(पिछली कड़ी: बाबू का घर छोड़ना और अकेले बालक का संघर्ष – त्रिलोक सिंह कुंवर की आत्मकथा का दूसरा हिस्सा)
मुझे तीसेक साल पहले अपने मकान की चार दीवारों के भीतर अपने पिताजी के साथ बैठकर बातचीत करना याद आता है. ठीक जैसा मैं अब हूं वे भी अपने जीवन की गोधूलि में थे. उन्होंने ऐसे ही एक दिन कहा: “त्रिलोक, बढ़ती उम्र के साथ साथ जीवन के महत्वपूर्ण घटनाएं चाहे वे प्रीतिकर हों या कड़वी किसी फ़िल्म की तरह स्क्रीन पर नज़र आने जैसी लगती हैं मानो वे अभी हाल में ही घटी हों.” इधर पिछले तीन सालों से मैं तकरीबन यही अनुभव कर रहा हूं. मुझे लगता है कि कुछ अपवादों को छोड़कर इसमें हर व्यक्ति के लिए कुछ न कुछ अच्छी चीज़ें निहित रहती हैं. मैं काफ़ी समय से लगातार इस सम्बन्ध में विचार करता रहा हूं. आखिरकार मैं उन्हें मोटे मोटे विवरणों में याद करने की कोशिश कर रहा हूं. ये सब मेरी नौकरी के समय से सम्बन्धित हैं. (Trilok Singh Kunwar Uttarakhand Autobiography)
1943 में मैंने अल्मोड़ा के सरकारी इन्टरमीडियेट कॉलेज से इन्टरमीडियेट साइंस और प्री बोर्ड का इम्तहान दिया था. मैं इसमें उत्तीर्ण न हो सका अलबत्ता मुझे अंग्रेज़ी की सप्लीमेन्ट्री परीक्षा के लिए योग्य घोषित कर दिया गया. आज़ादी से पहले इस तरह के अभ्यर्थियों को उस एक विषय की परीक्षा में बैठने का अवसर अगले साल मिलता था, जबकि आज के समय में सप्लीमेन्ट्री की परीक्षा दो महीनों में हो जाया करती है. मेरे मामले में यह परीक्षा 1944 में होती. उन दिनों हमारा परिवार भीषण दारिद्र्य से रूबरू था और मैं एक साल रुक कर और उसके बाद नौकरी तलाशने की बात सोच भी नहीं सकता था. (Trilok Singh Kunwar Uttarakhand Autobiography)
चूंकि वह दूसरे विश्वयुद्ध का दौर था, सार्वजनिक विभागों की नौकरियां युद्ध से लौटकर आने वालों के लिए खाली रखी जाती थीं. इसलिए मेरे पिता जी ने मुझे राय दी कि मैं सशस्त्र सेना में भर्ती हो जाऊं. वे मेरे साथ सेना भर्ती कार्यालय तक भी आए. हमने ३५ किलोमीटर की यात्रा दो दिनो में तय की क्योंकि उन दिनों अल्मोड़ा और बागेश्वर के बीच कोई मोटर मार्ग नहीं था. वहां मुझे रॉयल इन्डियन एयर फ़ोर्स में ग्राउन्ड टैक्नीशियन (पहले वायरलैस फिर राडार ऑपरेटर) के तौर पर भर्ती कर लिया गया. मेरी उम्र तब कुल साढ़े सोलह थी. 1943 और 1946 के बीच मैंने वायुसेना में दो साल और सात महीने काम किया.
युद्ध के समाप्त हो जाने पर 1945 के अन्त में मैंने दो कारणों से वायुसेना से स्वैच्छिक सेवामुक्ति के लिए आवेदन किया. पहला तो यह कि 1945 के मध्य में 18 की आयु में मेरा विवाह होने वाला था. दूसरा यह कि मेरे सामने दो विकल्प रख दिए गए थे – या तो मैं सेवामुक्ति स्वीकार कर लूं या एक लोअर ग्रेड लिपिक का पद ग्रहण करूं. मैंने पहला विकल्प चुन लिया. तीन माह का सवेतन अवकाश लेकर मैंने अप्रैल 1946 में अल्मोड़ा के क्षेत्रीय रोजगार कार्यालय में फ़ॉरेस्टर के पद के लिए अपने को पंजीकृत करवा लिया, जैसा कि सैन्य सेवाओं से लौटने वालों के लिए निर्देशित था.
