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ओ गगास! छिन अकास-छिन पताल

अल्मोड़ा से श्रीनगर वाया रानीखेत

22 सितम्बर, 2019

बादलों की गड़गड़ाहट और बारिश की दणमण-दणमण रात भर होती रही. सुबह बारिश तो थम गई, परन्तु कोहरे ने अल्मोड़ा की पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया है. कोहरा देखकर लगता तो ऐसा है कि जैसे वह बारिश से नहाये अल्मोड़ा के बदन पर रह गई पानी की बूंदों को पोंछने आया हो. नारायण तिवाड़ी देवाल के पास शैलगांव के प्राचीन शिवमंदिर की घंटियों की आवाज रुक-रुक कर आ रही हैं. अल्मोड़ा की एक ऊंची धार पर ब्रिटिश जमाने का यह निजी बंगला अब गेस्ट हाउस है. लगभग 100 साल पुराने इस बंगले के नाक-नक्शे और मजबूती अभी भी बरकरार है. बस, उसमें साज-सज्जा का कुछ नया आवरण है. ब्रिटिश काल में बने भव्य भवनों और सार्वजनिक इमारतों के बाद पहाड़ में हमने नया क्या बनाया? मेरे पास इसके जबाब के लिए दायें-बायें देखने के अलावा कोई चारा नहीं है. (Almora Srinagar Journey Via Ranikhet)

अल्मोड़ा (समुद्रतल से ऊंचाई 1,642 मीटर) का नामकरण ‘अल्मड़ घास’ (रुमेक्स हेस्टाटा) जो यहां बहुतायत होती थी के कारण हुआ. कुमाऊं के चंद राजाओं के समय इसे राजापुर कहा जाता था. राजा कल्याण चंद ने सन् 1560 में कुमाऊं की राजधानी चम्पावत से हटाकर अल्मोड़ा में प्रतिष्ठापित की थी. कहा जाता है कि राजा कल्याण चंद के सामने अल्मोड़ा के खगमरा स्थल पर एक खरगोश ने बाघ का रूप ले लिया था. राजा को लगा कि दुश्मनों से बचाव के लिए यह जगह चम्पावत से ज्यादा सुरक्षित है. मुझे ध्यान आता कि सन् 1815 में सुर्दशन शाह ने भी विभाजित गढ़वाल की राजधानी पुरानी टिहरी में स्थापित कर दुश्मनों के आक्रमणों से बचने के लिए उपयुक्त मानी थी. अपने डर को सुरक्षित करते इन कुमाऊं-गढ़वाल के राजाओं का शासन कालातीत स्वयं ही समाप्त हो गया था. (Almora Srinagar Journey Via Ranikhet)

चलने को हुए तो इन्द्रेश ने बताया कि ‘धर्मपत्नी जी का अभी-अभी हुक्म हुआ है कि दाढ़ी बना लें और उसके बाद की फोटो तुरंत भेजें’. ‘अल्मोड़ा आज सुबह’ कैप्शन से भुलि मालती को मोबाइल से भेजी फोटो का यह नतीजा है. ‘अब भुगतो, बाहर की सरकार का विरोध करना आसान है पर घर की सरकार का विरोध करने का साहस विरले ही कर पाते हैं. और यह न्याय संगत भी नहीं है.’ मैं इन्द्रेश से कहता हूं.

इन्द्रेश जिस सैलून में दाढ़ी बना रहे हैं, उसकी बगल में मीट की दुकान है. उस दुकान से मीट लेता एक बुजुर्ग व्यक्ति दूसरे ग्राहक से कह रहा है कि यह मीट की दुकान बहुत पुरानी है. मेरा ध्यान खड़का और उस मीट की दुकान को देखकर प्रसिद्ध साहित्यकार शैलेश मटियानी का अल्मोड़ा में बिताया आत्म-संस्मरण मन में तैरने लगा है. ‘अरे, वह बिशनुवा जुवारी का बेटा और शेरसिंह बूचड़ का भतीजा लेखक बन रहा है. बाप-दादा उसके जुवा खेलते-खेलते ही खतम हो गए, चाचा भी सभी बूचड़ और जुवारी ही हैं…और वह लौंडा कविता-कहानियां लिख रहा है….. अरे, घोर कलियुग और किसे कहते हैं ? जुवारी का बेटा, बूचड़ का भतीजा सुमित्रा नंदन पंत-इलाचन्द्र जोशी बनने का सपना देख रहा है.’

