ललित मोहन रयाल
उत्तराखण्ड सरकार की प्रशासनिक सेवा में कार्यरत ललित मोहन रयाल का लेखन अपनी चुटीली भाषा और पैनी निगाह के लिए जाना जाता है. 2018 में प्रकाशित उनकी पुस्तक ‘खड़कमाफी की स्मृतियों से’ को आलोचकों और पाठकों की खासी सराहना मिली. उनकी दो अन्य पुस्तकें शीघ्र प्रकाश्य हैं. काफल ट्री के नियमित सहयोगी.
लाल जंगली मुर्ग वर्तमान मुर्ग का पूर्वज सिद्ध हुआ है. मनुष्य जगत से इसका गहरा सांस्कृतिक संबंध रहा है. मानव और मुर्ग में पचास जीन कॉमन बताए जाते हैं. मुर्गा गंध और स्वाद की पहचान-परीक्षा में फेल बताया जाता है.
इनमें कई प्रकार की देसज नस्ले हैं. इसके अतिरिक्त संकर नस्लें भी बहुतायत में है. मजे की बात यह है कि देसज नस्लें अभिजात्य व कुलीन श्रेणी में गिनी जाती हैं. वहीं संकर नस्लें पदसोपान में काफी नीचे स्थान पाती हैं.
मोहनजोदड़ो के उत्खनन में मुर्ग की प्रतिकृति मिली है. ब्रह्मगुप्त ने तो अलजेब्रा को कुक्कुट-गणित के नाम से बहुत पहले ही खोज डाला था. आचार्य भावप्रकाश ने मुर्गे के बीस लक्षणों का उल्लेख किया है. उन्होने यह भी दोहराया कि मनुष्य को चार गुण मुर्गे से अंगीकार करने ही चाहिए. मुर्गे को साहसिक प्रवृत्तियों का वाहक माना जाता है.
महामति चाणक्य भी मुर्गे के चारित्रिक गुणों पर खूब रीझे थे. उन्होने प्रातः जागरण, रणोद्यत रहना, बंधुओं को उचित विभाग देना आदि उसके नैसर्गिक गुण बताए हैं. युद्ध जीतकर विजित सामग्री को भोगने के गुण पर तो वे वारे-वारे जाते थे.
मांस-विक्रेताओं के प्रतिष्ठानों में मुर्ग से संबंधित विज्ञापन देखने को मिलते है. मुर्गे की पासपोर्ट साइज़ फोटो ही चितेरों का चित्त हरण करने में समर्थ होती है. अन्य विज्ञापनों की जरूरत ही नहीं पड़ती है. कथा-साहित्य, बाल-कथा, चित्रकला व मनोरंजन के साधनों में भी मुर्गे को उचित स्थान मिला है.
स्कूली दिनों में प्रातःश्लोक शीर्षक का चित्रांकन करने को मिलता था. इस चित्र में सड़क-पगडंडी पेड़-पौधे, बगीचा व हवाखोरी करते व्यक्ति को दिखाना होता था. टीले पर बैठे बाँग देते मुर्गे के चित्र के बिना चित्र अधूरा-सा लगता था. प्रातः बेला को प्रभावी दिखाने के लिए बाँग देते मुर्ग को अनिवार्य घटक के रूप में मान्यता मिली हुई थी.
देसी मुर्गे की शान और रौब-दाब देखते ही बनती है. उसके सम्मुख फार्मी मुर्गे अपात्र-कुपात्र से दिखते हैं. उसकी चाल में गजब का आत्मविश्वास रहता है. नेचुरल-सी मस्ती रहती है. व्यक्तित्व भी उसका अत्यंत प्रभावशाली दिखता है. रंग-बिरंगे पंख, उन्नत सिर,प्रशस्त कलगी, नुकीली चोंच, नुकीले पंजे. कौन रसिक होगा जो इस सौंदर्य पर न मर मिटे. दार्शनिक-सी आँखें, अर्ध-उन्मीलित-सी मुदित मुस्कान, स्नेहसिक्त वाणी, जो कभी-कभी अट्टहास में भी परिवर्तित हो जाती है. वह नेतृत्व करने को सदैव तत्पर मिलता है.
