फोटो: सुधीर कुमार
4G माँ के ख़त 6G बच्चे के नाम – तेरहवीं क़िस्त
पिछली क़िस्त का लिंक: इंसान के बच्चे को मारकर खाने से कम क्रूर है पशु को मारकर खाना?
पिछले कई दिनों से मैं परेशान और उलझन में थी, मुझे पीरियड्स नहीं आ रहे थे. यानी कि मैं प्रेगनेंट हो चुकी हूं. हालांकि ये अभी भी एक अनचाही प्रेगनेंसी ही होगी. पर ये बात मैं तुम्हें पहले भी बता चुकी हूं, कि अब मेरे पास तुम्हें पैदा करने से अलग कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं. हम एक ऐसे समाज में जीने को अभिशप्त हैं, जहां (खासतौर से लड़कियों का) जीवन दूसरों द्वारा ज्यादा नियंत्रित होता है. मुझे क्या करना है? क्या सोचना है? क्या पढ़ना चाहिए, क्या नहीं? क्या पहनना चाहिए, क्या नहीं? जीवन में क्या करना चाहिए, क्या नहीं? कहां जाना चाहिए, कहां नहीं? शादी कब करनी है? किससे करनी है, किससे नहीं? बच्चे कब और कितने पैदा करने हैं? (इसमें बच्चे नहीं पैदा करने का विकल्प भी शामिल है.) ये सब तुम खुद नहीं तय कर सकती मेरी जान. ये सब परिवार तय करता है. जहां तुमने बने-बनाए नियमों को तोड़ा, वहीं तुम्हें सबकी उपेक्षा, घृणा, गुस्से का शिकार बनना पड़ेगा. ये बात सिर्फ अजीब ही नहीं है बल्कि बेहद बुरी है. मुझे सख्त नापसंद है अपनी संस्कृति का ये हिस्सा
मैं और तुम्हारे पिता, जिन्हें कि तुम्हें पैदा करने, तुम्हारी देखभाल करने से लेकर, तुम्हारे खाने-सोने, पढ़ाई, बीमारी… हर चीज करनी है; अभी बच्चा नहीं चाहते. लेकिन तुम्हारे दादा-दादी, नानी और भी पता नहीं किस-किस का दबाव हमारे ऊपर है, तुम्हें पैदा करने के लिए. तुम्हारा अभी तक इस दुनिया में न आना, पता है कितने लोगों की चिंता का विषय है, शायद तुम्हें सुनकर हंसी आए. एक हैं तुम्हारे बाबा के बड़े भाई की पत्नी, जिन्हें तुम्हारे अभी तक पैदा न होने की चिंता है. इनसे मैं सिर्फ एक बार मिली हूं, वह भी कुछ पलों के लिए. एक दूसरी हैं तुम्हारे बाबा की बहन की बेटी, ये तो शादी के एक साल बाद से ही इस बात को लेकर चिंतित थी, कि अभी तक मुझे बच्चा क्यों नहीं हुआ. इनसे तो मैं अभी तक मिली भी नहीं हूं. एक और हैं मेरे गांव में मेरी एक मुंहबोली दादी. उन्होंने भी मेरी मां से कहा, कि मुझे बच्चा पैदा करने के लिए समझाएं.
किसी नवआगंतुक के जन्म पर आस-पड़ोस, परिवार, रिश्तेदारों का (जो कि हमें प्यार करते हैं) का खुश होना तो समझ आता है. लेकिन बच्चा पैदा करो, पैदा करो, पैदा करो का दबाव डालने वाला राग समझ में नहीं आता. ये निर्णय तो सिर्फ बच्चे के मां-बाप का और उनमें भी अंतिम निर्णय तो सिर्फ और सिर्फ मां को होना चाहिए न मेरी बच्ची? कि वह बच्चा पैदा करना चाहती है या नहीं और चाहती है तो कब और कितनी बार? आखिर सारी ऊर्जा, सारा समय तो औरत का ही खर्च होता है न, कैरियर तो उसका दांव पर लगता है न.या फिर ऑफिस और बच्चे के बीच में, बच्चे को कम समय दे पाने का गिल्ट तो मां को ही झेलना है न, बाप को तो नहीं!
प्रेगनेंट होने और न होने की इसी पसोपेश में मैं काफी डिप्रेस थी कल. उसी वक्त मैंने अपने एक बहुत अच्छे दोस्त से बात की. वो मुझे एक ही बात समझाता रहा, ‘किसी के दबाव में आकर बच्चा पैदा मत करो, जब तक तुम नहीं चाहती मत पैदा करो, तुम दोनों की सहमति सबसे जरूरी है और तुम्हारी तो सबसे ज्यादा. यदि तुम ही दिमागी रूप से तैयार नहीं होओगी तो बहुत परेशानी होगी. तुम प्रेगनेंसी के दौरान ही डिप्रेशन में चली जाओगी और इसका बच्चे पर बहुत बुरा असर पड़ेगा. तुम अंदर से तैयार नहीं होओगी तो शरीर में जो हार्मोनल चेंज होने हैं, उन पर गलत असर पड़ेगा, कम से कम बच्चा पैदा करने के लिए तो तुम्हारा सिर्फ और सिर्फ एक ही निर्णय होना चाहिए, दोहरी मानसिकता तुम्हारे और बच्चे दोनों के लिए खतरनाक होगी.’
