फ़ोटो www.nainitaltourism.org.in से साभार
उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता
(पिछली क़िस्त से आगे)
कमलेश का रूममेट
वो 19 जुलाई की नम सुबह थी जब मैं कुल जमा दो अदद बैग, दिल में सरकारी नौकरी की तृप्त और ठंडी आश्वस्ति और खुद को लिए तल्लीताल बस स्टेशन पर उतरा. उतरते ही एक भरपूर सांस ली, जो ताल की तरफ से आती ठंडी-ठंडी हवाओं की वजह से सनसनी की तरह अंदर घुसी और खांसी के रूप में बाहर आ गयी. एक ठंडी अंगड़ाई लेकर मैंने चारों तरफ नजर दौडाई जो दौड़ते-दौड़ते मॉल रोड पर निकल गयी जिसके बाईं तरफ अपने पूरे वैभव और गंभीर पारदर्शिता के साथ अथाह जल हिलोरें ले रहा था. वाह! (तब फेसबुक और वाट्सऐप का दख़ल नहीं हुआ था नहीं तो मुह से `वॉव आवसम’ जैसा कुछ निकलता). उफ़! क्या ख़ूबसूरती थी! चारों तरफ गुरु-गंभीर लगभग समाधिस्थ खड़े गहरे हरे पहाड़ और बीच में नक्षत्रों की तिजोरी से फिसलकर गिरा पारा!
मेरी विस्फारित नजर इस ख़ूबसूरती को पी ही रही थी कि सड़ियल दिमाग ने इसकी तुलना मेरे द्वारा देखे गए ठहरे हुए पानी के इकलौते शाहकार ननिहाल डोमनपुर के ठकुराने वाले पोखरे से करनी शुरू कर दी. कोई तुलना नहीं.. तालाब के चारों ओर बने घाट पर बिछलती गहरी हरी काई और इन चीड़-देवदार के पेड़ों में, भैंसों के लहालोट उथलपुथल स्नान से खाकी-कत्थई-मटमैंले रंग के से हो जाते पानी के उस परात और इस झील के नीलम के से पानी में, वहाँ कपड़े धोने के साबुन के श्वेत-धवल झाग और यहाँ मंथर चाल से चलती श्वेत-धवल नौकाओं के पाल में… कोई तुलना नहीं. लेकिन फिर भी पूर्वी उत्तर प्रदेश के उस मैदानी भाग में जब मई- जून में पारा चालीस के पार पहुंचता है गाँव का वही तालाब गवईं जीवन को उतनी ही शीतलता पहुंचाता है जितना कि ये पहाड़ी पोखर यहाँ कि अर्थव्यवस्था को.
अगर मसूरी को `पहाड़ों की रानी’ कहते हैं तो मेरा मानना है कि उस हिसाब से नैनीताल को `पहाड़ों की महारानी’ कहा जाना चाहिए. इससे ज्यादा खूबसूरत मुझे तो कोई और पहाड़ी शहर नहीं लगता. यकीन जानिये ये मैं अपनी अन्तः श्रद्धा से कह रहा हूँ ससुराल पक्ष के किसी जीव की आँखे तरेरने की वजह से नहीं. अद्भुद सुंदरता, अजब रौनक. मैं कभी मॉल तो कभी ताल को देख रहा था. मेरे इस भौंचक से औचक निरीक्षण को समझकर एक साढ़े चार फुटे आदमी की काया मेरी तरफ आई और मेरे सामान की तरफ मुखातिब होकर पूछा `हां शाब, कां को जाना’. मुझे ऑटो या रिक्शा के लिए अभ्यस्त आँखों को वहाँ से हटाकर यहाँ केंद्रित करने में थोड़ा वक्त लगा. इतना कि मैंने उसे सामान से नजर हटाकर लापरवाही से मुझे घूरता पाया वो भी ऐसे कि जैसे सदियों से उसे मेरा ही इन्तजार हो.
`लापरवाही से घूरना’ पढकर इससे पहले कि आप मेरी लेखन क्षमता पर प्रश्न उठाएं बता दूं नेपाली या पहाड़ी मूल के लोगों के माथे के नीचे नाक को दोनों बगल जो गोल-गोल चीज होती है वो इतनी खुली या इतनी बंद होती है कि वो किसी को भी घूरते हैं तो लगता है कि या तो ये नींद में हैं या उसे देखकर इन्हें कोफ़्त हो रही है. कुल मिलाकर अगर सही अभिप्राय न पता हो तो लापरवाही से घूरने जैसी कोई चीज बनती है. इनकी ख़ूबसूरती में मासूमियत का जो कंटेंट है वो शायद इसी वजह से है. मैंने शायद उससे कहा कि मुझे एटीआई जाना है रिक्शा या ऑटो मिलेगा… उसने शायद कहा कि `वां तक रिक्शा नईं जाता’ और शायद उसने ऑटो वाली बात पर कोई कमेन्ट नहीं किया. ऐसा कहकर उसने कमर पर बंधी एक रस्सी निकाली और मेरे सामान के आजू बाजू लपेटने लगा.
