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प्राइवेट स्कूल से होड़ लगाता गंवई इस्कूल और जौनसारी बच्चों की ताहिरा मैडम

सरकारी स्कूल के बच्चों और शिक्षा की बात चलती है तो साधारण रूप से मन में शिक्षा में पिछड़े, उद्दंड बच्चों की छवि उभरती है! कई मायनो में ये सही भी है लेकिन कुछ शिक्षक अपनी लगन और इच्छाशक्ति के बल पर सरकारी स्कूलों की छवि को बदल रहे हैं. Tahira Madam of Jaunsar

ऐसी ही एक शिक्षक हैं श्रीमती ताहिरा खान जो बीस बरस से उत्तराखंड के विकासनगर खंड में प्राथमिक विद्यालय डांडा जंगल में जौनसारी श्रमिक समुदाय के बच्चों को पढ़ाती हैं. ताहिरा जी मानती हैं कि बच्चों के साथ काम करने के लिए सबसे जरूरी है उनमें आत्मविश्वास भरना, उन्हें अपनत्व देना और ऐसा माहौल तैयार करना जिसमें बच्चे खुद गतिविधि करते सीखने के लिए प्रेरित हों, उनमें जिज्ञासा जगे. वह बच्चों से बात करती हैं, उनकी अभिव्यक्तियों को प्यार और सम्मान से सुनती हैं, कहानियों-कविताओं-गीतों द्वारा उनके लिए अवधारणाएं स्पष्ट करती हैं. उनके साथ बच्चे खुद भी कविताएं लिखना, नाटक करना, कठपुतली बनाना और आसपास के इलाके में घूम कर सीखना आदि गतिविधियाँ करते हैं; वे अपनी पाठ्यपुस्तक के पाठों और अन्य बालसाहित्य की समीक्षा करते हैं, चर्चा करते हैं कि कौन से पाठ उन्हें क्यों अच्छे लगे. पिछड़ रहे बच्चों पर खेल गतिविधियों, समर कैंप के बहाने विशेष ध्यान दिया जाता है. Tahira Madam of Jaunsar

उनकी कार्यशैली कितनी कारगर है इसका अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि हर बरस उनके बच्चे ब्लॉक और जिला स्तर प्रतियोगिताओं में पहले और दूसरे स्थान पाते हैं. राष्ट्रीय औसत के विपरीत यहां बच्चों में, अपनी कक्षा से अपेक्षित स्तर से, ज्यादा समझ देखने को मिलती है. बच्चे न सिर्फ किताब में दिए गए गणित के प्रश्नों को हल करते हैं बल्कि वे खुद भी प्रश्न बनाते हैं; स्वायत्तता का उपयोग करते बच्चे खुद पढने का समय निर्धारित करते हैं और चुनते हैं कि वो पहले क्या पढेंगे. और यह सब करते कोई शोरगुल या अनुशासनहीनता नहीं दिखती, वे अपनी मैडम के साथ ज़मीन पर गोल घेरे में बैठे ऐसे काम कर रहे होते हैं जैसे सब एक ही उम्र के हों. Tahira Madam of Jaunsar

ताहिरा खान

हम जैसे बाहरी लोगों के आने पर बच्चे बहुत सहजता से अपनी मैडम से, एकदूसरे से, और हम से बात करते अपने काम करते रहते हैं. ताहिराजी की कक्षा में बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए आवश्यक कोई भी पक्ष छूटता नहीं दिखता. वह बच्चों के साथ एक दोस्त सा व्यवहार करती हैं. जहाँ ज़्यादातर शिक्षक संसाधनों, अभिभावको, विभागीय कमियों को दोष देते हैं वहीं मैडम कहती हैं कि अगर बच्चे नहीं सीख पा रहे तो इसका कारण मेरी ही शिक्षणपद्धति की कमी होगी. वह कहती हैं, ‘‘मैं ऐसे छात्र तैयार करना चाहती हूँ जो किसी भी तरह खुद को प्राइवेट स्कूलों के छात्रों से कम न समझें.’’

वर्तुल ढौंडियाल (काफल ट्री डेस्क के लिए)

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