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1984 में अल्मोड़े के विज्ञापनों की दुनिया

इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि सफ़ेद को सुंदर और काले को बदसूरत मानने के चलन में विज्ञापन की कितनी  बड़ी भूमिका है. लेकिन इस बात के पूरे साक्ष्य उपलब्ध हैं कि सौन्दर्य प्रसाधन की वस्तुओं ने काले रंग को कमजोर आत्मविश्वास, हीनभावना और सफ़ेद रंग को शादी होने से लेकर नौकरी पाने तक की पहली शर्त के रूप में स्थापित कर दिया है. फेयरनेस मीटर इसी आधुनिक विज्ञापन बाजार का दिया उपकरण है.

2000 के आस-पास टीवी में चार औरतें आई चारों से सफ़ेद पल्लू हिलाकर बताया चार बूंदों वाला उजाला होता है. नील जो अब तक सफ़ेद कपड़ो पर किया जाता था वह एक वाहियात चीज है और चार बूदों वाला उजाला ही वह पौराणिक तत्व है. उजाला को हमने उसी प्रकार अपनाया जैसे हम शास्त्रों के अनुसार अपनाई जाने वाली चीजों को ग्रहण कर लेते हैं. बहरहाल हमने बिजली सी चमक वाले रिन को ही सफेदी का जिम्मा दे दिया है.

90 के दशक में भारत में वैश्वीकरण आया जिसने विज्ञापन का स्वरूप ही बदल दिया. विज्ञापन देना जहां इससे पहले डिसट्रीब्यूटर की जिम्मेदारी थी वह अब उत्पादक के जिम्मे आ गयी. वैश्वीकरण ने विज्ञापन के पूरे बाजार को बदल दिया.

आज विज्ञापन का पूरा बाजार मनोविज्ञान पर आधारित है उदाहरण के तौर पर आप बोर्नविटा के विज्ञापनों को देखिये. शुरुआत में यह दूध का स्वाद बदलने वाले पोषक तत्वों के नाम से आया फिर बच्चों के लिये उन तत्वों को लेकर आया जो दूध में नहीं थे आज बार्नबिटा मां की ममता के नाम पर बिक रहा है. दूध में मिलाने वाले इन पाउडरों के विज्ञापन के आधार पर आज अगर आप अपने बच्चे को केवल दूध देती हैं तो आपको अपनी ममता पर शक करने का पूरा अधिकार है.

ख़ैर, श्री लक्ष्मी भंडार अल्मोड़ा द्वारा प्रकाशित ‘पुरवासी’ 1980 से  प्रकाशित एक नियमित पत्रिका है. 1984 में इसका पांचवां अंक छपा था जिसमें छपे कुछ विज्ञापनों की तस्वीरें नीचे लगी हैं. हर विज्ञापन की अपनी विशेषता है जैसे विज्ञापन के नीचे लिखा चार अंकों का फोन नंबर, चिकित्सा आधिकारी के परिवार नियोजन पर जारी विज्ञापन में कुमाऊंनी में पैल जल्दी नै, दूसर अल्ले नै तिसर कभै नै लिखा होना, मिष्ठान भण्डार के मालिक के नाम के आगे प्रो. का लगा होना, टाइपराइटर से लेकर उसकी इंक के विज्ञापन की लिखावट, घड़ियों के विज्ञापन में ध्वन्यात्मक शब्दों का प्रयोग 98% में शानदार हिन्दी का प्रयोग, 99% विज्ञापन बिना चित्र के. देखिये पुरवासी के 1984 के पांचवें अंक की कुछ तस्वीरें.

 

 

 

 

 

 

 

 

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Girish Lohani

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