मुनस्यारी की जोहार घाटी के मिलम गाँव के निवासी पंडित नैनसिंह रावत के बारे में एक लंबा लेख काफल ट्री पर पहले प्रकाशित हो चुका है. लिख का लिंक यह रहा – पंडित नैनसिंह रावत : घुमन्तू चरवाहे से महापंडित तक

पढ़िए इन्हीं पंडित नैनसिंह रावत की डायरी का अगला भाग.

(पिछले भाग का लिंक: इतिहास रावत कौम का तीसरा हिस्सा – पंडित नैनसिंह रावत की डायरी)

भाग 4: इतिहास रावत कौम

सन 1824 ईस्वी में बाप ने मूरी मां मझली से शादी की जो परगना बमकोट के जुमा गांव का जुमाल राजपूत की बेटी थी सन 1826 ईस्वी में मुझसे बडा भाई समजांग पैदा हुआ और तारीख 21 अक्तूबर 1830 ईस्वी के रोज मुताबिक सम्बत 1887 ईस्वी के छः गते बुधबार के दिन मैं पैदा हुआ सन 1833 ईस्वी में एक बहन जनी जो चरखमियां मंदू जंगपांगी को व्याही गई. सन 1836 ईस्वी में एक भाई पैदा हुआ जिसको मागा नाम रखा गया.

सन 1838 के मई के महीने में मेरी मां परलोक को सिधार गई हम चार पांच लड़के अनाथ हो गये हमारे पर्वरिस के लिये मेरे पिता को फिर एक शादी करनी पड़ी सन 1838 ईस्वी में थोला धपवाल की बेटी पदिमा से शादी की सन 1938 में सौतेली मां से गजराज भाई पैदा हुआ. सन 1841 में कलियान सिंह जनमा.

गरज मेरा बाप 25 वरस तक गोरी पार मोजा भटकुड़ा में रहा सन् 14-57 ईसवी में गोरी पार छोड़ कर मिलम आये सन 1848 में मर गया. बाप के मर जाने पर ततेरा भाई बड़ा मानी बुढ़ा ने चाहा कि लाटा बुढ़ा के हिस्से का माल व मताह जो कुछ लाटा बुढ़ा हार गया था उसके लड़को को दी जावे इस बात पर और ततेरे चचेरे भाइयों देने की न हुई लाचार बड़ा माणी बुढ़ा ने सिर्फ अपनी … ये और भेड़ बकरे दिये लेकिन हमारे परेशानी हाल कों देख कर हमारे ऊपर नजर पवैरिस का रखता रहाकर व्योपार में नफा दिलाता …

समजांग का उमर 23 वरस का था ओर …

लेकिन बेपरवाह होकर खर्च …

हो सिर्फ उधार लेकर पेट भरने से काम था मैं …

निर्वुद्धि था एक रोज मेरी सौतेली मां ने मुझमें …

लिये आज्ञा दी मैंने उनका कहना तों न माना बल्कि नाराज होकर सन 1851 ईसवी के जुलाई महीने में मिलम से निकला मुनस्यारी दानपुर बधाण इरानी पाना होतां हुआ जोशीमठ क राह बदरीनाथ जा पहुंचा …

(उक्त वाक्यों के शेशांष मूल प्रति से लुप्त हैं.)

बदरीनाथ के उतर पास माणा गांव का …

मरदे ने अपना छोटा भाई निरोला की बेटी उमती के साथ मेरी शादी कर दी. तीन बरस तक में माणा में रहा …

अमरदेव की लड़की लाटी मेरे ततेरा भाई बड़ा माणी बुढ़ा को ब्याही थी. मैं अमरदेव के घर रहता था. अमरदेव ने मुझसे यह ठहरा लिया था कि नैन सिंह बराबर मेरे घर में रहे. जो कुछ मिराम मेरा और मेरे भाई का है नैन सिंह को मिले. अमरदेव मालदार आदमी था उसके घर आनन्द से रहता था लेकिन ससुर घर में रहना सबब गैरती का जान कर सन 1854 ईस्वी के मार्च महीने में कबीले19 को साथ लेकर गढ़वाल …
… उस वक्त मेरे कबीले की उम्र 13 वरस कीं थी. यद्यपि मेरे घर आने से सौतेली मां व भाई वगैरह सब सब को खुशी हासिल हुई लेकिन किसी तरह का रोजगार न होने से बेचैन थे.

