Featured

वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के परिवार संग यह बेरुखी कितनी सही

1 अक्टूबर का दिन वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली की पुण्यतिथि का दिन है. उत्तराखंड राज्य में शायद ही कोई ऐसा सक्रिय नेता रहा होगा जिसने बीते 1 अक्टूबर को वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के सम्मान में कुछ कहा न होगा. क्या पक्ष क्या विपक्ष सोशियल मीडिया में सभी ने कुछ न कुछ पोस्ट किया. अदम्य साहस, अमर सपूत, महान स्वतंत्रता सेनानी जैसे न जाने कितने शब्द वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के सम्मान में लिखे गये और कहे गये.
(Veer Chandra Singh Garhwali Family)

वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली का परिवार पिछले सालों से अपनी जमीन की लड़ाई लड़ रहा है. परिवार इस कदर परेशान है कि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान भेजने की गुजारिश की तक कर चुका है.

दैनिक अख़बार अमर उजाला में परिवार से जुड़ी नवीनतम खबर के अनुसार उनके पौत्र देशबंधु गढ़वाली ने बताया –

हम नजीबाबाद की ग्राम पंचायत गूढ़ा के मतदाता है. हमारा घर बिजनौर की सीमा में होने के कारण करीब चार साल पहले कोटद्वार पालिका की मतदाता सूची से उन्हें बाहर कर दिया गया था. वन रेंज साहनपुर की हल्दूखाता में उनके केवल दो ही घर हैं सड़क के दूसरी ओर कोटद्वार है. उन्हें कोटद्वार से पानी मिलता है, लेकिन यह कनेक्शन भी कब कट जाए पता नहीं है. ऐसे में उन्होंने ग्राम प्रधान से हैंडपंप लगवाने की मांग की थी, जो आज तक पूरी नहीं हुई. परिवार ने बताया कि 99 साल की लीज पर जो पट्टा उनके दादा चंद्र सिंह गढ़वाली को मिला था वह अब वारिसों के नाम पर दर्ज नहीं हो रहा है.   
(Veer Chandra Singh Garhwali Family)

ऐसा नहीं है कि वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के परिवार के विषय में उत्तराखंड के नेताओं को जानकारी नहीं है. पिछले कई सालों से स्थानीय अखबारों ने इस खबर को प्रमुखता से छापा लेकिन ने नेताओं के कान में जूं न रेंगी न सरकार कभी कुछ कर सकी. मामला बरसों से उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश राज्य के बीच लटका हुआ है. वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली के परिवार की यह स्थिति बताता है कि नेताओं द्वारा हमारे स्वंत्रता सेनानी और महापुरुषों के सम्मान में कहे गये शब्द कितने खोखले होते हैं.  
(Veer Chandra Singh Garhwali Family)

काफल ट्री फाउंडेशन

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

कानिया के प्रेम में दीवानी सुबनी : लोककथा

रात ढलते ही जब सुबनी और लाली दोनों बहनें पानी भरने के लिए गाँव के…

1 day ago

चीड़ की छाल को कलाकृतियों का रूप दे रहा एक कलाकार

चीड़ के जंगल उत्तराखण्ड के कुमाऊं व गढ़वाल क्षेत्र में 900 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर बहुतायत में पाये…

1 day ago

मेरी यादों का पहाड़ : एक बहुआयामी किताब

2013 सन् में नेशनल बुक ट्रस्ट ने देवेन्द्र मेवाड़ी की किताब 'मेरी यादों का पहाड़' छापकर सराहनीय…

1 day ago

पहाड़ की पुकार जो खींच ले गई मुझे

नौ साल बाद पिथौरागढ़ जा रहा था. पिछले कुछ वर्षों में जब भी छुट्टी मिली, बेटी…

5 days ago

‘मनिला डांडे की देवी मां आज बहुत उदास है

देवी मां उदास है परन्तु परलोक गया पुत्र आज भी यादों में आकर उसको हिम्मत…

5 days ago

सोशियल इकोनॉमी ऑफ हिमालय : हिमालय की सामाजिक अर्थव्यवस्था का आरंभिक अकादमिक अध्ययन

पिछली कड़ी : उत्तराखंड राज्य की अवधारणा किसी एक नेता या आंदोलन से नहीं बनी…

1 week ago