उक्त पद के लिए नुझे 16 अगस्त 1946 को एक मौखिक साक्षात्कार हेतु ग्लेनथॉर्न, चीफ़ कन्ज़र्वेटर के दफ़्तर पहुंचने का निर्देश प्राप्त हुआ. भर्ती बोर्ड में तीन सदस्य थे – मि. सॉल्वोय, डाइरेक्टर रिलीफ़ एन्ड रिहैबिलिटेशन उ.प्र. और मि. डब्लू. टी. हिल, सीसीएफ़, उ.प्र. नामक दो ब्रिटिश आई सी एस और आई एफ़ एस जो अपने महकमों के मुखिया थे और तीसरे मि. एम. डी. चतुर्वेदी जो सबसे वरिष्ठ भारतीय आई एफ़ एस थे और उन दिनों कन्ज़रवेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट्स वेस्टर्न सर्किल के पद पर कार्यरत थे. बाद में मि. चतुर्वेदी पहले या दूसरे इन्सपैक्टर जनरल ऑफ़ फ़ॉरेस्ट्स के पद पर भी रहे थे. यह बताना अप्रासंगिक नहीं होगा कि उन दिनों वन विभाग का वेतनमान रु. 30-1-45 हुआ करता था जो सेना के रु. 70 से अधिक की तुलना में बहुत कम था. जहां तक मुझे याद है कुल पन्द्रह चुने गए प्रत्याशियों में मैं एक था. मुझे भवाली रेन्ज में भवाली हैडक्वार्टर में तैनात किया गया.
मैं नियत तारीख को ड्यूटी पर पहुंच गया. मेरे साथ मेरी पत्नी भी आई थी और मुझे तीन कमरों का एक निवास मिला था. कुछ दिन तक मैंने रेन्ज ऑफ़िस में काम किया और एक दिन मेरे रेन्ज ऑफ़िसर ने मुझे सड़कों और भवनों की मरम्मत के अनुमानित खर्चों का विवरण (एस्टीमेट) तैयार करने को कहा. सच तो यह है कि तब तक मैंने एस्टीमेट शब्द का नाम भी नहीं था. मैंने इस बाबत अपने रेन्ज ऑफ़िसर से पूछा. उन्होंने मुझे सब समझाया. करीब एक सप्ताह के बाद मैं रेन्ज में अपने सारे काम कर रहा था – ग्रामीणों के अधिकारों और उनकी छोटी छोटी ज़रूरतों का हिसाब रखने से लेकर एस्टीमेट बनाने और चीड़ के जंगलों में नियन्त्रित आग लगाने तक. मेरी दिनचर्या तकरीबन रोज़ यह रहती थी कि मैं सुबह घर से खाना खाकर निकलता और शाम को ही लौटता.
एक दिन मुझे पता लगा कि वायरलैस के ज़माने के मेरे कुछ साथियों को देहरादून रेन्ज में रेन्जर्स कोर्स 1947-49 के लिए केवल इन्टरव्यू के आधार पर ही चुन लिया गया है. मुझे अपने आप पर बहुत गुस्सा आया. बाद में मुझे अहसास हुआ कि यह मेरी बेबात की शिकायत थी. ऐसा मेरे लिए भी तब सम्भव होता जब मैंने इस सिलसिले में अप्रैल 1946 से ही प्रयास शुरू कर दिए होते यानी अपनी अर्ज़ी को सिर्फ़ फ़ॉरेस्टर की नौकरी तक ही सीमित न रख कर उसे विभिन्न विभागों में पहुंचाया होता. मैंने इसके लिए अपनी अपरिपक्वता और सूचना के अभाव को दोषी ठहराया. मैंने मार्च 1947 में होने वाले इन्टरमीडियेट बोर्ड के सप्लीमेन्ट्री इम्तहान के लिए अनुमति हासिल की और उसे उत्तीर्ण भी कर लिया.
बाद में मुझे यह भी पता चला कि जो राडार ऑपरेटर पदावनति के बावजूद वायुसेना में बने रहे थे, उन्हें आज़ादी के बाद दोबारा उसी वेतनमान और उसी पद पर वापस बुला लिया गया था. राडार का अविष्कार दूसरे विश्वयुद्ध के दौरान हुआ था जिसकी मदद से जर्मनी की लगातार बमबारी से इंग्लैण्ड कई बार बचा. राडार जर्मन जहाज़ों की टोह ले लेते थे और उन्हें आर ए एफ़ फ़ाइटरों की मदद से ध्वस्त कर दिया जाता था.
जीवन उसी सरकारी ढर्रे पर चल रहा था.
