रेडियो से समाचारों की सनसनी तक का सफ़र

‘ये ऑल इंडिया रेडियो है. थोड़ी देर में आप समाचार सुनेंगे’. शाम के आठ बजते और दादा जी आँगन में लगी चारपाई पर अपने फिलिप्स का रेडियो लेकर समाचार सुनने बैठ जाते. अलबत्ता आंगनवाड़ी में पढ़ने वाले मुझ जैसे लड़के के लिए तब समाचार का कोई मतलब नहीं था. मनोरंजन का कोई साधन न होने के कारण बस रेडियो सुनने की उत्सुकता थी. उस पर भी सेल खर्च हो जाने के डर से दादा जी सिर्फ रात को समाचार सुनने के लिए रेडियो चलाते थे बाकी टाइम किसी को रेडियो में हाथ लगाने की इजाजत नहीं थी. रोज शाम को दादा जी के साथ समाचार सुनने की आदत सी हो गई थी इसलिए खबरों की तो नहीं लेकिन एंकर के प्रस्तुतीकरण की समझ जेहन में याद बनकर बैठ सी गई.

‘नमस्कार, ये आकाशवाणी का नजीबाबाद केन्द्र है. सायं आठ बजे के समाचार के साथ मैं धीरेंद्र (काल्पनिक नाम)’ के संबोधन के साथ शुरू हुए समाचार देश, विदेश व खेल जगत की खबरों के साथ ठीक साढ़े आठ बजे ‘इसी के साथ समाचार समाप्त हुए, नमस्कार’ के संबोधन के साथ समाप्त हो जाते थे. तब समाचार का मतलब सिर्फ खबरों को लोगों तक पहुँचाना होता था. रेडियो एंकर का काम 30 मिनट तक सिर्फ खबरें पढ़ना होता था न कि आज के एंकरों की तरह खबर की खबर लेना. खबरों की भाषा सरल, सटीक व खबर की वास्तविकता लिए होती थी. रेडियो, टीवी की तुलना में मनोरंजन का सस्ता साधन था और समाचार सुनने की पोर्टेबल मशीन भी. रेडियो समाचार के समय फ्रिक्वेन्सी नॉइज के अलावा एंकर शांति पूर्वक ही अपने दायित्व का निर्वहन करते थे.

रेडियो से एक कदम आगे दौर आया टीवी का. जॉली का ब्लैक एंड व्हाइट टीवी एकमात्र चैनल दूरदर्शन के साथ घर में मनोरंजन का दूसरा साधन हो गया था. रेडियो की तरह ही टीवी में भी समाचार का समय शाम को 8 से 9 के बीच हिंदी व अंग्रेजी में निर्धारित था. समाचार का माध्यम जरूर बदल गया था लेकिन एंकरों की भाषा, शालीनता व खबरों की गुणवत्ता रेडियो वाली ही थी. दूरदर्शन के एंकर हिलती हुई स्क्रीन पर सिंगल एंगल के विडियो कैमरा के आगे दिनभर की खबरें पढ़ते और अंत में हाथ जोड़कर नमस्कार के साथ ही विदा लेते. न कोई उतावलापन और ना ही अति-उत्साहिता. इंटरव्यू भी इतने शालीन होते थे कि एंकर और मेहमान शायद ही कभी ऊँची आवाज में बात कर एक-दूसरे की बात काटते हों.

अगला दौर आया कलर टीवी के साथ छतरी-डिश का. अभी तक तो समाचार का साधन रेडियो व दूरदर्शन ही थे लेकिन डिश आने के साथ ही एनडीटीवी, स्टार न्यूज, जी न्यूज, आज तक आदि प्राइवेट न्यूज चैनलों ने टीवी पर दस्तक दे दी. डीडी मेट्रो भी 2003 में डीडी न्यूज में बदल गया. तब के एंकरों की पत्रकारिता में ग्राउण्ड रिपोर्टिंग ज्यादा होती थी और स्टूडियो की कलाकारी कम. हर खबर की ग्राउण्ड रिपोर्टिंग की जाने लगी जो खबरों को विश्वसनीयता देती थी. एंकरों को कार्यक्रम या इटंरव्यू से पहले पढ़कर व नोट्स तैयार कर के आना होता था और विषय पर पकड़ मजबूत रखनी होती थी ताकि मेहमानों से गंभीर प्रश्नों के उत्तर लिये जा सकें.

धीरे-धीरे न्यूज चैनलों की बाढ़ आ गयी. कॉरपोरेट व नेता न्यूज चैनलों के मालिक हो गए. हर चैनल का एक राष्ट्रीय, प्रादेशिक व क्षेत्रीय चैनल लाँच होने लगा. इस तरह देश में कुल मिलाकर 400 से ज्यादा न्यूज व करंट अफ़ेयर्स के चैनल आज की तारीख में मौजूद हैं. खबर दिखाने व खबरों तक पहले पहुँचने की होड़ सी मचने लगी. चैनल कब खबरें सुनाने व दिखाने से खबरें बनाने में उतर आए किसी को पता ही नहीं लगा. ट्राई के नियमों की धज्जियाँ उड़ाते हुए समाचार चैनल आडंबर, धर्मांन्धता, साम्प्रदायिकता और अवैज्ञानिकता फैलाने लगे. ऐलियनों, रहस्यमयी गुफाओं, भूतों, येती, गाय के ऑक्सीजन लेने व छोड़ने पर सकड़ों घंटे चैनलों ने बरबाद किये. पत्रकारिता की मूल अवधारणा का गला घोटते हुए पत्रकार अपनी ही बिरादरी पर छींटाकशी व आरोप-प्रत्यारोप करने लगे.

