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अपने ही कलाकारों का तिरस्कार कर संस्कृति का कैसा महोत्सव मनाया जा रहा है अल्मोड़ा में

मैं ये बात अब कहना जरूरी समझता हूँ या अब चुप नहीं रहा जाता. कल ठीक इसी समय फ़ोन पर अपने दगड़ी से इस बात पर चर्चा हो रही थी कि एक महान लोकगायक की बेटी के लिए अपना इलाज कराना असंभव हो रखा है हम दिहाड़ी लोग कैसे उनकी मदद कर सकेंगे. हर बार पब्लिक फंडिंग करना मुश्किल है हमारे लिए. ठीक इसी वक़्त संस्कृति का तमगा लगाये अलमोड़ा शहर महोत्सव की चमक धमक में रमा हुआ है. होना भी चाहिए इस शहर की पहचान पुख्ता होनी चाहिए. पूरी दुनिया का लोक संगीत यहाँ प्रस्तुत किया जाना चाहिए.  A Farce called Almora Mahotsav

देश दुनिया के तमाम समकालीन संगीत को आमंत्रित करना चाहिए. गौरव मनकोटी, पवनदीप राजन, संकल्प खेतवाल जैसे नौजवानों ने टेलीविजन के राष्ट्रीय प्रसारण में जगह बनाई है. हमें इस बात की खुशी मनानी चाहिए. A Farce called Almora Mahotsav

पर अपने लोगों का तिरस्कार, अपने कलाकारों का तिरस्कार, अपनी स्थानीय लोकाभिव्यक्ति का तिरस्कार – ये कौन सा महोत्सव है भाई. संगीत की जड़ में जाकर देखो. लोकसंगीत का जो स्रोत है उसकी हालत क्या है? इसी अल्मोड़ा से 5 km किसी भी ओर चल दो और देखो कि लोक के कलाकार किस हालात में हैं. अपने पारंपरिक लोककला के जरिये कोई जीवन जीने की स्थिति में है?  कोई नहीं है.

उधर जोहार से लेकर गेवाड़ घाटी तक और काली कुमाऊँ से लेकर नाकुरी की रंगीली भूमि तक हमारे गीदार, हमारे भगनौल गायक, हमारे शकुनाखर, चैती, बसंत, न्योली, जागर, रमौल गानेवाले लोग मुश्किल से जीवन की जुगत जुटा रहे हैं तब तुम 4-सितारे कलाकार लाकर इतरा रहे हो. हमारे थल के इलाके के आन सिंह, रीठगाड़ के नारायण राम, सालम की जीवंती देवी और रमेश गोस्वामी, और भी पहाड़ के अलग अलग बोलियों के अनगिनत गुमनाम गायक वादक इस स्थिति में नहीं हैं कि गा बजाकर कुछ अर्जित कर लें. सरकारी मद्दद के नाम पर उन्हें बीरबल की खिचड़ी थमा दी गयी है. इन कलाकारों के जीवन तक तुम्हारे अल्मोड़ा महोत्सव की आयातित रोशनी पहुँच सकती है क्या? कभी नहीं.

फिर क्या फायदा ऐसे महोत्सव का. हमारे चैती, बसंत, रमौल, भगनौल खोते जा रहे हैं बल्कि खो ही गए. उसके लिए क्या कोई महोत्सव है किसी के खयालों में. इसी शहर में लोककलाकार गोपाल चमियाल ने कलाकारों की मांग को लेकर आमरण अनशन किया था. जाने क्या समाधान निकला उस मामले का. आज तक पता नहीं.

शहर के युवाओं से कहना चाहूंगा कि शहर से बाहर निकलो, जाओ अपने गाँव, अपने पुराने घर-आँगन में. वहां देखो जो लोग पहाड़ को जी रहे हैं उनकी कितनी अभिव्यक्ति है आज. सितारों की चमक और लाउडस्पीकर की घमक में खो मत जाना. अपने लोगों और अपने लोगों की स्थिति को भी जरूर देखना.

-अल्मोड़ा से नीरज भट्ट

नीरज भट्ट

अल्मोड़ा में रहने वाले और आकाशवाणी से जुड़े हमारे साथी नीरज भट्ट ने यह अपील अपनी फेसबुक वॉल पर प्रकाशित की है. ऐसा पहली बार नहीं हो रहा है कि अल्मोड़ा महोत्सव में स्थानीय कला और उसके साधकों की उपेक्षा हो रही है. पिछले वर्ष हुए इस महोत्सव को लेकर भी हमने तकरीबन यही बात कहते हुए पोस्ट लगाई थी जिसे इस लिंक पर पढ़ा जा सकता है – अल्मोड़ा की पहचान खोता अल्मोड़ा महोत्सव

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