जनवरी 1948 में ऑफ़िसर-इन-चार्ज श्री शौरी के निर्देशन में ए आई एफ़ सी की 1947-49 कक्षा का प्रशिक्षण दौरा चल रहा था. वे लोग भवाली की मिलिट्री बैरकों में कैम्प किये हुए थे. मुझे चारकोल बर्निंग पर उन्हें प्रशिक्षण देने को कहा गया. नदी की धारा के बगल में स्थित होने के कारण मिलिट्री की बैरकें पाले से अटी रहती थीं. सारा इलाका जंगल से ढंका हुआ था और चारों तरफ़ सफ़ेदी नज़र आती थी. जब दोनों प्रशिक्षक कैम्प पहुंचे तो जब श्री शौरी ने पाया कि कुछ प्रशिक्षणार्थियों ने ऊन या चमड़े के दस्ताने पहने और थे सिर और गले भी ढंक रखे थे तो वे बहुत तेज़ आवाज़ में चिल्लाए: “इसकी मैं कल्पना भी नहीं कर सकता! फ़ॉरेस्ट ट्रेनिंग अफ़सरों ने दस्ताने वगैरह पहने हुए हैं! उतारिये इन्हें!” अगले दिन मैं उन्हें नज़दीकी चीड़ के जंगल तक ले गया जहां मैंने उन्हें लीसा निकालने का तरीका बताने के साथ साथ कुमाऊं के लीसा उद्योग के इतिहास पर एक भाषण भी दिया. तीसरे दिन हम लोग नैनीताल और उसके आसपास के इलाके के भ्रमण के लिए गए. मुझे यह सब अच्छा लग रहा था क्योंकि बिना प्रशिक्षण के सिर्फ़ सवा साल की नौकरी के बाद भी मैं यह सब कर पा रहा था. इसके अलावा मेरा उठना बैठना बेहतर और स्तरीय लोगों के साथ हो रहा था. बाद के वर्शों में इन में से तीन प्रशिक्षणार्थियों के मातहत मुझे काम करने का अवसर मिला. ये थे श्री पी.सी.चटर्जी और श्री डी.सी.पाण्डे मेरे डी एफ़ ओ रहे थेजबकि श्री सी.एल.भाटिया चीफ़ कन्ज़रवेटर ऑफ़ फ़ॉरेस्ट, उ.प्र.
यह साल मेरे लिए अविस्मरणीय था क्योंकि अप्रैल से जून के बीच मुझे चीड़ के इलाके में कुल अट्ठाइस वनाग्नियों से जूझना पड़ा. होता यह था कि जब तक हमारा स्टाफ़ गांव वालों की मदद से एक आग को बुझाता सामने की पहाड़ी पर दूसरी आग जलनी शुरू हो जाया करती. उस तरफ़ दौड़ पड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता था. कुछ घन्टों के बाद उसी पहाड़ी के किसी और हिस्से में आग की खबर मिलती. इस काम को करने के लिए काफ़ी तेज़ तेज़ पैदल चढ़ना और उतरना पड़ता था. कई बार स्टाफ़ को हकधारी ग्रामीणों के आने का इन्तज़ार करना पड़ता. समय की कमी के कारण ऊपरी हिस्सों में खासी आग लग जाया करती थी. अग्निशमन के इस काम में दिन-रात कड़ी मेहनत करनी पड़ती थी.
मई के महीने के मध्य में मुझे सूचना मिली कि पाइन्स-भवाली पैदल मार्ग पर चीड़ के जंगलों में आग लग गई है. एक स्थानीय फ़ॉरेस्ट गार्ड, बाकी स्टाफ़ और दो फ़ायर-वाचर्स के साथ मैं तुरन्त निकल पड़ा. वहां पहुचने में हमें एक घन्टा लग गया होगा. ऊपर की तरफ़ बढ़ रही आग तब तक रास्ते को पार कर लड़ियाकांटा रिज की तरफ़ बढ़ रही थी.
आग अभी बसासत से दूर थी. उस से निबटने को मेरे साथ केवल छः लोग थे और हम भवाली सैनेटोरियम से लगे जंगल को बचाने के प्रयास में जुटे हुए थे. जलते हुए लठ्ठों और चिंगारियों के कारण आग से जुझना मुश्किल हो रहा था. चूंकि हम रात का भोजन खाए बिना ही आ गए थे, हमने अपने साथ के दो लोगों को नज़दीक के गांव से कुछ खाना-पानी लेकर आने को कहा. सारे सद्प्रयासों के बावजूद हम सिर्फ़ इतना कर पा रहे थे कि दर्शक बने रहते हुए जलते हुए लकड़ी के टुकड़ों को सड़क पर आने से रोक रहे थे. सम्भवतः हम ने बारी बारी कुछ देर को नींद भी निकाली. इस समूचे मसले का दुखद पहलू यह था कि उन दिनों हमारे रेन्ज अफ़सर महोदय कैज़ुअल लीव पर गए हुए थे.