मुर्गे के संस्कार भी वंशानुगत होते हैं. ये संस्कार पैतृक गुणवत्ता व उत्कृष्ट शारीरिक संरचना पर निर्भर करते हैं. मोर की कलगी और मुर्गे की कलगी को पक्षी विज्ञान के सौंदर्य-शास्त्र में एकमत से मान्यता मिली हुई है. अज्ञेय तो इससे भी आगे बढ़ गए थे. उन्होंने‘कलगी बाजरे की’ पर ही काव्य-व्यवस्था दे डाली थी.
उस दौर में मुर्ग-हरण के नाना प्रकार के प्रसंग किवदंतियों में विद्यमान है. ‘विप्रः बहुधा वदंति’ टाइप के.
प्रथम सर्ग के साधक-
इस प्रकार के साधक मुर्ग-प्रजाति से अनन्य अनुराग रखते थे. वे मुर्गे से स्नेह की लौ लगाए फिरते थे. निरंतर मुर्ग-स्मरण में तल्लीन रहते थे. मुर्गे की विकट चाह में डगर-डगर फिरते थे. इन साधकों ने मुर्गे से प्रत्यक्ष-साक्षात्कार का संकल्प लिया हुआ था. अतः मुर्गे के निवास पर दर्शन हेतु उन्होने प्राइम टाइम चित्रहार के समय को चुना था. इस समय का सुभीते के लिए चयन किया गया था, ताकि कोई भी मानव उनके साक्षात्कार में बाधक सिद्ध न हो. स्वाभाविक रुप से मनुष्य जाति इस अवधि में चित्रहार में अनुरक्त रहेगी. वस्तुतः वे मुर्गे के चित्र में भी हार डालने का लक्ष्य लेकर चले थे.
वे नियत समय पर नियत स्थल तक पहुँच चुके थे. सर्वप्रथम उन्होंने मुर्गी-बाड़े की प्रदक्षिणा की थी. तत्पश्चात् हथेली पर अक्षत रखा गया था. मुर्गद्वय गर्भ गृह में विराजमान थे. अतः बाड़े के प्रवेश द्वार से ही उन्हे अक्षत अर्पित किया जा सकता था. सो उन्होने हथेली को हाथ के सहारे आगे, काफी आगे तक बढ़ा लिया था. स्पष्ट शब्दों में कहें तो उन्होने मुर्ग के चरण-स्पर्श करने की चेष्टा की थी. मुर्गे अयाचित साधकों की उपस्थिति से असहज थे. अतः उन्होंने भेंट को अस्वीकार करने का मन बना लिया था. इस प्रकार वे बाड़े के एक कोने में अपने में ही सिमट गए थे.
इन्हीं साधकों में एक वाममार्गी साधक भी थे. वे सर्प स्वर निःसृत करना जानते थे. अतः उन्होंने हिस्स… फिस्स… का स्वर निःसृत कर मुर्गों को स्तंभित कर डाला था. यह एक रोचक तथ्य है कि सर्प-जाति में स्वर-कोश नहीं पाए जाते हैं. उधर मुर्ग-जाति में उच्च क्षमता के स्वर-कोश पाए जाते हैं. यहाँ पर मुराद बाँग देने की क्षमता से है. इस गुण को धारण करने के कारण ही मुर्ग जगत्प्रसिद्ध भी है. स्वरहीन के स्वर सेए उच्च स्वरकर्ता का स्वरहीन हो जाना अद्भुत छटा प्रस्तुत करता है. कला के क्षेत्र में ऐसे ही अद्भुत क्षणों को ब्रह्मानंद-सहोदर कहा गया है.