मैं अजीब से असमंजस में ठस था. कभी मैं अपने सामान, कभी उस जगह-जगह से गांठों से बंधी रस्सी तो कभी उस आदमी को देखता था क्योंकि मेरे पिट्ठू की लम्बाई उससे शायद कुछ इंच ही कम रही होगी. जब वो सामान बांधकर अपने माथे और पीठ के जोर पर उसे उठाकर थोड़ा आगे को झुका हुआ खड़ा हुआ, मेरे मुह से एक अपुष्ट सी चीख निकली जो किसी बतख की आवाज जैसी थी और मुझे लगा था कि इतने भार के दबाव से जो शायद उसके मुह से निकल जाएगी. जबकि इस चीख के बदले मैं पूछना चाह रहा था कि एटीआई कितनी दूर है और क्या वो इतना बोझा वहाँ तक उठा कर ले जाने वाला है. मैंने कुछ नहीं पूछा और अधखुले मुह के साथ चुपचाप हाँथ बांधे मैं उसके पीछे हो लिया.
जब तक मेरी जीभ पूरी बाहर को न लटक गयी और सांस धौंकनी की तरह न चलने लगी मैं ताल की ख़ूबसूरती अपने समस्त अवयवों से पीता रहा. कुछ दूर तो ये भावना भी गले में पट्टा डाल के मुझे खींचती रही कि मेरा चयन पुलिस सेवा के लिए हुआ है और सामान्य जनता की तरह मेरी भी एक गलत धारणा पुलिस के फिटनेस को लेकर बनी हुई थी. इंडिया होटल तक तो ठीक ठाक रहा लेकिन नारायण बुक्स तक पहुँचते-पहुँचते मुझे सांस के धौंकनी की तरह चलने के व्यावहारिक मायने ज्ञात होने लगे. वो पहली बार था जब मैंने उससे पूछा कि `क…हाँ.. है ए..टी..आई’ और उसने तर्जनी के इशारे से कहा `वो रा..’. मुझे लगा कि शायद अगली आने वाली किसी बिल्डिंग के लिए कह रहा होगा. मैंने उसकी उंगली को फौलो किया और आगे लकड़ी का बना एक सरकारी सा कुछ दिखा. शायद यही होगा एटीआई, मैंने साहस बटोरा और चलता रहा.
हरी बिल्डिंग सरकारी थी लेकिन एटीआई नहीं थी. उसके बाद कम से कम चार और बार मैंने उससे पूछा और हर बार वो यही कहता रहा `वो रा’. जब मैंने अच्छे से समझ लिया कि दिन में तारे कैसे देखते हैं, मुह और कानो से धुंआ कैसे- किस अदा से निकालते हैं और हर सरकारी बिल्डिंग एटीआई नहीं होती, मैं एक बड़े से गेट के सामने था. रास्ते भर मैं जिस एटीआई-एटीआई का राग आलापता आ रहा था उसके गेट के ऊपर तो कुछ और ही टन्ग ट्विस्टर लिखा था यू ए ओ ए… उत्तरांचल अकैडमी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन. मैंने कई बार इसे बिना मुह बिचकारे बोलने की कोशिश की लेकिन आज तक सफल नहीं हो सका. मुझे नहीं पता था कि ये एक बड़ा लाइफ ट्विस्टर भी होने वाला था.
रिसेप्शन पर तीन लोग नमूदार हुए. मेरे नाम बताने पर उन्होंने रजिस्टर चेक किया और घोषणा की कि `आप तो पहले ही आ चुके हैं.’ मेरी सांस पहले से ही फूल रही थी अब हाथ-पाँव फूलने की नौबत आ गयी. इससे पहले कि मैं खुद को चिकोटी काटकर इहलोक में होने की पुष्टि करता उन्होंने रजिस्टर आगे कर दिया. अमित श्रीवास्तव पुत्र श्री नित्यानंद श्रीवास्तव कमरा नंबर 18. अच्छा तो ये चक्कर है. मैंने उनसे वो ब्रह्म वाक्य कहा जो अब तक की नौकरी में कम से कम चार सौ बार कह चुका हूँ और शायद इतनी ही बार दूसरे अमित (लिखा-पढ़ी में अमित श्रीवास्तव `प्रथम’, कहा में अमित `लम्बू’ और सुनी में अमित `बड़े’) ने भी कही होगी…`अरे वो दूसरे अमित हैं… हम दोनों एक ही नाम राशि हैं.’ पिता का नाम अलग होने से थोड़ी सुविधा रही. वो समझ गए. फिर काउंटर से दो आँखे एक हाथ निकला और बाएँ से पीछे को घूमते हुए बताया कि `आप यमुनोत्री 2 चले जाएँ.. कमरा नंबर 20, वहाँ एक ही प्रशिक्षु है कमलेश उसके रूममेट.’