अगली सुबह चन्द और ग्रामीणों की मदद से हमने एक सूखे नाले से सटे बांज के जंगल में लगी आग को बुझाने का काम शुरू किया. इसके अलावा हम इस बात की निगरानी भी कर रहे थे कि चिंगारियां सुरक्षित इलाके को नुकसान न पहुंचा सकें. यह कार्य शाम तक चलता रहा. हम सब बेतरह थक चुके थे. उस रात हम एक नज़दीकी गांव में रहे जहां हमें अपनी नींद पूरी कर पाने का समय मिल सका. तीसरी सुबह मैंने देखा कि आग पर तकरीबन काबू पाया जा चुका था. इलाके की निगरानी करते हुए मैंने पहाड़ी से नीचे उतरते एक सन्देशवाहक को देखा. उसने पास आकर मुझे बताया कि उत्तर प्रदेश के चीफ़ कन्ज़रवेटर श्री एम. डी. चतुर्वेदी और कुमाऊं के कन्ज़रवेटर श्री जे. स्टीफ़ेन्स भवाली सैनेटोरियम कैम्पस के नज़दीक एक रिज पर मौजूद थे और मैंने तुरन्त उन्हें रिपोर्ट करना था. चूंकि मेरे तात्कालिक उच्चाधिकारी अनुपस्थित थे, मेरे कार्य की किसी भी कमी के लिए मुझे बचाने वाला कोई न था. ऊपर चढ़ते हुए मैंने अनुमान लगाया कि सम्भवतः भयभीत होकर भवाली सैनेटोरियम के सुपरिन्टेन्डैन्ट ने आला अफ़सरान को सूचित कर दिया होगा.
चूंकि उन दिनों नैनीताल राज्य की ग्रीष्मकालीन राजधानी हुआ करती थी, हमारे विभाग के उच्चाधिकारियों से मामले को गम्भीरता से देखने को कहा गया होगा. ढाई दिनों तक आग से लड़ते हुए मेरा चेहरा काला पड़ा हुआ होगा और मेरे बालों और कपड़ों की दुर्गति अलग. मुझे ठीकठीक याद नहीं मुझसे क्या पूछा गया और मैंने क्या जवाब दिए. चूंकि उच्चाधिकारियों के सामने मैं आदतन मुखर रहा करता था मैंने ढाई दिन तक की मशक्कत और तनाव को लेकर काफ़ी कुछ कहा होगा. बाद में मुझे पता चला कि हमारे रेन्ज अफ़सर से अनुपस्थित होने के बाबत स्पष्टीकरण मांगा गया क्योंकि कैज़ुअल लीव को हमेशा ऑन-ड्यूटी माना जाता था. चीफ़ कन्ज़रवेटर ने लिखित में कहा कि उनका सामना एक बेवकूफ़ अफ़सर यानी मुझसे हुआ था.
जून के तीसरे हफ़्ते में मानसून से पहले की बारिश की मुझे आज तक याद है. हम उस दिन भी आग बुझाने में लगे हुए थे. बारिश के आने पर हम खुशी में झूम उठे और आत्मा तक उसके नीचे भीगते रहे. १९४८ के वनाग्नि काल का यह अन्त था.
फ़ॉरेस्टर ट्रेनिंग के लिए चयनित इक्कीस लोगों में मेरा नाम भी था. हमें 1 अक्टूबर तक फ़ॉरेस्टर्स ट्रेनिंग की कक्षाओं के लिए आल्मा लॉज पहिंचने को कहा गया. यह सेन्ट लो रिज पर अवस्थित एक दुमंज़िला इमारत थी. वहां हमें 15 नवम्बर तक रहना था. हमारी दिनचर्या में सुबह सात से आठ तक परेड होती थी. दस से चार तक कक्षाएं होती थीं जिनके बीच एक घन्टा लंच का होता था. उसके बाद हम लोग फ़्लैट्स में घूमा करते थे.
तत्पश्चात हम लोग फ़ील्ड ट्रेनिंग के लिए हल्द्वानी चले गए. यहां एक बड़ा फ़र्क़ यह था कि अब से हमें डबल फ़्लाई तम्बुओं में रहना था. एक तम्बू में तीन लोगों ने रहना था. यहां से हमें बरेली ले जाया गया जहां हमें बरेली के आसपास वनाधारित उद्योगों से परिचित कराया गया. बरेली के बाद हमें पश्चिमी और पूर्वी सर्किलों में साल के जंगलों का भ्रमण करवाया गया. इसके बाद हमें एक पखवाड़े की फ़ील्ड इंजीनियरिंग ट्रेनिंग के लिए रुड़की के बंगाल इन्जीनियरिंग ग्रुप सेन्टर ले जाया गया. रुड़की में हमारा प्रशिक्षण सेना के अधिकारियों की देखरेख में हुआ. यहां से हम देहरादून गए जहां फ़ील्ड अभियानों के साथ साथ हमने फ़ॉरेस्ट रिसर्च इन्स्टीट्यूट भी देखा. यह संस्थान एक विशाल लैन्डस्केप में फैला हुआ था और अपने शिल्प और वहां प्रदर्शित काष्ठ वस्तुओं के कारण यादगार था. अप्रैल से हमारा ग्रुप पहाड़ में चीड़ सिल्वीकल्चर समझने के लिए एक माह पहाड़ों में शिफ़्ट हुआ. 15 मई 1949 को हम अपनी ट्रेनिंग के अन्तिम हिस्से के लिए वापस आल्मा लॉज पहुंचे. जुलाई 1949 के पहले सप्ताह में कुछ परीक्षाओं और न्यू क्लब में हुए उपाधि-वितरण समारोह के बाद ट्रेनिंग समाप्त हो गई. इस ट्रेनिंग के बारे में ग़ौर करने पर मुझे अहसास हुआ कि इस ट्रेनिंग में आदमी हरफ़नमौला तो बन जाता है पर उसे महारत किसी क्षेत्र में हासिल नहीं होती.
