पर्यावरण

नैनीताल क्षेत्र में सिटोलों के पैर क्यों गलने लगे

एक तरफ कोरोना जैसी महामारी का दौर तो दूसरी ओर घरेलू मैना या सिटोला पक्षी में वर्ष 2015 में तस्दीक की गयी बीमारी फिर देखने को मिलना वर्ष 2020 को और अधिक जटिल बना रहा है. (Unknown bird disease in nainital)

वर्ष 2015 में नैनीताल जिले के अंतर्गत आने वाले चाफी नामक छोटे से गांव में घरेलू मैना के पैरों का धीरे-धीरे ह्रास होने का मामला प्रकाश में आया था. उसके बाद फिर घोड़ाखाल, भवाली, मुक्तेश्वर सहित तमाम पहाड़ी इलाकों में बर्ड वाचरों ने इस बात को नोटिस किया कि घरेलू मैना के पैर धीरे-धीरे गलने लगे हैं जिसकी वजह से दाना चुगने में इन परिंदों को काफी असहजता हो रही है.

लेकिन तब भी वेटेनरी डॉक्टर इस बीमारी की तस्दीक नहीं कर पाए थे, या यूं कहें कि किसी ने इस मामले का संज्ञान लेना तक उचित नहीं समझा. खैर, अब एक बार फिर यह बीमारी प्रकाश में आयी है ये ताजा तस्वीरें मुक्तेश्वर और सतखोल गांव के समीप की हैं. रामगढ़ की आयरन लेडी कमला नेगी

लेकिन न तो तब प्रशासन, सरकार ने इस मामले का संज्ञान लिया था न अब किसी को इस मामले से कोई लेना देना है. वैसे भी पूरा महकमा कोरोना से लड़ रहा है तो भला इन परिंदों पर किसका ध्यान जाएगा!

लेकिन पक्षी प्रेमियों की मानें तो किसी फंगल इन्फेक्शन की वजह से ही यह रोग पनप रहा है.

फिलहाल अब सवाल ये है कि क्या यह बीमारी केवल घरेलू मैना को ही घेर रही है? क्योंकि इसी क्षेत्र में निवासरत अन्य परिंदों में इस बीमारी के लक्षण देखने को नहीं मिल रहे हैं. बीमारी की वजह कोई खास पेड़-पौधा या भोजन तो नहीं? क्या इस बीमारी से इंसान प्रभावित हो सकता है? फिलहाल देखना होगा कि आखिरकार इस रोग के प्रति सम्बंधित विभाग कब जागता है.

हल्द्वानी में रहने वाले भूपेश कन्नौजिया बेहतरीन फोटोग्राफर और तेजतर्रार पत्रकार के तौर पर जाने जाते हैं.

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Sudhir Kumar

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