गायत्री आर्य

मैं लड़के की पैदाइश से होने वाली दंभ भरी खुशी को कुचलना चाहती हूं

4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – 34

पिछली क़िस्त का लिंक:  सच्चा और अच्छा जीवनसाथी मिलना एक लाटरी निकलने जैसा है मेरी बेटी!
मैंने तुम्हें बताया नहीं, डॉक्टर ने मेरी डिलीवरी, यानी तुम्हारे जन्म की तारीख 30 अगस्त से खिसकाकर 25 अगस्त कर दी थी और 25 को ही मुझे एडमिट होने को भी बोल दिया था. लेकिन न तो मुझे कोई परेशानी ही थी, न ही तुम्हारे आने की कोई पूर्व सूचना अपने शरीर में मुझे मिल रही थी, इसलिए मैं मिलट्री हॉस्पिटल में एडमिट नहीं हुई. हालांकि मैं तुम्हारे जन्म का समय पहले से ही अगस्त का अंत न मानकर, सितम्बर का पहला या दूसरा सप्ताह मान रही थी. खैर, अब सितम्बर भी कहां दूर है. (Column by Gayatree arya 34)

सच ये भी है कि मैं काफी घबराई हुई हूं प्रसव पीड़ा के बारे में सोचकर और तुम्हारे आने के बाद की स्थिति को सोचकर भी.

तुम्हारे आने की लगभग सभी तैयारियां हो चुकी हैं. मैं काफी पहले ही हॉस्पिटल ले जाने वाला बैग तैयार करके रख चुकी हूं. अपने दो डार्क कलर के पेटिकोट, एक पुराना गाउन, साबुन, पाउडर, रुई का बंडल. कहते हैं कि बच्चे को होते ही पुराना कपड़ा पहनाते हैं, बल्कि 12 दिन तक पुराने कपड़े ही पहनाए जाएंगे. उसके बाद तेरहवें दिन हम दोनों मां-बच्चा नए कपड़े पहनेंगे. ठीक है? तुम जो कपड़े पहनोगे शुरू में वे तुम्हारी छोटी मौसी के लड़के यानी तुम्हारे भाई के हैं. तुम्हारे लिए तौलिया, 15-20 नैपियां, चार जोड़ी कपड़े, पाउडर, नीचे बिछाने वाले कपड़े सब कुछ रख लिया है बैग में.

मैंने अभी तक ये भी नहीं बताया कि तुम्हारी दादी आ चुकी हैं. बाबा भी आए थे लेकिन वो वापस अपने घर चले गए हैं. दादी तुम्हारे लिए ढेर सारे नैपकिन और नीचे बिछाने वाले कपड़े लाई हैं. रंग, मेरे बच्चे! कुछ दिनों पहले मैंने तुमसे अपनी कुछ दुविधाओं का जिक्र किया था न, एक बहुत बड़ी दुविधा के बारे में मैं आज तुम्हें बता रही हूं. वो दुविधा पढ़कर हो सकता है तुम एक पल को ठिठक जाओ.

ये बात तो तुम अब तक ये खत पढ़कर जान ही जाओगी कि मैं और तुम्हारे पिता तुम्हें एक लड़की ही चाहते हैं. तुम्हें एक लड़की के रूप में चाहने वालों में तुम्हारे मामा-मामी, बड़ी मौसी व नानी भी शामिल हैं. हालांकि नानी खुद उसी दुविधा से गुजर रही है जिससे तुम्हारी मां गुजर रही हैं.ये दुविधा है तुम्हारे लड़की होने को लेकर! हां मेरी बच्ची तुम्हें एक लड़की के रूप में चाहने पर भी, मैं दूसरी तरफ तुम्हारे लड़की होने को लेकर चिंतत भी हूं. पता है क्यों? मैंने तुम्हें बताया था न कि तुम्हारे दादा और पापा में शर्त लगी है, दादा कहते हैं (और सच कहूं तो चाहते भी हैं) कि लड़का ही होगा, पिता कहते हैं (चाहते भी हैं) कि लड़की होगी. दादी ने कभी साफ कहा नहीं है पर उनके मन में भी आग्रह तुम्हारे लड़का होने को लेकर ही है. हालांकि सच ये भी है कि चूंकि तुम ही उन्हें दादा-दादी बनाने वाला पहला बच्चा होगी, तो तुम्हारे लड़की होने पर भी वे प्यार तो तुम्हें करेंगे ही.

