फोटो: रंगीलो पहाड़ फेसबुक पेज से
उत्तराखंड में इन दिनों भिटौली का महीना है. इस महीने भाई अपनी बहन या पिता अपनी पुत्री को भिटौली देते हैं. भिटौली के विषय में अधिक इस लेख में पढ़िए. भै भुको, मैं सिती : भिटौली से जुड़ी लोककथा
इसी महीने की पूर्णिमा के दिन उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले में चैतोल पर्व मनाया जाता है. पिथौरागढ़ के 22 गावों में मनाया जाने वाला यह पर्व दो दिन तक मनाया जाता है.
इस पर्व के संबंध में मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव स्वयं हिमालय से अपनी बहन भगवती को मिलने आते हैं. इसी कारण जिन गावों में चैतोल के पर्व में गाँव की बेटियां कोशिश करती हैं कि चैतोल के दिन वे अपने मायके आयें.
भगवान देवल समेत को भगवान शिव का ही रूप माना जाता है. सबसे पहले देवल समेत बाबा की छतरी तैयार की जाती है जिसे स्थानीय भाषा में छात कहा जाता है. छात के साथ देव डोला भी तैयार किया जाता है. इसके बाद इस छात को सभी 22 गांवों में घुमाया जाता है.
भाई और बहिन के संबंधों पर आधारित यह त्यौहार सोर घाटी के लोग बड़े जोश से मनाते हैं. पिथौरागढ़ में यह यह देव डोला घुनसेरा गांव, बिण, चैंसर, जाखनी, कुमौड़, मुख्यालय स्थित घंटाकरण के शिव मंदिर लाया जाता है.
यहां से यह डोला 22 गांवों में अपनी 22 बहिनों से मिलने जाता है. कहा जाता है कि सोर घाटी में शिव की 22 बहिनें मां भगवती के अवतार में रहती हैं.
चैत के महीने शिव अपनी इन बहिनों से मिलने उनके घर जाते हैं. माना जाता है कि यह डोला जिस जिस गांव से होकर जाता है वहां किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा नहीं आती है. इस पर्व को अच्छी फसल की कामना के लिए भी मनाया जाता है.
परम्परागत रूप से यह भी माना जाता है कि जिन गांवों में छात भगवती भेंटने आती है उन गांवों में होली का त्यौहार नहीं मनाया जाता है. सोर घाटी के कई गांवों में आज भी होली का रंग नहीं पड़ता है.
-काफल ट्री डेस्क
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