इन्द्रेश की बनती दाढ़ी के समय का उपयोग मैं शैलेश मटियानी जी के अल्मोड़ा के इस संस्मरण की और पक्तियों को याद करके कर रहा हूं ‘… मेरा छोटा भाई स्कूल पढ़ने की उम्र में रामजे हाईस्कूल के सामने की फुटपाथ पर चूरन और मूंगफलियां बेचता था और मैं रोज तड़के उठकर दो-तीन बकरियों की खाल निकाल, उनका शिकार दुकान में ठीक से लगाकर, उनकी आंते साफ करने के बाद ही स्कूल जाया करता था. स्कूल से लौटने पर दुकान में बैठकर फिर शिकार बेचा करता था.’ मुझे लगता है ये वही दुकान है, जहां बैठकर अपनी किशोरावस्था में शैलेश मटियानी जी बूचड़ का काम करते थे. वो ‘शिकार की दुकान’ उनके चाचा शेरसिंह मटियानी की थी. मैं दुकान में जाकर इस दुकान का इतिहास पूछना चाहता हूं पर उसमें बैठे सज्जन की मजबूत कद-काठी देखकर संकोच कर गया हूं.

हम रामजे कालेज की ओर चल रहे हैं. उतराई की यह बाजारी सड़क रात की बारिश से अभी तक गजबज़ा रही है. सड़क के दोनों ओर के मकान-दुकान तो चकाचक हैं पर उनके आस-पास के पानी की निकासी रामभरोसे है. रात की नींद से बाजार जागने की मुद्रा में है, पर बारिश की हल्की ठंड से अलसाने का असर भी उस पर है. सुबह-सुबह घरों से अखबार और दूध लेने आये लोगों की हड़बडी सभी जगह एक जैसे ही होती है. यहां भी दिख रही है. खाली बड़ी-बड़ी टोकरियों को सिर पर रखे ग्रामीण महिलायें बाजार में यहां-वहां हैं. ये बहिनें निकटवर्ती अपने गांवों से प्रमुखतया तरकारी, दूध और खोया बेचने रोज सुबह-सुबह अल्मोड़ा बाजार आती हैं. अब वापस अपने घर-गांव जाने की जल्दी में हैं. पहाड़ी नगरों की जरूरतों में नजदीकी गांवों का यह योगदान है तो बहुत महत्वपूर्ण, परन्तु उसे उन गांवों और इन बहिनों के हक में विकसित करने के मजबूत प्रयास नहीं हो पा रहे हैं.

रामजे इंटर कालेज के प्रांगण में ‘शमशेर स्मृति समारोह’ में आए मित्रों की गहमागहमी है. किसी व्यक्ति के स्मृति दिवस का उत्सव में तब्दील होना, उस व्यक्ति के जीवन की सार्थकता को अभिव्यक्त करता है. शमशेर दा की मधुर यादों का यह ‘मित्रों का उत्सव’ ऐसा ही दिव्यमान दिख रहा है. मित्रों का यह उत्सव उस मित्र के प्रति समर्पित है जो सार्वजनिक जीवन में सच्चे अभिभावक की भूमिका में हमेशा साथ रहा था. उसका आत्मीय संबल मित्रों का आत्मबल बना. उत्तराखंड के जननायक शमशेर सिंह बिष्ट की प्रथम बरसी पर जुटे सैकड़ों साथियों की यह मौजूदगी उनके विचारों और कार्यों का जीवंत प्रवाह है.

