देवेन मेवाड़ी

पहाड़ियों के बचपन की यादों का हिस्सा रहे सिटौले के बारे में

इन दिनों मैनाएं भी मिलने आ रही हैं. यों, वे बालकनी में साल भर पानी पीने के लिए आती ही रहती हैं. सर्दियों में स्नान-ध्यान के लिए भी खूब आती हैं. आती हैं और जम कर स्नान करती हैं. बालकनी में इन दिनों अक्सर दो मैनाएं आ रही हैं. लगता है, कुछ मैनाएं स्थाई रूप से दिल्ली में रहने लगी हैं, हमारी तरह. इनकी भी कोई मजबूरी होगी, हमारी तरह. बाकी मैनाएं अपने मुल्क यानी वसंत में पहाड़ों की ओर लौट गई होंगी. शरद ऋतु से वसंत की शुरूआत तक तो ये बहुत दिखाई देती हैं. आसपास पेड़ों पर और बालकनी में आ-आ कर चुह…चुह…चीक…चीक…चुर्र…चुर्र बोलती रहती हैं. आपस में भी खूब बतियाती हैं. लेकिन, इन दिनों यही एक जोड़ा आ रहा है.
Sitola Myna Bird

ये आती हैं और मुझे मेरे बचपन में लौटा ले जाती हैं. बचपन से ही मैनाएं मेरी यादों का हिस्सा रही हैं. याद आती हैं और मन के आसमान में चहचहा कर उड़ने लगती हैं. वे दिन! पहली बारिश के बाद जब भीग कर खेतों से माटी की खुशबू आने लगती थी, उसमें आद (नमी) आ जाती थी तो गुजारा-सेतुवा बैलों की जोड़ी और जुवा-हल लेकर पिताजी खेतों की ओर चल पड़ते. साथ में टोकरी में काकुनी (मक्का) के बीज लेकर मां, और उसके साथ मैं.

खेत में आगे-आगे पिताजी हल चलाते, उनके पीछे मां कूंड़ में मक्का के बीज गिराती, उनके पीछे कुतूहल से चलता मैं और मेरे पीछे गौरेया की तरह दोनों पैरों पर फुदकती, मिट्टी में कीड़े ढूंढती मैनाएं.

बाद में मैनाएं खेतों की दीवारों पर पत्थरों के भीतर बिलों में फिरोजी नीले रंग के अंडे देती थीं. हम बिलों के भीतर झांक कर उन्हें देखते. कभी कोई अंडा हाथ में भी ले लेते. फिर सावधानी से वहीं रख देते. उस बीच मैना माता-पिता हमारे आसपास आकर श्यांक….श्यांक..कीक….कीक! की भाषा में हमसे जैसे कहते – मत करो! मत छेड़ो उन्हें! अंडों से बच्चे निकल आने के बाद हम उनकी चीं…चीं….चीं…कान लगा कर सुनते. मैनाएं उन्हें कोमल, लप-लप कीड़े लाकर खिलाती थीं. Sitola Myna Bird

हमारी गाय-भैंसें खेतों या जंगल में चरने जातीं तो दो-एक मैनाएं उनकी पीठ पर सवारी करतीं. कोई मैना कान में कीड़े खोजती तो कोई उनके पैरों और थनों पर. घर लौटने पर शाम को गांव में मैनाओं के झुंड जंगली गुलाब यानी कुंय या कुंजा की विशाल झाड़ियों के भीतर बैठ कर चहचहाते हुए कुहराम मचा देतीं. फिर थक-थका कर सो जातीं.

मेरा मन पाखी बचपन के उन दिनों की सैर करके लौट आया है. वे दोनों मैनाएं आ गई हैं. सामने कुसम के पेड़ पर चहचहा रही हैं- चुह…चुह…चुर्र…चुर्र! पतंग उड़ाने के शौकीनों को भला क्या पता कि उनका मांझा हर साल मैनाओं और दूसरे पक्षियों की जान भी ले लेता है. हमारे सामने के कुसम के पेड़ की एक ऊंची डाली पर उलझे मांझे की डोर में पंजा फंसने के कारण एक मासूम मैना की जान चली गई थी. शिबौ-शिब.

