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सीएमएस की कुर्सी और सिस्टम का पोस्टमार्टम ?

इन दिनों बागेश्वर जिला अस्पताल भीतर ही भीतर सुलग रहा है. सिस्टम किसी के भी संभालते सँभल नहीं पा रहा है. अस्पताल की सभी व्यवस्थाओं की देखरेख के लिए ज़रूरी सीएमएस की कुर्सी खाली पड़ी है.

कहा जाता है कि अस्पताल वो जगह होती है जहाँ मरीज इलाज की उम्मीद लेकर आते हैं. लेकिन बागेश्वर जिला अस्पताल में हालात उल्टे हैं। यहाँ मरीज तो क्या, खुद अस्पताल का सिस्टम ही आईसीयू में पड़ा कराह रहा है. मरीजों को दवाई चाहिए, पर दवाई नहीं है. डीलर कहता है कि, पहले पिछला दो करोड़ का हिसाब चुकाओ, फिर नई दवा मिलेगी. सरकार का सिस्टम कहता है, पहले कागज़ों का पेट भरो, फिर मरीजों का पेट देखना. और डॉक्टर सोचते ही रह जाते हैं, क्योंकि उन्हें मेडिकल कॉलेज में यह तो पढ़ाया ही नहीं गया था कि दवा कहाँ से खरीदनी है और बिल किस फाइल में फँसा है.

डॉक्टर बेचारे सिस्टम के हड्डी-जोड़ विशेषज्ञ नहीं हैं कि टूटी-फूटी फाइलें जोड़ें. उनका तो बस इतना कसूर है कि उन्होंने मेडिकल पढ़ाई कर ली और नौकरी पकड़ ली. 

जिला अस्पताल का सबसे चर्चित पद है, सीएमएस. लेकिन यह कुर्सी अब अस्पताल की कुर्सी नहीं, बल्कि फाँसी का फंदा बन गई है. जिसे भी इस पर बैठाने की कोशिश होती है, वह रात भर सपने में देखता है, उसकी तस्वीर अस्पताल के गलियारे में लगी है, कैप्शन के साथ: ‘पूर्व सीएमएस, बलि का बकरा.’

सरकार ऊपर से दबाव डाल रही है कि सीएमओ किसी डॉक्टर को सीएमएस बना दें. सीएमओ नीचे डॉक्टरों से मिन्नतें कर रहे हैं, डॉक्टर साहब, आप बैठ जाइए, भगवान आपको लंबी उम्र देगा. और डॉक्टर हाथ जोड़कर पीछे हट जाते हैं, लंबी उम्र तो भगवान से चाहिए, शासन से नहीं. 

सीएमओ साहब का हाल यह है कि उन्हें अस्पताल में खाली कुर्सियाँ दिख रही हैं, डॉक्टर भागते नज़र आ रहे हैं, दवाइयाँ गायब हैं, मरीज कतार में तड़प रहे हैं, लेकिन अचरज है कि उन्हें अपने ही दफ्तर में बैठे एसीएमओ साहेबान बिल्कुल नहीं दिखते, जबकि वही शासन—डॉक्टर—मरीजों के बीच ‘सेतु’ का काम कर सकते हैं. 

अस्पताल के ज्यादातर डॉक्टर भ्रष्टाचार से लिप्त इस तंत्र को हैंडल करना जानते ही नहीं हैं. दवाइयों का स्टॉक खत्म है. नई डिमांड भेजने पर डीलर करोड़ों के बकाये का तकाज़ा करता है. उसका बिल शासन की फाइलों में उलझा पड़ा है. इधर सीएमओ पर दबाव है, उधर डॉक्टर बलि का बकरा बनने को तैयार नहीं. असल दिक्कत यह है कि भ्रष्टाचार का दलदल इतना गहरा है कि कोई उसे उखाड़ने की हिम्मत नहीं करता. डर सबको है कि कहीं उसी पर इल्जाम न मढ़ दिया जाए. अब हालत यह है कि जो डॉक्टर ऑपरेशन थिएटर में सर्जरी करने में माहिर हैं, उन्हें सिस्टम की सर्जरी करने के लिए मजबूर किया जा रहा है. लेकिन सिस्टम का कैंसर इतना पुराना है कि उसकी दवा किसी भी मेडिकल बुक में नहीं लिखी गई है.

बागेश्वर जिला अस्पताल आज बिल्कुल उस नाव की तरह है, जिसका कोई खेवनहार नहीं. मरीज भगवान भरोसे हैं, डॉक्टर मेडिकल पर जाने लगे हैं और अति होने पर नौकरी छोड़ने की सोच रहे हैं, सीएमओ आंख मूँदे बैठे हैं और सरकार को लग रहा है, सब ठीक है.

सवाल यह है कि जब खुद सिस्टम ही बीमार हो, तो मरीज का इलाज कौन करेगा? शायद इसलिए अब अस्पताल के बाहर नया बोर्ड लगाना चाहिए, ‘यहाँ इलाज नहीं होता, बस सिस्टम का पोस्टमार्टम होता है.’ 

वैसे ये किसी ने सोचा है कि, डॉक्टर ही सिस्टम का इलाज करने लगें तो मरीज का इलाज कौन करेगा?

बागेश्वर में रहने वाले केशव भट्ट पहाड़ सामयिक समस्याओं को लेकर अपने सचेत लेखन के लिए ख़ास जगह बना चुके हैं. ट्रेकिंग और यात्राओं के शौक़ीन केशव की अनेक रचनाएं स्थानीय व राष्ट्रीय समाचारपत्रों-पत्रिकाओं में छपती रही हैं.

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