2019 आते-आते समाचार चैनल एंटी व प्रो गवर्मेंट कहलाने लगे. प्रो-गवर्मेंट एंकरों व चैनलों को अब चापलूस व गोदी मीडिया तथा एंटी गवर्मेंट या सवाल पूछने वाले एंकरों को एंटी नेशनल, कांग्रेसी, सिक्युलर व पाकिस्तान परस्त कहा जाने लगा. न्यूज रूम वार रूम में तब्दील होने लगे जहॉं तू-तू, मैं-मैं से होते हुए बात गाली-गलौज व हाथापाई तक पहुँचने लगी. पेड न्यूज के साथ ही फेक न्यूज का चलन बढ़ने लगा और फेक न्यूज को काउंटर करने के लिए आल्ट न्यूज व न्यूज लौंड्री जैसे कई ऑनलाइन पोर्टल हकीकत बयॉं करने सामने आने लगे. न्यूज रूम में ग्राफिक्स, वीएफएक्स और ऐनिमेशन का इस्तेमाल बढ़ने लगा और इस टेक्नॉलजी की इंतेहॉं यह थी कि बाढ़ की खबर देने के लिए एंकर ग्राफिक्स की मदद से बाढ़नुमा स्टूडियो में खड़े होकर या हाथ में छतरी लिए न्यूज देने लगे. श्रीदेवी की मौत की खबर को बाथ टब में लेटकर कवर करने वाले एंकर आपने देखे ही होंगे और चंद्रयान-2 के विक्रम लैंडर की मून सर्फेस से हमारे एंकरों द्वारा अतंरिक्ष यात्री के भेष में जो खबर पेश की गई उसके तो क्या ही कहने. इसके साथ ही दौर शुरू हुआ ‘मैथड एंकरिंग’ का जिसमें हमारे एंकर खबर की असल लोकेशन में जाकर हुबहू वही करने लगे जिसकी खबर उन्हें दिखानी होती जैसे- योग की खबर के लिए योग करते हुए खबर लोगों तक पहुँचाना.

समाचार अब समाचार न रहकर सनसनी बन चुका है जिसे सुनने से दिमाग सन्न रह जाता है. जो न्यूज चैनल कभी ‘ओपिनियन सीकर’ हुआ करते थे वो अब ‘ओपिनियन मेकर’ बन चुके हैं. आप कब और क्या सोचेंगे यह सब न्यूज चैनल व उनके एंकर तय करने लगे हैं. आपसे जुड़े हर मुद्दे को आज पाकिस्तान, देशभक्ति, राष्ट्रवाद, देशद्रोह, कश्मीर, एलियन, गाय, गोबर आदि न जाने कितने ही बे सिर पैर मुद्दों से डायवर्ट कर दिया जाता है और आपको भनक तक नहीं लगती. भारत का तुलनात्मक अध्ययन 24 घंटे सिर्फ पाकिस्तान से किया जाता है जिसे देख देखकर आप उछलते रहते हैं. आज न्यूज चैनल धार्मिक उन्माद व साम्प्रदायिकता फैलाने का काम करने लगे हैं. टीआरपी के खेल में आज कुछ भी सनसनी खबर के रूप में परोस दिया जाता है जिसे जनता हाथोंहाथ लपक लेती है. साधारण जीवन में चाहे सब कुछ मस्त चल रहा हो लेकिन आधा घंटा आप न्यूज चैनल देख लीजिये तो यक़ीन करने लगेंगे कि कुछ ही दिनों में भारत-पाकिस्तान के बीच परमाणु युद्ध हो जाएगा. इसी बीच एक एंकर प्राइम टाइम में आपको परमाणु बम से बचने के नुस्ख़े भी दे जाएगा.

दुनिया में अगर प्रेस की स्वतंत्रता की बात की जाए तो भारत की रैंकिंग लगातार गिरती ही जा रही है. 2017 में भारत का स्थान 136 था जो 2018 में 138 हो गया और 2019 आते-आते हमारी पत्रकारिता की स्वतंत्रता दो स्थान और लुढ़क कर 140 पर आ गई. आज समाचारों, न्यूज चैनलों व उनके एंकरों पर से लोगों का भरोसा उठने लगा है. लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में जंग सा लग गया है. पत्रकार अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रख चरण वंदना में लीन हो गए हैं. येलो जर्नलिज़्म (सनसनी खबरें देना) अपने उफान पर है. कुछ चैनलों, ऑनलाइन पोर्टलों व अखबारों को छोड़ दें तो बाकी सब किसी न किसी की इच्छापूर्ति में लगे रात-दिन भजन मंडली की तरह गुणगान करते हुए आपका ब्रेनवॉश कर रहें हैं.

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

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Sudhir Kumar

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