मैना को सारिका भी कहा जाता है. यों, इसके कई और भी नाम हैं. संस्कृत के प्राचीन ग्रंथों में इसके कई नामों से इसका वर्णन किया गया है. ‘कालीदास के पक्षी’ पुस्तक के विद्वान लेखक प्रोफेसर हरिदत्त ने बताया है कि सारिका प्राचीनकाल में उच्चकुल के घरों का एक आवश्यक अंग समझी जाती थी. कुलवधू को श्रृंगार सामग्री के साथ सारिका भी दी जाती थी. वे कहते हैं कि “शब्दकल्पद्रुम में मैना के पंद्रह नाम दिए गए हैं. इनमें पांच नाम उसके मनुष्य की वाणी बोलने की विशेषता को प्रकट करते हैं.”

तो, वाणी ही मैना की दुश्मन बन गई. मनुष्य की आवाज की नकल करने की इस विशेषता के कारण बहेलिए जंगल से मैनाएं पकड़ने लगे. धनी और कुलीन लोग उन्हें खरीद कर पिंजरों में पालने लगे. खुले आसमान की आज़ाद मैना घर-परिवार से दूर पिंजरे में कैद होकर संभ्रांत घरों की शोभा बन गई.

दोस्तो, हम इस कोरोना काल में महज चंद हफ्तों या माह भर के लॉक डाउन में ही अपने घर-भीतर बेचैन हो उठे हैं. बाहर आकर आजाद ज़िंदगी जीना चाहते हैं. लेकिन, विडंबना देखिए कि हम मनुष्य ही मैना और मिट्ठू तोते को आजीवन एक छोटे-से पिंजरे में कैद कर देते हैं. Sitola Myna Bird

मिट्ठू से अच्छा याद आया. पहले शुक और सारिका को पिंजरे में पालने का निर्मम रिवाज था. प्रोफेसर हरिदत्त कहते हैं, “कादंबरी में उल्लेख किया गया है कि पिंजरों में बैठी शुक और सारिकाएं अशुद्ध पढ़ने पर विद्यार्थियों को डांटा करती थीं.”

जानते हैं, कौन-सी प्रजाति की मैना या सारिकाएं हम मनुष्यों की आवाज़ की नकल करती थीं? पहाड़ी मैना. पक्षी विज्ञानी उसे ग्रैकुला रिलीजिओसा कहते हैं. चमकीले काले रंग की पहाड़ी मैना की चोंच और टांगें पीले रंग की होती हैं. सिर पर चटक सिंदूरी-पीले रंग की चमड़ी के धब्बे और झालर. पंखों पर सफेद हिस्सा होता है जो उड़ते समय साफ दिखाई देता है. यह उत्तर और पूर्वी भारत के पहाड़ों में घने वनों में पाई जाती हैं. इसकी कई उपजातियां भी पाई जाती हैं.

लेकिन, हमारी बालकनी और आसपास के पेड़ों पर कौन-सी मैनाएं आ रही हैं? देसी मैना का जोड़ा है यह. हम गांव में इन्हें सिटौला कहते थे. बंगाली भाषा में ये भात सालिक, मध्य प्रदेश में गुलगुल, मराठी में सालोंकी और गुजराती में कबार कहलाती हैं. गौर से देखिए तो इसकी चोंच और पैर पीले दिखाई देंगे. आंखों पर पीले चश्मे का जैसा फ्रेम दिखाई देता है. शरीर भूरा और पंखों पर बड़ा-सा सुंदर सफेद धब्बा. उड़ते समय लगता है जैसे कागज़ की सफेद चर्खी उड़ रही है. फल, फूल, कीड़े, मकोड़े तो खाती ही हैं, हम किचन की खिड़की की मुंडेर पर जो रोटी के टुकड़े या भात खाते हैं, उसे भी चाव से खा लेती हैं.

