प्रो. मृगेश पाण्डे

चातुर्मास में सोर घाटी : प्रोफेसर मृगेश पाण्डे का फोटो निबंध

गुलज़ार  की नज़्म ‘बादल ‘-

'कल सुबह जब बारिश  ने आ कर 
खिड़की पर  दस्तक दी थी 
नींद में था मैं... 
बाहर  अभी  अंधेरा  था '

ये बारिश नूपुर पहन के आती है. अभी-अभी दिख रहा था आकाश पर सावन है न चुटकियों में घेर  लेता बादल भार नहीं उठा पाता श्रवण  और घनिष्ठा नक्षत्र की गति आता है तैरते हुए ठिठक कर सिमट ऊँचे पहाड़ से असुरचुला की चोटी से कहाँ -कहाँ से बटोर  के लाये आंसू उमड़ -घुमड़  के बाद टप -टप धरती की प्यास विचारों का खालीपन धान के अंकुर मिट्टी की  सुगंध तृप्त  कर देता. 

गीत गोविन्द में राधा कहती कृष्ण से काले घने बादलोंसे घना  हो गया अँधियारा, अकेले कैसे लौटूं घर, तुम संग रहो बस. संयोग  मिलन को आतुर मन तो  बिछुड़े प्रेमी विछोह से विचलित मेघदूत  का विरही यक्ष नभ के विचरते हाथियों के आकार वाले बादलों को देख खिन्न है. रामचरितमानस में भी कहा -“घन घमंड नभ गरजत घोरा. प्रियाहीन डरपत मन मोरा ” 

विरहिन की पुकार से जेठ -वैसाख में झुलसी धरा  को  सावन की मदमस्त फुहार ने हरेले से भिगाना  शुरू कर दिया. इसकी अपनी मुस्कानहै. बूंदों की टिप टिप, झड़ी, अपनी अकुलाहट, अपनी ध्वनि, स्पर्श, अनुभूति, सर पर चांदी की बूंदो का मन्द्र सप्तक, एकस्वर, पत्तियों पे लटकती, खिड़की से झम झम टपकती बारिश को देखना उसे सुनना. गीले परदे की तरह गिरना, बड़ी -बड़ी बूंदों की परत दर परत . 

प्रकृति ने बारिश से तृप्त धरा  के जो दृश्य दिखाए इनकी साझेदारी में हमारे आपके अपने रंग हैं. भीगे हुए इन रंगों में संगीत है, आरोह -अवरोह. ओ सजना बरखा बहार आई, रस की फुहार लाई.

हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

जब तक सरकार मानती रहेगी कि ‘पलायन’ विकास की कीमत है, पहाड़ खाली ही होते रहेंगे

पिछली कड़ी  : उत्तराखंड विकास नीतियों का असमंजस उत्तराखंड में पलायन मात्र रोजगार का ही संकट…

5 days ago

एक रोटी, तीन मुसाफ़िर : लोभ से सीख तक की लोक कथा

पुराने समय की बात है. हिमालय की तराइयों और पहाड़ी रास्तों से होकर जाने वाले…

5 days ago

तिब्बती समाज की बहुपतित्व परंपरा: एक ऐतिहासिक और सामाजिक विवेचन

तिब्बत और उससे जुड़े पश्चिमी हिमालयी क्षेत्रों का समाज लंबे समय तक भौगोलिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक…

5 days ago

इतिहास, आस्था और सांस्कृतिक स्मृति के मौन संरक्षक

हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों और कस्बों में जब कोई आगंतुक किसी…

5 days ago

नाम ही नहीं ‘मिडिल नेम’ में भी बहुत कुछ रखा है !

नाम को तोड़-मरोड़ कर बोलना प्रत्येक लोकसंस्कृति की खूबी रही है. राम या रमेश को रमुवा, हरीश…

5 days ago

खेती की जमीन पर निर्माण की अनुमति : क्या होंगे परिणाम?

उत्तराखंड सरकार ने कृषि भूमि पर निर्माण व भूमि उपयोग संबंधित पूर्ववर्ती नीति में फेरबदल…

7 days ago