अल्मोड़ा बाजार अब पटालों (चौड़े-सपाट पत्थरों) का नहीं रहा. कहीं-कहीं इधर-उधर किसी पैच पर पुराने बिछे पठाल अगर दिख रहे हैं तो चलते-चलते पांव उधर जायेंगे ही. अपनों का स्पर्श जो मिल रहा है खुद मुझे और उन पटालों को. व्यक्ति पर अतीत का आकर्षण और वर्तमान का आक्रमण ज्यादा प्रभावी होता है. असल में पुराने शहर की दुकान, मकान, गली और मोड़ को केवल देखना भर नहीं होता है. वे तन-मन को यादों से सहलाते हुए आनंदित भी करते हैं. कारखाना बाजार से गुजरते हुए नारायण दा का होटल दिखा तो लगा अभी मैं वहीं से भर-पेट भात खाकर बाहर आ रहा हूं. युवा-काल में फाके के कई दिनों और रातों का मेरे जैसे कई मित्रों का पालन-पोषण नारायण दा के होटल ने ही किया था.

23 सितम्बर, 2019


सुबह-सुबह कहीं जाने की फरफ़राहट में जल्दी के बजाय अल्झाट ही ज्यादा होती है. थोड़ा देर से सही हम अल्मोड़ा-पिथौरागढ़ सड़क पर 8 किमी. की दूरी पर स्थित चितई मंदिर पहुंचे हैं. यहां न्याय के देवता गोलूजी का मंदिर है. गोलू कुमाऊं के ईष्ट देव हैं. अनगिनत घंटियों से घिरे इस मंदिर को ‘घंटियों वाला मंदिर’ भी कहते हैं. मान्यता है कि यहां पर भक्तों की मनोकामना अवश्य पूर्ण होती है. मंदिर में गोलू देवता धनुष-बाण लिए घोड़े पर सवार हैं. गोलूजी को लिखी और लटकी हजारों चिठ्ठियाँ यहां दिखाई दे रही हैं. कुछ लोगों ने तो स्टाम्प पेपर लिख कर गोलूजी के दरबार में अपनी अर्जी लगाई है. ज्यादातर महिलाओं के लिखे पत्र हैं. स्वाभाविक है कि हमारे समाज में महिलाएं अधिक कष्टों में हैं. साथ ही परिवार के कल्याण के लिए वे अधिक चिंतित भी रहती हैं.

चितई का मंदिर

सुबह का नाश्ता कोसी में हो तो दिनभर तरावट रहती है. पहाड़ी ककड़ी, राई, छांछ-दही और उसमें जमकर पड़ी हरी मिर्च वाले रायते से आदमी के बंद कंठ शर्तिया खुल जाते हैं. यात्रा में मेरे साथी सीताराम और इन्द्रेश इसके अभी के ताजा-ताजा प्रत्यक्ष उदाहरण हैं.

कोसी से हल्की चढ़ाई के बाद रानीखेत की ओर धार-धार का रास्ता है. कोसी से रानीखेत 33 किमी. है. रास्ते में क्वाराली, द्वारसौं, कठुपुड़िया, नैनीसार और मजखाली गांव हैं. अब इन्हें पहाड़ी गांव कहें या फिर देश के बड़े पूजीपतियों, नौकरशाहों और भू-माफियाओं की पहाड़ों में स्थित परिसम्पतियां कहें. अनुमान है कि क्वाराली से मजखाली तक की 30 किमी. वर्ग क्षेत्र की 30 से 40 प्रतिशत जमीनें उक्त बाहुबलियों के कब्जे में आ चुकी हैं. मजखाली गांव के आस-पास तो यह प्रतिशत 60 से 70 तक है.