साधक अपने साथ अपना भूदानी झोला लिए रहते थे. तदनंतर साधकों ने अपने प्रिय मुर्गों की सजीव देह को उस झोले में सुरक्षित रख लिया था. वहाँ से पूर्व नियोजित स्थल अर्थात् सहपाठी के घर की ओर रात्रि विश्राम हेतु प्रयाण कर लिया था. साधकगणों ने कल का प्राक्कलन पूर्व से ही किया हुआ था. सुदूर स्थित विद्यालय में अवकाश के पश्चात् अपने सदेह प्रिय को विदेह करने की योजना थी. शयन से पूर्व उन्होंने भूदानी झोले को खूँटी में टाँग लिया था. तत्पश्चात् झोले के सम्मुख सिर नवाकर ही साधकगणों ने शयन किया था.
ब्राह्म मुहूर्त में मुर्गों ने अपने नैसर्गिक स्वभाव के अधीन बाँग दी थी. यह बाँग भूदानी झोले के अंदर से ही दी गई थी. गृहस्वामी ने (जो सहपाठी के पिता होते थे) भी इस बाँग को सुना था. पहले तो उन्होंने बाँग का उद्गम स्थल आस-पड़ोस समझकर बाँग की अवहेलना की थी. पूर्वाभ्यास के क्रम में मुर्गों ने इस बार प्रायः पाँच मिनट का आलाप लिया था. अतःगृहस्वामी को इस तथ्य में कोई संदेह नहीं रहा कि आलाप का उद्गमस्थल उनके चिरंजीव का शयनकक्ष ही है. अतः उन्होंने साधकगणों को आलिंगन बद्ध कर लिया था. भूदानी झोले को जब्त कर लिया था. आरंभ से आलाप तक कथाश्रवण किया था. इस प्रकार साधकों का शास्त्रसम्मत सत्कार संपन्न हुआ था.
अथ कुक्कुट-हरण द्वितीय सर्ग-
इस पथ पर चलने के लिए सच्चे साधक-सा समर्पण वांछनीय रहता है. सामाजिक मान्यता में यह कृत्य पथभ्रष्ट भले ही हो, साधना का पथ साधक की दूरदृष्टि और दृढ़ निश्चय की कड़ी परीक्षा लेता ही है.
हाजरा व कड़कनाथ प्रजाति के तीर्थ की सूचना अन्य भक्तों के माध्यम से ही प्राप्त हुई थी. अतः साधकों ने शरदकालीन रात्रि में ही नदी को पार किया था. इस तीर्थ के रात्रिकालीन दर्शन किए थे. अनुमान के आधार पर ही मार्ग तय किया गया था. जूट के छह बोरे भी साथ में ले गए थे. विहित रीति-परंपरा से बोरे भर लिए गए थे. साधक अभीष्ट भार को वहन कर मार्ग की दूरी संपन्न कर चुके थे. विजन-वन की सीमा आरंभ होने को थी. कुछ ही कदम शेष थे. तभी नेपथ्य से बंदूक फायर का स्वर सुनाई दिया था. दो राउंड फायरिंग हो चुकी थी. बोरों को ‘जहाँ है जैसे है’ के आधार पर विसर्जित कर दिया गया था. तत्पश्चात् साधक अरण्य में विलीन हो गए थे. प्राप्त सूचना में इस तथ्य का अभाव था कि तीर्थ-संचालक सद्य अवकाश प्राप्त सूबेदार हैं. किन्हीं विह्वल क्षणों में साधकों ने इस घटना के लिए पश्चाताप व्यक्त किया था. भावुक होकर उन्होंने यह भी व्यक्त किया था कि “अभीष्ट प्राप्ति के निष्फल प्रयास में वे नश्वर देहदान से वंचित रह गए थे”.