सच तो ये है मेरी जान! कि जितनी बार तुम्हारे दादा ने एक गर्व और दंभ में भरकर कहा ‘देख लेना लड़का ही होगा’ उतनी ही बार मैंने और भी ज्यादा शिद्दत से चाहा कि ‘अब तो लड़की ही होनी चाहिए!’ असल में मैं लड़के की पैदाइश से होने वाली दंभ भरी खुशी को कुचलना चाहती हूं. यदि वे सिर्फ बच्चे की खुशी का इजहार करते तो मैं उनकी खुशी में शामिल जरूर होती. पर इस ‘लड़के-लड़के’ की रट ने मेरा दिमाग खराब कर दिया है. पुरूष सत्ता बार-बार जितने भी रूपों में मेरे सामने आती है मैं हर बार उस पर तेल छिड़ककर आग लगा देना चाहती हूं.

पता है अभी दो-तीन दिन पहले रात के खाने के वक्त तुम्हारे पिता ने ऐसा कुछ कहा (तुम्हारे लिए) ‘वो तो ऐसे करेगी.’ मतलब कि उनका संबोधन अपनी बेटी के लिए था. ये सुनते ही तुम्हारे बाबा का गुस्से से भरा रिएक्शन आया ‘शटअप! कभी-कभी चुप भी रहा करो तुम. टेस्ट करा लिया है क्या?’ सुनकर मैं एक पल को ठिठक गई थी. खीज सी हुई मुझे और मैं डर गई भीतर से. मन में लड़की के लिए इतनी नफरत की भावना लेकर कोई प्यार कैसे कर सकता है भला? मजबूरी का प्यार ही होगा न वो.

रंग, मेरी बच्ची! यहीं से मेरी दुविधा जन्म लेती है. यदि तुम लड़की ही हुई, तो जल्दी ही एक लड़का पैदा करने का दबाव मेरे ऊपर पड़ेगा और ये कोई छोटा-मोटा या हल्का-फुल्का दबाव नहीं होगा. मेरी दूसरा बच्चा पैदा करने की कोई ख्वाहिश नहीं है, मातृत्व का सुख मैं बस तुम्हें ही पैदा करके लेना चाहती हूं. दोबारा इस ‘सुख’ को बर्दाश्त करने की हिम्मत मुझमें नहीं है. हां लेकिन मैं तुम्हारा भाई या बहन गोद जरूर लेना चाहूंगी. हालांकि तुम्हारे पिता तो दूसरे बच्चे के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं, कम से कम अभी तक तो नहीं. यदि तुम लड़का हुए तो समझो कि मैं दूसरा बच्चा यानी लड़का पैदा करने के दबाव से मुक्त हो गई! दूसरे बच्चे का दबाव तो तब भी होगा लेकिन तब वो दबाव उतना जानलेवा नहीं होगा. इसलिए अपनी मुसीबत कम करने के लिए कई बार मेरे मन में ये भी आया कि पहली ही बार में लड़का हो जाए, तब कम से कम दूसरा बच्चा (लड़का) पैदा करने के दबाव से तो मुक्त हो जाऊंगी मैं!

सिर्फ इसी कारण से ही तुम्हारी नानी भी चाहती हैं कि लड़का हो जाए, तो उनकी बेटी कि, यानी मेरी जान छूटे! तुम्हारे बाबा की बेटे की इतनी प्रबल चाहत के चलते और भविष्य में लड़के के लिए मुझ पर पड़ने वाले दबाव को सोचकर, एक दिन तुम्हारी नानी ने मुझसे कहा, ‘लड़का हो जाए तो तेरी मुसीबत थोड़ी कम हो जाए. अबसे पहले मेरे दिमाग में कभी नहीं आया कि लड़का होना चाहिए. सच बताऊं तो अब कुछ मांगते ही नहीं बन रहा, कि लड़का हो या लड़की.’

मेरे बच्चे सोचो जरा, इतनी शिद्दत से बेटी की कामना करने वाली मां भी अंततः लड़के के लिए पड़ने वाले दबाव के चलते पहली बार लड़का ही चाहने लगी. सच में कितना दुविधा भरा है बेटा या बेटी चाहना और फिर सुनना ये पड़ता है कि ‘औरत ही औरत की दुश्मन है.’ मांएं ही लड़कियां नहीं चाहती, उन्हें मार देती हैं, बेटे के लिए मरती रहती हैं.’ तुम्हीं बताओ जरा, इतने सारे दबावों के चलते मां कैसे मांगे बेटी? जो मांएं बेटी पैदा होने पर बच्चा बदलने की बात करती हैं. सारी दुनिया ऐसी मांओं को गाली देती रहती है. लेकिन तुम्हीं बताओ बेटू, मां कहां जिम्मेदार है इस सबके लिए? खानदान या वंश बढ़ाने के लिए सारी चाहतों के बीज तो बाप और सास-ससुर में पड़े होते है, लेकिन बदनामी हम मांओं (लड़कियों) के जिम्मे ही आनी है! मन करता है बेटियों से इतनी नफरत करने वालों को घर में एक भी बेटी, बहू, मां, पत्नी, नहीं होनी चाहिए. मरें सब के सब लड़कों को ही देख-देख के.

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उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.

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Sudhir Kumar

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