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कुमाऊनी संस्कृति के रंगों से गुलजार होता नैनीताल

पिछले एक वर्ष में नैनीताल का स्थानीय बाज़ार कुमाऊनी संस्कृति के रंगों से गुलजार होता नजर आ रहा है. बाज़ार की दुकानों की दीवारें हों या उनके शटर के रंग, सड़कों को बनावट हो या नवनिर्मित भवन संरचना, कुमाऊनी संस्कृति की साफ झलक नजर आ रही है. कुमाऊनी संस्कृति के ये रंग न केवल पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं बल्कि पहाड़ के लोगों को भी रोमांचित कर रहे हैं. पिछले कुछ दशकों में नैनीताल की बेतरतीब बसावट अपना पारम्परिक रंग लगभग खो चुकी थी. नैनीताल के जिलाधिकारी धीराज गर्ब्याल की इस पहल ने फिर से बाजार में पारम्परिक रंगों संजोने का काम किया है.
(Colors of Kumaoni Culture Nainital)

नैनीताल शहर की मुख्य सड़क पर पाथर वाली टिकट घर की खिड़की हो या पाथर वाले रिक्शा स्टैंड सभी पर्यटकों को आकर्षित कर रहे हैं. देखने में भव्य इन पारम्परिक संरचनाओं का महत्त्व केवल सुन्दरता तक सीमित नहीं है बल्कि इनके पीछे भुला दिया जाने वाला पारम्परिक ज्ञान है.      

मसलन तल्ली ताल और मल्ली ताल में बने रिक्शा स्टैंड को लिया जाय. इन दोनों रिक्शा स्टैंड को पारम्परिक पहाड़ी शैली में बनाया गया है. जिस शैली में यह बने हैं उसका है नाम काठ कुनी. काठ कुनी मध्य हिमालयी इलाकों में बनाये जाने वाले घरों की एक महत्वपूर्ण भवन निर्माण शैली है. जिसमें काठ का मतलब लकड़ी है और कुनी का अर्थ कोना है. इस शैली में बने भवन भूकम्परोधी होती हैं. इस शैली में बने भवनों के निर्माण में स्थानीय पत्थर, लकड़ी और मिट्टी का इस्तेमाल किया जाता है. उत्तराखंड में इस शैली का मिलता-जुलता स्वरूप कोटी बनाल कहलाता है.        
(Colors of Kumaoni Culture Nainital) 

काठ कुनी शैली में बने भवन भूकम्प आने पर हिलते जरुर हैं लेकिन पूरी तरह नष्ट नहीं होते हैं. काठ कुनी शैली में वर्टिकल (ऊर्ध्वाधर) कॉलमों के बजाय हॉरिजॉन्टल (क्षैतिज) बीम डाले जाते हैं और ‘क्रिस क्रॉस’ ब्रेसिंग के माध्यम से, एक पूरी लकड़ी की संरचना का निर्माण किया जाता है. लकड़ी के बीम संरचना को लचीलापन प्रदान करते हैं. छत पर लगाये जाने वाली पटाल लगाई जाती है जिसे स्थानीय भाषा में पाथर कहा जाता है. पटालों का वजन इस शैली में बनी संरचना को नीचे की दबाता है जिससे उसे अधिक स्थिरता मिलती है.

नैनीताल की सड़कों के किनारे दिखने वाले पारम्परिक भवन हिमालय की भुलाई जा रही विरासत के नमूने भर हैं. आज भी हिमालय के रहवासियों की पारम्परिक जीवन शैली पर एक गंभीर अध्ययन की आवश्यकता है. नैनीताल के जिलाधिकारी धीराज गर्ब्याल की इस पहल को राज्यभर में फैलाए जाने की जरूरत है.    

यह पूरी जानकारी धरी रह जायेगी अगर यहां काष्ठ शिल्प कला के उस्ताद धनीराम जी का जिक्र न किया जाये. अस्सी बरस के हो चुके धनीराम जी अल्मोड़ा के मौजा खौड़ी पोस्ट खट्यौला के रहने वाले हैं. रिक्शा स्टैंड के स्तम्भों पर भव्य कलाकारी देखने को मिलती है वह धनीराम जी और उनके पुत्र द्वारा की गयी है. धनीराम जी से एक लम्बी बात-चीत यहाँ पढ़िये:
कुमाऊँ में लकड़ी पर नक्काशी करने वाले आख़िरी उस्तादों में से एक धनीराम जी का इंटरव्यू
(Colors of Kumaoni Culture Nainital)

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