दिसम्बर के महीने में मेरे रेन्ज अफ़सर ने मुझसे कुमाऊं सर्किल के कन्ज़रवेटर मिस्टर जे. स्टीफ़ेन्स की सेवा में उपस्थित होकर उन्हें अपने साथ रामगढ़ से भवाली के पी डब्लू डी डाकबंगले तक लाने को कहा, क्योंकि वे स्वयं नैनीताल के डीएफ़ओ मिस्टर डब्लू. एफ़. कॉम्ब्स के साथ व्यस्त थे.
मैं पैदल रामगढ़ के लिए रवाना हुआ और नियत समय पर वहां पहुंच गया. कन्ज़रवेटर महोदय का अर्दली कैम्प-किट को टट्टुओं पर लाद कर भवाली लेकर जा रहा था. ड्राइवर ले अलावा कार में बैठने वाले हम दो ही लोग थे. औपचारिकता का तकाज़ा था कि मुझे गाड़ी में ड्राइवर की बगल में बैठना था, लेकिन इन नियम क़ायदों से अनभिज्ञ मैं अपनी टोपी लगाए लगाए कन्ज़रवेटर महोदय के साथ बैठ गया.
हमने बमुश्किल दस किलोमीटर का फ़ासला तय किया था जब कन्ज़रवेटर महोदय खरखराती आवाज़ में मुझसे पूछा : “क्या यह तुम्हारा आधिकारिक हैडगीयर है?” मैंने हिम्मत जुटाते हुए जवाब दिया : “नहीं सर नहीं है. मैं इसे इसलिए पहने हूं कि यह हमारे आधिकारिक हैडगीयर से अधिक सुविधाजनक है. सूत की भारी पगड़ी बेहद अटपटी होती है.” कन्ज़रवेटर महोदय ने तुरन्त कहा : “तुम सही हो. पगड़ी पुराने समय के लिए ठीक थी जब लोग उसे रस्सी की तरह भी इस्तेमाल कर लेते थे.” मैंने राहत की सांस ली क्योंकि मैं डांट खाने से बच गया था.
1952 में मुझे नैनीताल के चीना पीक (जिसे अब नैना पीक कहा जाता है) की चीना चौकी मुख्यालय में स्थानान्तरित कर दिया गया. यहां मैं मई 1954 तक रहा.
मैं अपने डी.एफ़.ओ. श्री वी. पी. अग्रवाल से सम्बन्धित कुछ बातें बताना चाहूंगा. वे खासे अनुशासनप्रिय अधिकारी थे – काम के प्रति समर्पित और मानवीयता का सम्मान करने वाले. उनकी जिस इकलौती बात ने मुझे प्रभावित किया वह ये थी कि मैं जितने भी अफ़सरों के सम्पर्क में आया था, वन-संरक्षण के प्रति श्री अग्रवाल का रवैया उन सब में सर्वाधिक अनुकरणीय था. गर्मियों के दिनों जब वे मुख्यालय में होते थे, नैनीताल के आसपास किसी भी स्थान पर जंगल में आग लगने की सूचना मिलते ही वे किराये पर घोड़ा लेकर अपने अर्दली के साथ मौके पर पहुंच जाया करते.
1952 में मुझे डिप्टी रेन्जर के पद पर पदोन्नत किया गया.
मई 1953 में नैनीताल के नज़दीक लड़ियाकांटा की चोटी पर आग लगी. मैं स्थानीय फ़ॉरेस्ट गार्डों और अन्य स्टाफ़ के साथ तुरन्त उस तरफ़ निकल पड़ा. उन दिनों फ़ॉरेस्टर ट्रेनिंग के प्रशिक्षार्थी ओक पार्क, नैनीताल में ठहरे हुए थे. हमारे डी. एफ़. ओ. इन सभी को मौके पर भेज पाने में कामयाब रहे. प्रशिक्षार्थी सुबह दस बजे तक मेरे पास पहुंच गए थे. वे मेरे साथ दोपहर एक बजे तक रहने के बाद वापस अपने कैम्प चले गए.
