Featured

इगास से जुड़ी एक कथा

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये क्लिक करें – Support Kafal Tree

पहाड़ का जीवन कृषि आधारित रहा है. कृषि के लिये पहाड़ी न जाने कितने बरसों से पशुओं पर निर्भर रहे. अपने आंगन में पशुओं से बात करते पहाड़ी आज भी दूर-दराज के गांव में मिल जायेंगे. पशुओं में भी गाय और बैल पहाड़ियों के खूब प्यारे रहे.
(Story Related to Igas Festival)

अपने पशुओं से पहाड़ियों का यह स्नेह उनके लोक जीवन में ख़ूब देखा जा सकता है. गढ़वाल और कुमाऊं में अपने पशुओं के प्रति आभार व्यक्त करने के लिये त्यौहार हुआ करते हैं. परम्पराओं के तौर पर आज भी ग्रामीण इलाकों में इसे खूब निभाया जाता है.

गढ़वाल में आज इगास मनाया जा रहा है. पहले लोग इगास के दिन अपने हाथ की राखियाँ तोड़ते और उसे अपनी गाय की पूंछ पर बांधते. आज के दिन गौवंश के लिये पौष्टिक आहार बनाया जाता जिसे स्थानीय भाषा में पींडा कहा जाता है. जब जानवरों के लिये पींडा रखा जाता है तो एक बड़े पत्ते में हलुआ पूरी आदि रखा जाता है जिसे ग्वाल ढिंडी कहा जाता है. ग्वाल ढिंडी ग्वाले जाने वाले बच्चों का पुरस्कार है.     
(Story Related to Igas Festival)

आज के दिन बैलों की सींग पर तेल लगाया जाता और उनके गले में माला पहना कर उन्हें पूजा जाता. बैलों को पूजने से जुड़ी एक लोककथा कुछ इस तरह है –

ब्रह्मा ने सृष्टि रची और रचा मनुष्य. धरती पर अकेले जाने की बात पर मनुष्य ने सवाल किया. मनुष्य ने सवाल किया कि वह किसकी सहायता से इतनी बड़ी धरती में जियेगा. ब्रह्मा ने अपने रचे सबसे ताकतवर शेर को बुलाया. शेर कहां मानता. अब बाकी जानवरों की बारी थी पर ब्रह्मा की किसी ने मानी. तब बारी आई बैल की और बैल व मनुष्य एक-दूसरे को खूब भाये.

बैल की यह बात ब्रह्मा को खूब पंसद आई. ब्रह्मा ने बैल को वरदान दिया कि तुझे मनुष्य पूजेंगे, तेल से तेरी मालिश करेंगे और तुझे दावत देंगे.
(Story Related to Igas Festival)

-काफल ट्री फाउंडेशन

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

1 week ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

1 week ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

1 week ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

2 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

2 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

2 weeks ago