लेकिन उसके बहुत समझाने के बाद भी मेरे पास तुम्हें पैदा न करने का विकल्प नहीं था. ये विकल्प मेरे पास सिर्फ और सिर्फ तब होता यदि मैं बेहद ढीठ या थेथर होती. यदि किसी के कुछ भी कहने का अपने ऊपर कोई असर नहीं लेती. लेकिन तुम्हारी मां ढीठ नहीं है न मेरी जान!
अपनी विकल्पहीनता के बावजूद मैं अभी कम से कम 3-4 महीने और, आजादी से जीना चाहती थी, पर ये संभव नहीं हो सका. तुम्हें मुबारक हो मेरी बच्ची! तुमने मेरे भीतर जन्म ले किया है. आज सुबह तुम्हारे पिता के ऑफिस जाने से पहले मैंने प्रेगनेंसी टेस्ट किया था, वो पॉजिटिव निकला. प्रेगनेंसी टेस्ट किट की पतली सी स्ट्रिप पर उभर आई बैंगनी रंग की दो पतली सी लकीरों ने सूचना दे दी, कि तुम मेरे भीतर आ चुकी हो. तुम्हारे पिता का पहला रिएक्शन परेशान होने वाला था और मेरा भी पहला रिएक्शन बर्फ जैसा ठंड़ा था! अभी ये बात तुम्हें नहीं पता लगी होगी, क्योंकि अभी तुम हफ्ते दो हफ्ते के भ्रूण हो लगभग. एक गेंद के बराबर ही हुए होगे तुम तो अभी. काश! तुम लड़की ही होओ. जो लोग ‘बच्चा-बच्चा’ कह के लड़के के आने का इंतजार कर रहे हैं, मैं उन्हें ठेंगा दिखाना चाहती हूं! मुझे बेहद खीज है, उनके बच्चे के नाम पर लड़के के इंतजार करने से. लेकिन तुम डरो मत, यदि तुम लड़का हुए तो सिर्फ इसलिए तुम्हें मेरी उपेक्षा नहीं मिलेगी, कि मैंने लड़की चाही थी और लड़का हुआ.
तुम्हें फिलहाल अपनी जिंदगी में न चाहना मैं सबसे तो छिपा सकती हूं, लेकिन तुमसे तो नहीं ही छिपा सकती. क्योंकि दुनिया से छिपाई हर चीज मैं अपने दिमाग की पोटली में रखती हूं और तुम तो मेरे भीतर ही हो. दिन भर काम तुम्हें कोई होगा नहीं, तो तुम पूरा दिन मेरी उस दिमाग की पोटली का तो पुर्जा-पुर्जा छान मारोगी तुम. फिर तुमसे कैसे छिपेगा भला, कि तुम्हारी मां तुम्हें नहीं चाहती अभी!! तकलीफ होगी तुम्हें ये जान के, हैं न? लेकिन तुम्हारी मां क्रूर नहीं है मेरी बच्ची! प्लीज समझने की कोशिश करना. यदि मुझे पशुओं और चिड़ियाओं की तरह सिर्फ तुम्हें पैदा करने और खाने लायक बना के छोड़ देना होता, तो कोई समस्या ही नहीं थी. पर तुम तो इंसान के बच्चे हो न, यूं समझ लो कि इंसान का बच्चा सिर्फ खून, हाड-मांस नहीं लेता मां का, बल्कि अपनी मां का सालों का समय भी लेता है.
मैं बहुत थक चुकी हूं मेरी जान! बेहद परेशान हूं, फिर लिखूंगी तुम्हें. तुम्हारी मां तुम्हारे लिए, या जो भी इस दुनिया में आने वाले हैं और जो आ चुके है, उन सब बच्चों के लिए बेहद चिंतित है, परेशान है और सबसे बुरी बात कि विकल्पहीन है, कुछ भी न कर पाने की स्थिति में हूं मैं.
उत्तर प्रदेश के बागपत से ताल्लुक रखने वाली गायत्री आर्य की आधा दर्जन किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं. विभिन्न अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में महिला मुद्दों पर लगातार लिखने वाली गायत्री साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा मोहन राकेश सम्मान से सम्मानित एवं हिंदी अकादमी, दिल्ली से कविता व कहानियों के लिए पुरस्कृत हैं.
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