हम लोग आग के एक हिस्से पर काबू पा सके और उसे रिज के उत्तरी हिस्से की तरफ़ बढ़ने से रोक पाए थे. शाम होते होते आगे नीचे चट्टानी हिस्से तक पहुंच गई थी. हमने आपस में मशविरा कर के यह फ़ैसला लिया कि चूंकि अब आग पर काबू पाना आसान होगा और रात के समय इस काम में लगे रहना बेवकूफ़ी होगी क्योंकि कोई भी रात के अन्धेरे में फिसल कर अपने को चोट पहुंचा सकता था. सो हमने रांची गेस्टहाउस में रात बिताकर सुबह दोबारा कार्य शुरू करने का फ़ैसला लिया.
आधी रात के बाद हमने “डिप्टी साब! डिप्टी साब!” की पुकारें सुनीं. मैं समझ गया अग्रवाल साहब अपने मुआयने पर निकले हुए हैं और उनका अर्दली मुझे पुकार रहा है. मैंने अपने साथ के लोगों को जगाया और तुरन्त पाइन्स (नैनीताल) की दिशा में बढ़ने को कहा. वहां पहुंचने पर मैंने उनसे सड़क के किनारे लगे पैरापिटों पर लेट जाने को कहा. ईसाई कब्रिस्तान की दिशा से “डिप्टी साब! डिप्टी साब!” की पुकारें आईं. मैंने साहब और उनके अर्दली के अपने से कुछ गज की दूरी तक आने का इन्तज़ार किया. मैं अचानक उठ बैठा जैसे गहरी नींद में सोया होऊं.
श्री अग्रवाल ने सीधे मुझपर झल्लाते हुए कहा कि मैंने फ़ॉरेस्टर ट्रेनिंग के प्रशिक्षार्थियों को वापस क्यों जाने दिया. मैंने जवाब दिया कि मैंने पूरी कोशिश की पर लड़कों के लिए बिना भोजन के वहां रुक सकना सम्भव न था. फिर मैंने थोड़ा ऊंची आवाज़ में कहा कि अफ़सरान आग से जूझने वालों की समस्याओं को नहीं समझ सकते. उसके बाद मैंने उन्हें नीचे लगी आग दिखाते हुए कहा कि चट्टानी इलाके में लगी होने के कारण उस वक़्त उसे बुझा पाना सम्भव नहीं होगा. मैंने उन्हें यकीन दिलाया कि सुबह आग पर काबू पा लिया जाएगा. उनकी समझ में मेरी बात आ गई और उन्होंने हमसे उनके पीछे पीछे आने को कहा. रात का बाकी हिस्सा हमने पुनः रांची गेस्टहाउस में बिताया. पाठकगण अनुमान लगा सकते हैं कि श्री अग्रवाल अपने निवास, प्रायरी, में सुबह तीन बजे के आसपास पहुंच सके होंगे.
काम के प्रति समर्पण का इस से बेहतर उदाहरण क्या हो सकता है?
स्टेशन डिप्टी रेन्जर के तौर पर काम करते हुए मुझे काफ़ी लाभ हुआ. मैंने नक्शे बनाना, नई इमारतों और सड़कों के एस्टीमेट बनाना, इन कार्यों को पूर्ण करना, नैनीताल नगर के लिए चारकोल और जलाने की लकड़ी का प्रबन्धन करना और मंडल कार्यालय के सारे कार्यों को करना सीखा. यह सब मैंने अपने रेन्ज अफ़सर श्री आलम सिंह जी के निर्देशन में सीखा. मंडलीय कार्यालय का सारा कार्य आमतौर पर असिस्टैन्ट कन्ज़रवेटर फ़ॉरेस्ट्स द्वारा किया जाता था.
यहां से मई 1954 में मेरे तबादले लीसा डिपो अफ़सर काठगोदाम और उसके बाद 1955 में रेन्ज असिस्टैन्ट के पद पर मनोरा रेन्ज में हुए. अक्टूबर 1955 में वहां से मुझे पुनः नैनीताल बतौर स्टेशन ड्यूटी डिप्टी रेन्जर तैनात कर दिया गया. मैंने वहां दो साल और गुज़ारे.
