परम्परागत रूप से कुमाऊं क्षेत्र में दीवाली तीन बार मनाई जाती है. तीनों के नाम क्रमशः कोजागर, महालक्ष्मी और बूढ़ दीवाली. पौर्णमासी को लक्ष्मी के बाल स्वरूप के पूजा जाता है (कोजागर), कार्तिक आमवस्या को लक्ष्मी के यौवन स्वरूप को (महालक्ष्मी) और कार्तिक शुक्ल एकादशी को लक्ष्मी का वृद्ध स्परूप (बूढ़ दीवाली) पूजा जाता है.
(Budhi Diwali Festival Uttarakhand Kumaon)
दीवाली के बाद ग्यारहवें दिन मनाई जाने वाली बूढ़ दीवाली के दिन कुमाऊं के लोग घर से घुईयां या भुईयां निकालते है. गेरू और बिस्वार से चित्रित घुईयां कुमाऊंनी समाज में दरिद्रता, दुःख और रोग का प्रतीक माना जाता है. घुईयां घर से बाहर निकालते समय खील बिखेरने के साथ ही गन्ने के डंडे से सूप को पीटा जाता है और कहा जाता है –
आओ लक्ष्मी बैठो नरैण…
भागो घुईयां घर से बाहर
आज के दिन आंगन में ओखल के पास और तुलसी के पास दिया जलाया जाता है. सूप में रखे अखरोट और दाड़िम के दानों को घर के आंगन में तोड़ा जाता है. घुईयां या भुईयां के विषय में अधिक यहां पढ़ें : घुइयां का कुमाऊनी में अर्थ
(Budhi Diwali Festival Uttarakhand Kumaon)
कुमाऊं में आज के दिन महिलाएं हरिबोधिनी एकादशी का उपवास रखती हैं. यह माना जाता है कि आज के दिन भगवान विष्णु क्षीर सागर में चातुर्मास की योगनिद्रा के बाद जाग्रत अवस्था में आ जाते हैं.
एकादशी के दिन भात नहीं खाया जाता. इसका व्रत करने वाले ज्यादातर फलाहार ही करते. अन्न के रूप में उगल को चक्की में पीस कर इसे छान लेते. इसे दूध या पानी में घोल गाढ़ा कर तवे पर उँगलियों से फैला लेते. थोड़ा घी भी पड़ता जिससे इसे मुलायम सेका जाता. आंच मध्यम ही रखते जिससे छोली रोटी कड़कड़ी न हो. उगल की रोटी के साथ आलू के गुटके खाये जाते जिनमें सेंधा नमक डाला जाता. समुद्र में अनेक जीव होते वहीं मरते खपते भी इसलिए समुद्री लूण को हीन माना जाता. इसके बदले चट्टानों से निकला नमक जो लाहोरी और सेंधा कहलाता को व्रत उपवास में लेते.
(Budhi Diwali Festival Uttarakhand Kumaon)
सन्दर्भ –
प्रो. डी. डी शर्मा की पुस्तक उत्तराखंड ज्ञानकोश
प्रो. मृगेश पांडे का लेख पहाड़ों में रखे जाने वाले प्रमुख उपवास और उस दिन के आहार
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