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तिलाड़ी गोलीकाण्ड के बाद क्या हुआ था उत्तराखंड के जनरल डायर चक्रधर जुयाल का

तिलाड़ी गोलीकाण्ड के संबंध में अधिकांश किताबों में लिखा गया है कि तिलाड़ी गोलीकाण्ड के समय महाराजा नरेंद्रशाह यूरोप यात्रा पर थे और घटना की जानकारी के बाद वह तुरंत वापस लौट गये.

जब महाराजा नरेंद्र शाह लौटे तो उन्होंने चक्रधर जुयाल के कार्य की प्रशंसा की और अभियुक्तों पर मुकदमें चलाये. इस काण्ड के बाद चक्रधर जुयाल की छवि को आघात पहुंचा था. राज्य के बाहर के अनेक समाचार पत्रों ने रंवाई काण्ड के विषय में लेख लिखे. गढ़वाली, हिन्दू संसार, अभय, इंडियन स्टेटस रिफौरमर आदि में टिप्पणीयां छपती रही.

हिन्दू संसार ने चक्रधर जुयाल और महाराज के विरुद्ध एक लेख छापा जिसके कारण उसके सम्पादक, प्रकाशक और गढ़वाली के संपादक विश्वम्भरदत्त चन्दाला पर अभियोग चलाया गया. गढ़वाली में एक छपे लेख में एक रंवाई के रहने वाले के नाम से रंवाई काण्ड के बारे में एक लेख छपा जिसमें लिखा था

30 मई को तिलाड़ी नामक स्थान पर दीवान चक्रधर ने गोली चलाने के आदेश दिये. मृतकों की संख्या 100 से अधिक और घायलों की संख्या का अंदाजा नहीं.

टिहरी दरबार ने इस ख़बर के संबंध में जो प्रतिवाद भेजा उसके अनुसार मरने वालों की संख्या 4 और घायलों की संख्या 2 बतायी गयी. इसी में बताया गया कि 194 आंदोलनकारी गिरफ्तार हुए.

दरबार की ओर से संपादक चंदोला से आग्रह किया गया कि वह संवादाता रंवाई निवासी का नाम व पता दें. ताकि गलत ख़बर छापने के लिये उस पर मुक़दमा चलाया जा सके. चंदोला ने नाम पता बतानेने और मांफी मांगने से इंकार कर दिया.

चक्रधर जुयाल ने रंवाई काण्ड को लेकर जो रिपोर्ट भेजी उसमें उसने लिखा कि

मुझे रंवाई के थोकदार रणजोरसिंह ने यह बतलाया कि भवानीदत्त ( उनियाल ), विश्वम्भर दत्त (चंदोला), और सदानंद (नैथाणी) ने ढंडकियों को विश्वास दिलाया कि राज्य की सेना उनके साथ मिली हुई है. इससे में इस निश्चय पर पहुंचा हूँ कि यह सारा उपद्रव भवानीदत्त उनियाल और उसके पिट्ठू सदानंद नैथाणी और गढ़वाल पत्रिका के संपादक विश्वम्भरदत्त चंदोला द्वारा भड़काया गया था. राजा के विरुद्ध प्रजा को उभाड़ने के उदेश्य से रंवाई के भोले निवासियों को कई ऐसी मनगढ़न्त कहानियां सुनाई गयी कि ब्रिटिश सरकार महाराजा को नहों रखना चाहती. चक्रधर के विरुद्ध जनता को उकसाने के लिये कहा गया कि वह तो ब्रिटिश सरकार का एजेंट है.

चक्रधर जुयाल में अपनी खोई प्रतिष्ठा को पाने के लिये लार्ड इरविन और उसकी पत्नी के देहरादून आगमन पर भव्य स्वागत समारोह रखा. इरविन ने चक्रधर जुयाल से खुश होकर जनता को एक छोटा सा भाषण भी दिया और चक्रधर जुयाल के साथ तस्वीर भी खिंचाई. वायसराय ने उसे बाजू में लगाने की सोने की जरी वालीई पट्टी का जोड़ा भी दिया.

चक्रधर जुयाल ने 1939 में स्वास्थ्य कारणों से अपने पद से इस्तीफा दे दिया. कहते हैं कि चक्रधर जुयाल की नज़र तभी से कमजोर हो गयी थी और कुछ समय बाद उसने अपनी आँखों की रोशनी खो दी. 24 दिसंबर 1948 को 72 साल की उमर में चक्रधर जुयाल की मौत हो गयी.

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– काफल ट्री डेस्क

सन्दर्भ ग्रन्थ – शिवप्रसाद डबराल की किताब टिहरी-गढ़वाल राज्य का इतिहास – 2.

कोई नहीं चाहता कि तिलाड़ी आंदोलन पर बात हो
रंवाई, लोटे की छाप की मुहर और तिलाड़ी कांड
तिलाड़ी काण्ड के अठ्ठासी बरस

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Girish Lohani

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