सुन्दरता सबको अच्छी लगती है, चाहे वह प्राकृतिक हो या मानवीय. पर सुन्दरता के खतरे भी खतरनाक होते हैं. सुन्दरता हमेशा ताकतवर के निशाने पर रहती है. यही हाल हुआ है इस क्षेत्र का. प्राकृतिक सौंदर्य से लदे इन गांवों के सामने हिमालय का विस्तृत ललाट फैला है. अतः इन खूबसूरत जगहों को खरीदने की भू-पिपासुओं की नजरें हमेशा यहां टिकी रही हैं. दशकों पहले से जमीनें बेचने का सिलसिला जो शुरू हुआ उसने यहां के पारिस्थिकीय तंत्र को अब प्रभावित करना शुरू दिया है. इसी क्रम में नैनीसार में हुए जन-आन्दोलन ने भविष्य में इस समस्या के भयावह रूप में सामने लाने का प्रयास किया है.

रानीखेत का गोल्फ मैदान – कालिका – हमारे बायीं ओर है. यह दुनिया के बेहतरीन गोल्फ मैदानों में माना जाता है. एशिया के गोल्फ मैदानों तो सिरमौर है. ठंडी सुबह के साफ मौसम में पूरे ढ़लवा मैदान की घास पर ओंस की बूदें अभी तक फैली हुई है. गोल्फ मैदान के कुछ ही आगे घिंघरियाखाल है. रानीखेत यहां से सीधी सड़क से 3 किमी. की दूरी पर है. दायीं ओर को मुड़ने वाली सड़क द्वाराहाट-कर्णप्रयाग को है. हमारी गाड़ी अब इसी उतार वाली सड़क पर दौड़ लगा रही है.

घिंघारीखाल से 4 किमी. पर पहला गांव चौकुनी है. चौकुनी गांव से आगे झूले की लम्बी-लम्बी पेगों की तरह इधर से उधर पहाड़ी ढ़लान पर सड़क पसरी हुई है. सड़क के ऊपर और नीचे जगह-जगह पर नये भवनों की भरमार है. पहाड़ की धार से ही गगास नदी के ऊपर बना पुल दिखने लगा है. गगास नदी दूनागिरि के भाटकोट पर्वत से निकल कर रास्ते में चंदास नदी और बलवागाड़ को साथ लेते हुए भिकियासैंण में पश्चिमी रामगंगा में मिल जाती है.

गगास के बारे में मशहूर है कि ‘गगास, छिन अकास, छिन पताल’ (गगास नदी कभी आकाश है तो कभी पाताल है) अर्थात वह क्षण-प्रतिक्षण बदलती रहती है. गढ़वाल की नयार नदी की तरह बरसात में यह खूब मदमदाती है. गगास नामकरण का नाता गर्ग ऋषि से जोड़ा जाता है.

गगास नदी

आज फिर गगास नदी को देख कर मुझे मित्र अशोक पाण्डे की ये कविता याद आयी है:

ओ गगास!

वर्डसवर्थ के गांव की नदी की तरह,
अगर तुम मेरी कविता का कालजयी हिस्सा न बन पाओ
तो ओ मेरे गांव की नदी !
तुम मेरी कविता की सीमाओं को माफ कर देना ...

गगास नदी पार करते ही चढ़ाई वाला रास्ता शुरू हो गया है. रानीखेत वाला पहाड़ अब हमारे बाईं ओर है. यहां से चौबटिया, रानीखेत, चिनियानौला, कालिका रेंज अलग-अलग टापूओं की तरह लग रहे हैं. रानीखेत से लगभग 15 किमी. उतरे हैं. अब इतना ही चढ़कर द्वाराहाट पहुंचना है. तल्ली मिरई, मल्ली मिरई और ड़डोली गांव के बाद द्वाराहाट नगर के दर्शन हुए हैं.

इससे पिछली यात्रा का हाल जानने के लिए अरुण कुकसाल का यह लेख भी पढ़ें: एशिया की सुन्दरतम घाटी है सोमेश्वर घाटी

डॉ. अरुण कुकसाल
(यात्रा के साथी- सीताराम बहुगुणा और इन्द्रेश मैखुरी)

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