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बापू हमें माफ करना

गांधी शख्सियत से ज्यादा एक विचार है जिसे पूरी दुनिया ने पढ़ा और जाना सिवाय उनके अपने देशवासियों के. हमने गांधी को सबसे कम पढ़ा और जाना फिर भी उनके सबसे बड़े आलोचक बन गए. आज का दिन न सिर्फ बापू को याद करने का है बल्कि इस पर मनन करने का भी है कि उनके कितने सपनों को हम साकार कर पाए. स्वच्छता दिवस के रूप में जरूर हम उनके जन्मदिन को मना रहे हैं लेकिन दिमागी रूप से हम गांधी के प्रति कितने स्वच्छ हैं खुद से पूछ कर देखिये. न जाने कितने ही बे सिर-पैर, ऊल-जलूल मैसेज दिन भर गांधी को लेकर सोशल मीडिया में घूमते रहते हैं और हम उन तथ्यों की प्रमाणिकता जाने बिना ही उन्हें अपने जेहन में बिठा कर 10 ग्रुप में आगे और फारवर्ड कर देते हैं.

गांधी और गांधीवादी विचारों का हर वो देश कायल है जिसने अपने यहॉं लड़ाइयां खून-खराबा और रंगभेद देखा है. दुनिया भर की लड़ाइयों ने इंसानी नफरत और मौत के सिवाय कभी कुछ नहीं दिया. उस दौर में गांधी ने अपने अंहिसा, सविनय अवज्ञा और असहयोग आंदोलन से अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी. गांधी के विचारों को लेकर चले नेल्सन मंडेला ने अहिंसा के दम पर ही दक्षिण अफ्रीका को आजाद करवाया.

भारत की दुनिया में पहचान हमेशा एक अहिंसक देश की रही है और इस सिद्धांत के ध्वजवाहक रहे हैं बापू. लेकिन आजादी के इतने वर्षों बाद भी हम गांधी के किसी भी सपने को पूरा न कर सके. अहिंसा का राग अलापते हुए हम कब हिंसक और मॉब लिंचर हो गए पता ही नहीं चला. बापू की सत्य बोलने की सीख को कब झूँठ बोलने और अफवाह फैलाने वाली आईटी सेल और सोशल मीडिया ने दरकिनार कर दिया इसका पता भी हमें नहीं चला. पतित पावन सीताराम गाने वाले गांधी के देश में हमने पतित को पावन करने की जगह उसका पतन करना प्रारम्भ कर दिया. हमने गांधी को अपनी आवश्यकतानुसार इस्तेमाल किया है और कदम-कदम पर उन्हें सिर्फ धोखा दिया है.

आज बापू की 150वीं जयंती को स्वच्छता दिवस के रूप में मनाते हुए सबसे पहले हमें अपने दिमाग में बापू के प्रति भरे कूड़े को साफ करना चाहिये और उनके बारे में अधिक से अधिक पढ़ने का वादा कर के उनसे माफी माँगनी चाहिये. माफी माँगने के सैकड़ों कारण हैं.

नानकमत्ता (ऊधम सिंह नगर) के रहने वाले कमलेश जोशी ने दिल्ली विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में स्नातक व भारतीय पर्यटन एवं यात्रा प्रबन्ध संस्थान (IITTM), ग्वालियर से MBA किया है. वर्तमान में हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के पर्यटन विभाग में शोध छात्र हैं.

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Sudhir Kumar

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