फोटो : सुधीर कुमार
अगर 1200 वोटर पर एक बूथ वाला नियम नहीं होता तो उस बूथ पर वह अकेला वोटर होता. सरकार तो कुछ नहीं कर पायी चुनाव आयोग ने आज पहली बार इस अकेले वोटर के लिए कुछ किया है. बड़ी मुश्किल से पहाड़ पर 1200 वोटर इकट्ठा कर उसके लिए एक बूथ बनाया है. इस बार बूथ उसके घर से 12 किमी दूर है. हर चुनाव में उसके घर की और बूथ की दूरी बढ़ रही है लेकिन वे फिर भी पहुंचता है. (Column by Rajiv Pandey)
चार चुनावों में उसने बहुत कुछ खोया है लेकिन उसका जीवन अभी चुनाव का मुद्दा नहीं बन पाया. राज्य बनने के बाद हुए पहले चुनाव में जब वह वोट डालने आया था तो उसके पीछे उसकी घरवाली थी, दो बेटे थे और एक बहू थी. जिन रास्तों से वह वोट देने जाता था उसके अगल-बगल खूब हरे-भरे खेत थे. रास्ते में कई लोग मिलते थे जिनसे चुनावी चर्चा करते हुए वे बूथ तक पहुंचता था. बूथ कितने ही दूर हो वह सरकार चुनने हर बार पहुंचा.
जिस साल उसकी घरवाली पेड़ से गिरकर मरी वह उस साल भी वोट डालने आया था. हालांकि घरवाली के इलाज के लिए धक्के खाते वक्त उसने सोचा था इस बार साला किसी को वोट नहीं दूंगा. जंगल में तड़पती बीवी को उसने किसी तरह लोगों की मदद से सड़क पर पहुंचाया था. बांस के डंडों में बंधी कुर्सी पर बैठी उसकी घरवाली दर्द से खूब चीखी-चिल्लायी थी लेकिन चीखने-चिल्लाने से न रास्ता छोटा हुआ और न सड़क उसके पास आई थी. सड़क पर पहुंचकर उसने 108 एंबुलेंस को कई फोन किए थे लेकिन 108 तब आती जब उसमें तेल होता. किसी तरह टैक्सी बुक कर घरवाली को ओखलकांडा से हल्द्वानी सुशीला तिवारी अस्पताल पहुंचाया था.
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कुमाऊं के सबसे बड़े अस्पताल में उस अभागी के ग्रुप का ब्लड तक नहीं मिला. किसी तरह निजी ब्लड बैंक से लाकर घरवाली को खून चढ़ाया था. खून चढ़ाने के बाद डॉक्टर ने कहा कि इनका इलाज यहां संभव नहीं है प्राइवेट में ले जाओ. बेचारा लेकर गया. दो खेत बेचकर एक हफ्ते ही प्राइवेट अस्पताल में इलाज करवा पाया था. इसके बाद टूटी-फूटी बीवी को घर ले आया और रोज धीरे-धीरे मरते हुए देखता रहा. उस साल वोटिंग से कुछ दिन पहले ही उसकी बीवी मरी थी. घरवाली की चिता को आग लगाते हुए उसने सोचा था सड़क होती, अस्पताल होता तो उसकी बीवी बच जाती. वे अपने उन आखिरी दो खेतों के बारे में भी सोच रहा था जो बीवी के इलाज में बिक गए थे. (Column by Rajiv Pandey)
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वह उस चुनाव में भी वोट देने आया था जब उसके बेटे और बहु उसे छोड़कर दिल्ली चले गए थे. बड़ी बहस हुई थी उसकी बेटे से लेकिन बेटा नहीं माना. उसने साफ-साफ कह दिया था बाबू इन खेतों के पीछे लगकर अब कोई फायदा नहीं. यहां बंदर और सुअरों से लड़कर मरने से बेहतर है दिल्ली में मजदूरी करेंगे. पूरा गांव इन बंदरों, सुअरों से लड़ते हुए खाली हो गया है. क्या आपको लगता है हमारा अकेला परिवार इनसे जीत पाएगा? अपने बाबू को समझाते हुए बेटे ने कहा था फिर आपके नाती को स्कूल भी तो भेजना है अगले साल से. यहां कहां पढ़ेगा? यहां स्कूलों में तो बैठने के लिए चटाई तक नहीं है आप पढ़ाई की सोचते हो? नाती के भविष्य के साथ वे भी खिलवाड़ नहीं चाहता था इसलिए मरे मन से जाने दिया था उसने बेटे के परिवार को.
वह उस साल भी वोट डालने आया था जब उसका छोटा बेटा डिग्री के लिए हल्द्वानी चला गया था. उसके पास इतने पैसे नहीं थे कि बेटे को पढ़ने के लिए हल्द्वानी भेज सके. उसने बेटे के सामने पास के ही डिग्री कॉलेज में पढ़ने का प्रस्ताव भी रखा था. तब बेटे ने बताया था बाबू यहां के कॉलेजों की हालत प्राइमरी स्कूलों से भी बदतर है. यहां पढ़ना न पढ़ना बराबर ही. तब उसने बेटे को बताया था इतने रुपये कहां से आएंगे. बेटे ने कहा था मैं खुद जुगाड़ लूंगा बाबू. उसका बेटा अब एक शॉपिंग मॉल में नौकरी करते हुए अपनी डिग्री की पढ़ाई कर रहा है. अब वह अकेला गांव में रहता है. इस बार वह अकेला ही वोट देने आएगा. (Column by Rajiv Pandey)
राजीव पांडे की फेसबुक वाल से, राजीव दैनिक हिन्दुस्तान, कुमाऊं के सम्पादक हैं.
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