इसके बाद भी वे अपने साधना पथ से न डिगे थे. उसी पथ पर प्रशस्त रहे. एक रात्रि अभियान में आसूचना में प्राप्त संख्यात्मक सूचना सत्य पाई गई थी. तीर्थ के दर्शन भी इन्होंने कर लिए थे. अभीष्ट की प्राप्ति भी हो चुकी थी. उसी क्षण एक सत्य से साक्षात्कार हुआ था. समस्त प्राप्ति में से कोई भी प्राप्ति एक महीने की वय से अधिक की नहीं थी. ये संतोषी भाव धारण करते थे. अतः इसे ईश्वरीय इच्छा मानकर समभाव से ग्रहण कर लिया गया था. अब इस त्रुटि का परिमार्जन भी इसी रात्रि में ही किया जाना था. अतः द्वितीय पाली का आरोहण भी तत्काल संपन्न किया गया था. मुर्गी-बाड़े की प्रदक्षिणा की गई थी. इसी क्रम में उन्हें मुर्गी-बाड़ा पुरातात्त्विक महत्त्व का जान पड़ा था. इससे उन्हें निद्राधीन गृहस्थ की विपन्नता का भी अनुमान लग चुका था.
विपन्नता को देखकर साधारण गृहस्थ भी थोड़ा.बहुत दार्शनिक तो हो ही जाता है. ये तो साधक थे. अतः करुणा से भर उठे थे. इन्होंने अल्पवय चूजों का अर्पण भी उसी मुर्गी बाड़े में कर डाला था. तत्पश्चात् साधक सेंटा क्लॉज की भाँति निःशब्द वहाँ से प्रयाण कर चुके थे.
अथ कुक्कुट-हरण तृतीय सर्ग-
खान साहब कलगीदार, रोबीले, सुदर्शन मुर्गे के स्वामी थे. मुर्गा ‘कटखना’ श्रेणी में वर्गीकृत था. राह से आते-जाते राहगीरों के चरण-स्पर्श करने में त्रुटि नहीं करता था. धावक पथिकों का पीछा करता था. धावन-पथ पर ही धावक के पृष्ठभाग को प्रत्येक दशा में स्पर्श कर लेता था. स्मृति चिह्न के रूप में धावक की नश्वर देह का चुटकी भर हिस्सा ग्रहण कर लेता था. उसे वह अपनी चोंच को अर्पित कर ही मानता था.
खान साहब ने मुर्गे को अंधेरे में रखकर मादा-साहचर्य से विमुख रखकर क्रोधी बनाया हुआ था. एक दिन उन्होंने साधकों से उनके इस कुक्कुट को हरण करने की शर्त बदी थी. सफल होने पर इनाम की घोषणा भी की गई थी. खान साहब दोनाली के साथ सोते थे. निवार की चारपाई मुर्गी-बाड़े के निकट ही स्थापित रहती थी.
यहाँ भी रात्रिकालीन आरोहण किया गया था. खान साहब पर्यंक पर निद्रालीन थे. तो भी उनके चेहरे के ऊपर हथेली को दाएँ-बाएँ घुमाया गया था. इससे यह परीक्षा कर ली गई थी कि वे निद्रालीन है या जाग्रत हैं अथवा ओढ़ी हुई निद्रा है. निरीक्षण-परीक्षण से निश्चिन्त हो लिए थे. तत्पश्चात् मुर्गी-बाड़े की प्रदक्षिणा की गई थी. मुर्गे ने भी पूरा पराक्रम दिखाया था. वह चक्रण व भ्रमण करता रहा. बाड़े के अंदर इधर से उधर, उधर से इधर करता रहा. साधकों में तो धैर्य कूट-कूटकर भरा हुआ था. उन्होंने भी न तो आकुलता दिखाई थी, न ही व्याकुलता. वे प्रकृति के सिद्धांत को जानते थे कि “मुर्गा चला आएगा दबे पाँव, जैसे बदलते हैं मौसम” अंत में वाहमार्गी साधक को लगाया गया था. उन्होंने स्वर विशेष के सौजन्य से मुर्गे को स्तंभित कर डाला था. इस मुर्गे का भी सदेह उद्धार हुआ था.
उस दौर में कुक्कुट हरण क्षम्य-अक्षम्य अपराध की विभाजक संधि-रेखा पर माना जाता था. मुर्गे के स्वामित्व के बिलए वाउचर,फोटो पहचान पत्र की रीति-नीति नहीं थी. यह तथ्य साधकों के अनुकूल पड़ता था. शेष उनकी प्रतिभा पर निर्भर करता था.
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