प्रतीकात्मक तस्वीर
1823 में ट्रेल ने लिखा — यहां सार्वजनिक स्कूलों जैसी कोई संस्था नहीं है. व्यक्तिगत तौर पर होने वाली पढ़ाई-लिखाई भी उच्च वर्ग के कुछ ही लोगों तक सीमित है. इन लोगों को ब्राह्मण शिक्षकों द्वारा मात्र पढ़ने-लिखने और हिसाब-किताब की जानकारी दी जाती है. संभ्रांत ब्राह्मण परिवारों के बच्चों को संस्कृत की शिक्षा भी दी जाती है.कुछ लोग अपने बच्चों को सामान्य हिंदू शिक्षा का पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए बनारस भी भेजते हैं. (First School Uttarakhand 1840)
साल 1840 में वर्तमान शिक्षा प्रणाली का पहला सार्वजनिक स्कूल श्रीनगर में खोला गया. इस स्कूल के सञ्चालन में हर महीने पांच रुपये का खर्च आता था, जिसे लावारिस संपत्ति कोष से वहन किया जाता था. इसके बाद कलकत्ता स्थित शिक्षा समिति से पत्र व्यवहार कर और स्कूल भी खोले गए. इन स्कूलों के सञ्चालन के लिए कुमाऊं में 20 और गढ़वाल में 14 रुपये खर्च किये जाते थे.
इसके साथ व्यक्तिगत तौर पर पढ़ाई-लिखाई का सिलसिला चलता रहा. थोरटन की रिपोर्ट के अनुसार 1850 में कुमाऊं और गढ़वाल में 121 संस्कृत और हिंदी की ऐसी पाठशालाएं थीं जो निजी भवनों या शिक्षकों के घरों में चल रही थीं. इन पाठशालाओं में पढ़ाने वाले 121 शिक्षकों में से 54 निशुल्क शिक्षा देते थे 67 की आय 8-9 रुपये माह थी. इन स्कूलों में 522 छात्र पढ़ा करते थे. इसके अलावा उर्दू पढ़ने वाला एक मदरसा भी था जिसमें 10 छात्र पढ़ा करते थे.
कुमाऊं और गढ़वाल में बंदोबस्त-संशोधन में में स्कूल करने के बाद हर पट्टी में मुफ्त शिक्षा देने वाले स्कूल खोल लेना संभव हुआ.
इन स्कूलों में जाने वाले छात्र प्रायः 6-7 बरस की उम्र के हुआ करते थे. स्कूलों में जाने वाले छात्रों की उपस्थिति बहुत अनियमित हुआ करती थी क्योंकि लड़का खेती और घर के काम-काज में हाथ भी बंटाता था. धीरे-धीरे लोगों में शिक्षा हासिल करने की ललक बढ़ती गयी. समाज में बुद्धिमत्ता का विकास हुआ. धर्मांधता और अंधविश्वास में कमी आने लगी.
(हिमालयन गजेटियर : एडविन टी. एटकिंसन के आधार पर)
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