1956के तत्कालीन प्रमुख सचिव श्री ए.एन. झा की पत्नी से मिलने को कहा. जब मैं वहां गया तो श्रीमती झा ने एक बोरे में आधे भरे हुए कोयले के चूरे की तरफ़ इशारा करते हुए पूछा : “इसका क्या किया जाए?” मैंने जवाब दिया : “हमारे यहां स्थानीय लोग इसे गोबर में मिला कर उपले बनाते हैं और घर गर्म करने में इस्तेमाल करते हैं.” क्या आप कल्पना कर सकते हैं मैं किस कदर बेवकूफ़ आदमी था? मुझे श्रीमती झा की बात में छुपे इशारे को समझ लेना था और चूरे को ले जा कर उसके बदले अच्छा स्तरीय कोयला पहुंचा देना था. लेकिन मेरी परवरिश इस तरह हुई थी कि मैं आदतन सही को सही और गलत को गलत कहा करता. क़िस्मत से मुझे अपने वरिष्ठ अधिकारियों से इस बाबत कुछ सुनने को नहीं मिला जो श्री झा के अच्छे मित्रों में थे.
सितम्बर या अक्टूबर 1956 में श्री के.सी. जैन ने कुमाऊं सर्किल के कन्ज़रवेटर फ़ॉरेस्ट्स का पद सम्हाला. इस दौरान मैं नौकरी में अपनी वरिष्ठता सम्बन्धी एक मामले को लेकर उपयुक्त माध्यमों से चीफ़ कन्ज़रवेटर फ़ॉरेस्ट्स, उत्तर प्रदेश तक अपनी बात पहुंचा चुका था. श्री जैन के पदभार सम्हालने के कुछ दिनों बाद मैं नैनीताल में उनके निवास उनसे मिलने गया. जैसे ही मैंने अपना मामला उनके सम्मुख रखा, श्री जैन नैनीताल में चारकोल और लकड़ी के प्रबन्धन में हो रही गड़बड़ियों को लेकर मुझ पर चिल्लाने लगे. वे बोले “तुम और तुम्हारे रेन्ज अफ़सर ने जब से (यानी 1956 के शुरू से) काम सम्हाला है, सब कुछ चौपट कर डाला है.” मुझे बाद में पता लगा कि वे मेरे रेन्ज अफ़सर से ज़्यादा ख़फ़ा थे बजाय मुझ से. उन्होंने मुझसे आगे पूछा कि मैं नैनीताल में क्यों पोस्टेड था जबकि मेरे जूनियर डिप्टी रेन्जर के तौर पर काम कर रहे थे. मैंने उन्हें अपने नन्हे बच्चों की शिक्षा की परेशानियों के बाबत बताया. ख़ैर, मैंने उन्हें सलाम किया और लौटते हुए मन ही मन अपने से कहा: “चौबेजी छब्बेजी बनने गए, दूबे ही रह गए.” अगले साल मैंने जैन साहब द्वारा कैरेक्टर-रोल में मेरे बारे में लिखी टीप देखी: “अ वेरी स्मार्ट फ़ॉरेस्ट ऑफ़िसर, बट हिज़ सूटेबिलिटी एज़ एन आर. ओ. कैन नॉट बी सेड, अनलैस ट्राइड इन सम रेन्ज.”
अन्तत: मुझे रेन्ज अफ़सर, बूम, टनकपुर के पद पर नियुक्त कर दिया गया. मई 1958 में बूम प्रभाग समाप्त किए जाने के बाद मुझे एक माह की छुट्टी के बाद अस्थाई तौर पर रेन्ज अफ़सर, देवीधूरा (मुख्यालय धूनाघाट) का चार्ज मिला. दो ही महीने बाद मुझे रेन्ज अफ़सर असकोट बनाके शन्ट कर दिया गया. असकोट में पद सम्हालने से पहले मैंने अपने कन्ज़रवेटर साहिब से मुलाक़ात कर यह पूछ ही लिया कि यह पोस्टिंग स्थाई होगी या पिछले तबादलों जैसी क़तई क्षणभंगुर. इसके पीछे मेरी मंशा यह जानने भर की थी कि मुझे अपने परिवार को अपने साथ शिफ़्ट कर लेना चाहिये या नहीं. उन्होंने मुझे आश्वस्त किया कि मुझे अब तंग नहीं किया जाएगा. सो मेरा परिवार मेरे साथ असकोट आ गया. असकोट पहुंचने के बाद मेरा मुख्य दायित्व था वित्तीय वर्ष 1958-59 के समाप्त होने से पहले ही रेन्ज क्वार्टर की इमारत का निर्माणकार्य पूरा करवा लेना. इस कार्य को मैंने कर भी लिया. जून 1961 तक असकोट में मेरा शान्तिपूर्ण निवास रहा.