गढ़वाल से आकर मैं कुल 10 दिन तक घर में रहना पाया भाई को सलाह बमूजिव 600 रु0 …

तारीख 15 अप्रेल सन 1854 ईस्वी को …

धमसकतू वगैरह व्योपारियों के साथ भेड़ बकरी और …

को टिहरी मसूरी … होता हुआ चम्बे के देश … को गया कुछ …

में खरीदा इस … गांव में कई देवांलय बने हैं जिसमें मूर्ते अच्छे बने हैं और गांव से पूर्व ओर एक बड़ी ऊंची पहाड़ का श्रृंग है उसी को वहां वाले मदमहेश्वर भीमदेव कहते हैं उसी मटंग के दामन पर एक झील है वरसाल के दिनों यहां पर बहुत ही लोग मदमहेश्वर के दर्शन को आते हैं लोग इस मुल्क के … कलायें ब्राह्मण राजपूत डूम तीन जात के होते हैं और ऊनी पटके बड़े धरदार खुले अस्तीन के अंगे और टोपी भी ऊन के पहनते कमर में एक काली ऊन की रखी लपेट रखते हैं औरते भी ऊनी अंगे पहनती लेकिन मर्दों की तरह घेरदार खुली आस्तीनों को नही पहनते सिर में चादर ओढ़ती पायजामा या लहंगा नहीं रखती और डूम जाति से लेकर ब्राह्मण, तक सब जात के औरत मर्द शराब बहुत पीते अक्सर भेड़ बकरी बहुत पालते ऊनी मदू और कम्बल इस मुल्क में उम्दे बनते हैं इस मुल्क के भेड़ हर साल हजरहा कुमाऊं गढ़वाल के तर्फ बेचने को लगाते … बान लोगों में भी हन्हीं के भेड़ पसंद किये जाते … ब्रह्मोर से चेकिया का जोत$यानी हिमालय टप कर तीन दिन के राह चन्द्रभागा नदी … पर त्रिलोकी नाथ का मन्दर देखा यह मन्दर हिन्दुस्तान के तौर तामीर है लेकिन मूर्ति बुध का संगमरमर का बना है पूजा तिब्बत के तरीके पर किया जाता बलके पुजारी एक लामा मुकर्रर है और मन्दिर के भीतर बुध के पास एक बड़ा भारी चराग रातोदिन बराबर जलता रहता है जिसमें पन्द्रह सेर तक घी समा सकता है हमेशह यह चेराग घी से भरा रहता है मैंने त्लिोकनाथ से लेकर लावल के केलिंग में लिंग गांव के बीच 350 तक भेड़ बकरे 10 सुरागायों समेत पाराल्वाला पहाड़ टप कर पीती के मुल्क होता हुआ सुमगिल इलाके तिब्बत के भुतभुत ल्हा पहाड़ टप कर हुमरती खम्पा लिंग श्यांग चाफिढां दुखार के राह … थेलिंग आया थोलिंग में मुदे अमरदेव मार्छा मिला उसके घर से चुपके से निकल आने के विशय में उसने मुझे बहुत लानत किया में उसके सामने बहुत लज्जित हुआ निदान एक घोड़ा नजर देकर कुछ रुपये देने के हकराक करके राजी किया.

ऐसी बदकिस्मती कि इस बीच व्योपार के भेड़ बकरे जुदू मान रोग से सब मर गये सिर्फ करीब एक सौ तक बचे पूंजी साहुकार का बिलकुल सिर पड़ा हजार बारह सौ रुपये देनदारी में आ गया गुजारा खाने पहनने का मुशकल से होता विरादरी के लोग कोई आदर पूर्वक पेश नहीं आते जेरदारी इतनी कि सूद कदा करना मुशकल था इस बीच मेरी सौतेली मां ने जाना कि कर्ज की जेरदारी साल बसाल बढ़ती जाती है अदाय करज की कोई सूरत नहीं गजराज सिंह और कलियान सिंह अपने दो बालकों समेत हमसे अलग हो गई घर के कुछ अनाज और बरतन थे उसमें से आधा समजांग वगैरह हम तीन भाइयों को दिया.

परिभाषित शब्दों का सन्दर्भ-

1. इख्तियार-अधिकार
2. सिपहसलारा – सेना
3. शिकस्त-पराजय
4. खिदमत – सत्कार
5. तौल-बेगारी के रूप में सवारी घोड़ा उपलब्ध कराना (ति)
6. छोंकल-व्यापार कर (ति)…
7. दस्तूरात – नियम
8. मुनासिव-उचित
9. बमूजिब – के अनुसार
10. थोपदंग-किसी सरकारी अधिकरी अथवा विशिष्ट व्यक्ति के लिये को जनता द्वारा बेगारी के रूप में की जाने वाली भोजन व्यवस्था
11. तिजारत-व्यवसाय
12. अलफाज-उच्चारण
13. सिरगिरोह-मुखिया
14. दिलेरी-साहसी
15. मुतसित-से लगा हूआ क्षेत्र
16. रईत, रिआया-प्रजा
17. निवेड़ा-निर्णय
18. पगड़ी बदलना-समझौता हो जाने पर परस्पर सिर की पगड़ी का आदान-प्रदान करना.
19. काबिल – योग्य
20. मानरोग-भेड़ बकरियों में होने वाली एक संक्रमण की बिमारी
21. जेरदारी-ऋण

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