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कहां गयी पहाड़ की चुंगी देने की परम्परा

बचपन में चुंगी मिलने अपार आनंद याद आता है. वह जीवन के सबसे सुखद पलों में हुआ करता. हम बच्चे होते थे और घर पर किसी भी बड़े चचेरे-ममेरे भाई या उसके अन्तरंग दोस्त के आने की प्रतीक्षा रहती थी. (Childhood Nostalgia by Ashok Pande)

अक्सर ये भाई और उनके दोस्त कॉलेज में पढ़ने वाले बेरोजगार होते थे जो किसी इम्तहान या रिश्तेदारी के सिलसिले में दिन-दो दिन घर पर रहने आया करते. हम बच्चे होते थे सो हमारे पास नकद पूंजी का होना किसी सपने जैसा हुआ करता. कभी घर से दस-बीस पैसे या हद से हद अठन्नी का बतौर जेबखर्च मिल जाना बड़े सौभाग्य की बात होती थी. अमूमन इन पैसों को किसी चटपटे ठेले पर तुरंत तबाह कर दिया था ताकि जातक की आर्थिक अवस्था पुनः ‘जैसे थे’ में पहुँच जाय. (Childhood Nostalgia by Ashok Pande)

ऐसे में इन मेहमानों का आना किसी सपने की तरह घटता था. उनकी चापलूसी करना राजधर्म की तरह निभाया जाना होता. रसोई से चाय-नाश्ता लाकर उन्हें उनके बिस्तर में परोसने को छोटे मेजबानों में होड़ लगा करती थी.

अमूमन शाम को ये मेहमान हम बच्चों को घुमाने ले जाते. इस घुमाने में आपके शहर के सबसे स्वादिष्ट ठिकानों पर ले जाए जाने की परम्परा थी. घर पर आये ये भाईसाहब आपको दूध-बिस्कुट, दही-जलेबी या कुल्फी-गन्ने का रस जैसी दिव्य वस्तुओं का लुत्फ़ दिलाया करते. पेमेंट करने के वास्ते जब वे अपनी जेबों में हाथ डालकर अपना दीन-हीन बटुआ या नोटों की मरियल गड्डी निकालते तो चोर निगाहों से अपरिहार्य रूप से ताड़ लिया जाना होता था कि अगले के पास माल कितना है.

इन भाईसाहब के वापस जाने के क्षण में घर पर आपकी उपस्थिति अनिवार्य होनी होती थी वरना बड़ा आर्थिक नुकसान होने का खतरा था. भाईसाहब ने आठ बजे की बस पकड़कर जाना होता तो आप सुबह पांच बजे उठकर बाकायदा तैयार हो जाते और उनके आसपास लगातार मंडराते रहते ताकि उनकी निगाह में बने रहें.

फिर वे घर पर बड़ों के पैर वगैरह छूकर बाहर निकलने का उपक्रम कर ही रहे होते जब आपको अपना मौक़ा ताड़ना होता था. भाईसाहब के झोले या अटैची को तब तक आपके हाथ में स्थापित हो जाना होता था. फिर आप उन्हें छोड़ने बस अड्डे तक पैदल जाया करते थे जहाँ बस में बैठने से पहले वे आपके हाथ में अपनी औकात के अनुसार अठन्नी से लेकर दो रुपये तक की रकम थमाते थे. इस रकम को चुंगी कहा जाता था. उनसे चुंगी लेते हुए एक तरफ आपको यह अहसास रहता था कि जाने वाला बेरोजगार है और अपनी आत्मा का एक हिस्सा खंजर से काट कर आपके हवाले कर रहा है, लेकिन दिल का एक बड़ा हिस्सा उस मौज की कल्पना में कुप्पा हुआ करता था जो भाईसाहब की बस के चले जाने के बाद आनी होती थी.

बड़े भाइयों और उनके दोस्तों के साथ चलने वाला यह चुंगी का लेनदेन बचपन के सबसे अविस्मरणीय अनुभवों में होता था.

वैसे तो घर पर आने वाले नातेदार भी निकलते वक्त आपके हाथ में एक-दो रुपये का नोट थमा जाया करते थे पर उन नोटों को “तुम्हारे गुल्लक में डाल देंगे” कह कर माँ-बाप छीन लिया करते थे. इतिहास गवाह है वैसा कोई गुल्लक कहीं नहीं होता था.

चुंगी देने का रिवाज मोहब्बत का एक दोतरफा करार हुआ करता था जिस पर हमारे समाज के बड़े परिवारों की नींव मजबूत होती जाती थी.

अब किसी के घर न कोई चचेरा भाई आता दीखता है न उसका दोस्त. आता भी है तो उसे अपने मोबाइल से फुर्सत नहीं होती. बच्चों के पास अपने लैपटॉप-प्लेस्टेशन होते हैं. पापा के फोन पर ओटीपी आता है और लाल मोटरसाइकिल में बैठ कर आने वाले भैया घर पर पिज्जा डेलीवर कर जाते हैं.

-अशोक पाण्डे

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