इन दिनों इनकी प्रजनन ऋतु चल रही है, यानी अप्रैल से अगस्त तक. पिछली बार इन्होंने हमारी चिमनी के एक्जास्ट पाइप में घोंसला बनाया था. उसमें तीन अंडे दिए. उनसे तीन बच्चों ने जन्म लिया जिन्हें माता-पिता ने सामने कुसम के पेड़ पर फुदकने और उड़ने की शिक्षा-दीक्षा दी.

प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक सालिम अली अपनी पुस्तक ‘द बुक ऑफ इंडियन बर्ड्स’ में स्टर्निडी परिवार की ग्यारह प्रजातियों की मैनाओं का जिक्र करते हैं. इनमें से बड़ी चिड़ियां तो अंग्रेजी में भी मैनाएं लेकिन छोटी चिड़ियां स्टर्लिंग कहलाती हैं. देसी मैना, गंगा मैना, अबलक मैना, पहाड़ी मैना, ब्राह्मणी मैना, जंगल मैना इनकी कुछ जानी-पहचानी प्रजातियां हैं.

दोस्तो, हालांकि तोता-मैना के नाम पर न जाने कब से कितनी कहानियां कही गई हैं. उन्हें पढ़ने का मन नहीं हुआ क्योंकि पिंजरे में कै़द मैना और तोता का विचार ही मन को बेचैन कर देता है. इतिहासकार कमरुद्दीन फलक का बयां किया गया किस्सा तो जैसे मन में बैठ गया है. किस्सा कुछ यों है

बादशाह अकबर के नवरत्न अब्दुल रहीम खान-ए-खाना सोलहवीं सदी में मध्य प्रदेश के बुरहानपुर नगर के सूबेदार थे. उन्हीं दिनों भीषण सूखा पड़ा. कासिम फरिश्ता लिखित फारसी की तारीख-ए-फरिश्ता’ किताब का जिक्र करते हुए फलक बताते हैं कि तब रहीम ने एक पहाड़ की चोटी पर पानी का विशाल भंडार बनवाया जो आज भी है और खूनी भंडारा कहलाता है. वहां से सुरंगें निकाल कर नगर में पानी लाया गया.
Sitola Myna Bird

किंवदंती यह है कि उन दिनों वहां एक फकीर थे, हजरत शाह मुस्तकबिल. उनके पास अलग-अलग पिंजरों में एक मैना और एक तोता था. वे एक-दूसरे से बहुत प्यार करते थे. रहीम फकीर से मिले और शहर की आबादी के लिए पानी मुहैया कराने की गुजारिश की. फकीर ने कहा, “मैं इन दोनों परिंदों को आजाद कर देता हूं. वे तुम्हें पानी के पास तक राह दिखाएंगे. यही हुआ तोता और मैना पहाड़ की चोटी पर जाकर एक चट्टान पर बैठ गए. चट्टान धंस कर बहुत नीचे पानी के भंडार में गिर गई. मैना और तोता को खोजा गया तो उनके मृत शरीर मिले. दोनों ने अपने पंखों से एक-दूसरे को प्यार से जकड़ा हुआ था. फकीर ने उनको देख कर कहा कि उसे पता है, उन्हें पिंजरे में अलग-अलग रहने के बजाए मर जाना पसंद था. कहते हैं, अब्दुर रहीम खान-ए-खाना ने उनकी समाधि बना दी. अंग्रेज राजदूत थामस रो ने भी अपनी पुस्तक में इस किस्से का जिक्र किया था. इस घटना की याद में रहीम ने यह दोहा लिखा था:

रहिमन खोजत धरती पर पर्वत ताल तलैया
तोता-मैना राह दिखावै चलता जा बौरेया..
.

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वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.

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