यमुनोत्री का नाम सुनते ही मेरी आँखों के आगे पहले तो उपकार सामान्य ज्ञान, उत्तरांचल विशेष, पेज नंबर 82, पैराग्राफ तीन की पहली लाइन “यमुनोत्री; जिला उत्तरकाशी” और फिर अन्धेरा छा गया. अब क्या उत्तरकाशी जाना पडेगा. फिर कमरा नंबर और रूम की बात याद करके लगा कि ये शायद होस्टल का नाम होगा. मैंने थूक गटकी और पूछा कि क्या दूसरे अमित जी के साथ रूम नहीं हो सकता? क्योंकि अमित ही वो इकलौते अधिकारी-प्रशिक्षु थे जिनसे मेरी एकाध बार वाया मेरे बचपन के हाफ पैंटया यार नितिन उपाध्याय, टेलीफोनिक बात हो चुकी थी और इसी एकाध बार में ही वो मुझे खासे रोचक लगे थे. वो बात शुरू करने से पहले और खत्म करने के बाद नियम पूर्वक ठहाके लगाते थे. बीच बीच में अगले की हौसला अफजाई के लिए ‘बेहतरीन…बहुत बढ़िया…जबरदस्त’ जैसे जुमलों का खुलकर इस्तेमाल करते थे. मैं ये सुनकर निराश हुआ कि उनके साथ कोई बीरेंद्र कुमार जी रूम मेट हैं. देर से आने की शायद ये पहली सजा थी.
कैम्पस में एक अजीब सी शान्ति थी. शायद तूफ़ान से पहले की शांति. मैं चुपचाप इधर उधर ताकाझांकी करते हुए जगदीश के पीछे-पीछे यमुनोत्री प्रथम तल के कमरा नंबर 20 पर पहुंचा. जगदीश ने डुप्लीकेट चाबी से दरवाजा खोला. वैसे तो हमारे हाथो में बैग थे लेकिन लगा यूं कि हाथो के तोते उड़ गए. ठीक सामने बेड पर बाकायदा तह की हुई एक साड़ी और सलवार कुर्ते जैसे कुछ कपड़े और कम्प्यूटर टेबल पर सौंदर्य प्रसाधन की पूरी फ़ौज खड़ी थी. मेरा मुह खुला का खुला रह गया और कनखियों से जगदीश को देखा तो वो भी थूक गटक रहा था. `ये क्या कमलेश लिपस्टिक लगाता है’ जैसे कई सवाल हमारे जहन में एक साथ उठे और इससे पहले कि हम किसी काम चलाऊ निष्कर्ष पर पहुँचते रिसेप्शन से भागता हुआ राजू आया और इस नाटक का पटाक्षेप इन शब्दों में किया `अरे गडबड हो गयी दाज्यू… कमलेश उपाध्याय तो मैंडम हैं… सर का इंतजाम कमरा नंबर 36 में कर दिया है.’ निस्संदेह मेरी लाइफ की ट्विस्टिंग शुरू हो गयी थी.
मैं अपना असबाब उठाकर गुड्डू के साथ ही कमरा नंबर 36 में आ गया जो 11 हफ़्तों तक मेरा शयन स्थान होने वाला था. शयन स्थान इसलिए क्योंकि अमूमन रात 2 बजे से सुबह 5 बजे तक ही मुझे वहाँ रहना था… बाकी का समय… उसकी तफसील बाद में.
इसी कमरे में मुझे बहुत ही शांत और सुशील रूम पार्टनर मिलने वाले थे जो पहली मुलाक़ात के बाद लगभग डेढ़ महीने बाद मिलने पर कहने वाले थे `हम शायद रूम पार्टनर हैं’, जिन्हें मैं २ बजे रात कमरे में आने के बाद रजाई में पाता था और ५ बजे कमरे से निकलने से पहले भी और जो रात के उसी अंधियारे लैम्प के मद्धिम उजाले में पहचाने जाते थे उससे ज्यादा रोशनी में नहीं. जो `ओ भिना केस के जाऊं द्वरहटा’ पर डेढ़ फुट की कमर बाहर को निकाल कर जबरदस्त कुमाउनी नृत्य करते थे, हमने (डा. आनंद और मैं पैरोडी के सलीम जावेद हुआ करते थे) इस गाने को थोड़ा बदल कर `ओ बिना ड्रेस के जाऊं द्वरहटा’ कर दिया था और उनके उस नृत्य का नामकरण भी किया था `डेढ़ फुटिया’, जिसे कालान्तर में आनंद ने मुगले आजम में पेश करने का भी दुस्साहस किया था. जो इतने सौम्य थे कि उनकी घनी मूंछे उनकी सौम्यता से लगातार भिड़ती रहती थीं. इतने सालों बाद उनसे मिलने पर आज भी यही लगता है कि वो उतने ही सौम्य हैं और उनकी मूंछे उनकी बढ़ती उम्र का इकलौता प्रमाण. ये राजेन्द्र लाल वर्मा थे.
(जारी)
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बढ़िया। अगली किस्त के इन्तजार में।
हा हा हा , सहानुभूति सर रूम मेट के प्रकरण के लिए । शायद इतिहास खुद को दोहराता है , कुछ महीने पहले हमारे बैच में भी ऐसा ही हुआ ??