जून 26, 1961 की बात है. भीषण बारिश हो रही थी. तूफ़ान था और बिजली रह-रह कर चमकती थी. घर की चार दीवारों के बीच मुझ पर उस रात बिलजी गिर गई. इस घटना के विवरण मुझे बाद में मेरी पत्नी ने बतलाए. रात के क़रीब एक बजे हमारी सबसे छोटी बेटी उषा ने बाहर ले जाए जाने की नीयत से उसे जगाया था. मेरी पत्नी ने बच्ची को बाहर बरांडॆ के कोने में उसे ले जाकर बिठा दिया क्योंकि टॉयलेट काफ़ी दूर हुआ करता था. उसने अचानक उस जगह से एक बेहद चमकदार रोशनी को लपकते देखा जहां बच्ची बैठी हुई थी. वह डरकर भागती, चिल्लाती हुई वहां पहुंची कि कहीं बच्ची को कोई नुकसान न हो गया हो. उसे नहीं पता था कि उषा उसके पीछे पीछे आ रही थी. बाद में अन्दर पहुंचकर मेरा भिंचा हुआ चेहरा और टेढ़े हो गए हाथपैर देखकर उसे गहरा सदमा पहुंचा. डॉक्टर दास को बुलाया गया. हस्पताल रेन्ज क्वार्टर से कोई 30-40 मीटर दूर था. मेरी पत्नी ने मुझे मुझे बाद में बताया कि होश आने में मुझे कोई घन्टे भर से ज़्यादा वक़त लगा.
जब मैं उस राह होश में आया, मैंने देखा कि लालटेन की रोशनी में मेरे परिवार के सदस्य और डॉक्टर दास मेरे गिर्द सिमटे हुए थे. उन दिनों बिजली का चलन नहीं था. डॉक्टर को देख कर मैंने पूछा कि क्या हुआ था तो अपने बंगाली लहज़े में वे बोले “शाक लौग गया है.” उसके बाद जब मुझे दर्द का अहसास होना शुरू हुआ मैंने अपना दांयां हाथ अपनी दांईं पसलियों ने नीचे लगाया. मैंने पाया कि कोई चार सेन्टीमीटर व्यास का एक फफोला वहां उग आया था. उन दिनों हमारे पास एक कॉकर स्पैनीएल पिल्ला था जो मेरी खाट के नीचे सोया करता. वह भी बिस्तर से तब बाहर आया तक़रीबन जिस वक़्त मुझे होश आ रहा था. सम्भवतः बिजली उस पर भी गिरी थी.
उन दिनों रेडियो चलाने के लिए तांबे के एन्टीना लगाने पड़ते थे. हमारा वाला छत की पूरी लम्बाई पर फ़िट किया गया था. रेडियो को अलग से अनअर्थ किया जाना होता था. आमतौर पर ऐसा कोयला भरे हुए गड्ढों की मदद से किया जाता था. इस हादसे की पूरी ज़िम्मेदारी मेरी थी क्योंकि मैंने अनअर्थिंग के ज़रूरी काम पूरे नहीं किये थे.
अगली सुबह यह पाया गया कि हमारी रसोई के पिछवाड़े की दीवार खुल गई थी और भीतर रखे तांबे के एक बड़े बरतन में खरोंच आ गई थी. मुझे अब भी लगता है कि आकाशीय बिजली को तांबे के उस बरतन ने अर्थ कर लिया होगा. बिजली के बाक़ी हिस्सों की अर्थिंग तांबे के तार से बने एन्टीना से होकर हमारे मरफ़ी रेडियो सैट के द्वारा हुई होगी जो मेरे सिर के नज़दीक एक अल्मारी पर रखा हुआ था. उसी सुबह यह भी पाया गया कि मेरे माथे से होकर मेरी पीठ तक जलने के निशान की एक पतली लकीर देखी जा सकती थी. जो भी हो यह एक चमत्कार था कि मैं बच गया. बाद में मुझे पता चला कि उसी रात टेहरी सर्किल में तूनी, चकराता में पोस्टेड एक रेन्ज अफ़सर अपने मकान में घुसते ही बिजली गिर जाने से अपनी जान गंवा बैठा था, जिसे उन दिनों वह चीड़ के पेड़ों के चिन्हीकरण में मुब्तिला होने के कारण आबाद किए था.
सुबह मैं हमेशा की तरह तरोताज़ा था. मैं रोज़ ही अपना अख़बार इन्डियन एक्सप्रेस लेने पोस्टऑफ़िस जाया करता था जिसे मैं 1959 से ही पोस्ट पार्सल के मार्फ़त प्राप्त कर रहा था. जब मैं पिछली रात के हादसे के बारे में असकोट के पोस्टमास्टर को बतला रहा था, स्पेशल पुलिस फ़ोर्स के रेडियो स्टेशन अफ़सर तिवारी जी भीतर घुसे. मेरी बात सुनकर वे लतीफ़ाना अन्दाज़ में बोले “आज किस पर बिजली गिरी?” जीवन ऐसा ही होता है. असल बात तो यह है कि आप उसे कैसे लेते हैं.
1 जून 1961 को मुझे फ़ॉरेस्ट रेन्जर के तौर पर पदोन्नत कर दिया गया.
(जारी. अगले अंक में समाप्य.)
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