Featured

कुछ काम हम करते हैं कुछ करते हैं पहाड़

पहली जुलाई 1944 को उत्तराखंड के टिहरी जिले के धंगण गाँव में जन्मे लीलाधर जगूड़ी वर्तमान समकालीन में हिन्दी के शीर्ष कवियों में शुमार किये जाते हैं. उनकी प्रमुख कृतियों में शंखमुखी शिखरों पर (1964), नाटक जारी है (1972), इस यात्रा में (1974), रात अभी मौजूद है (1976), बची हुई पृथ्वी (1977), घबराये हुए शब्द (1981) आदि प्रमुख हैं. जगूड़ी जी साहित्य अकादमी पुरस्कार सहित अनेक बड़े सम्मानों और पुरस्कारों से नवाजे जा चुके हैं.

सिल्ला और चिल्ला गाँव
– लीलाधर जगूड़ी

हम सिल्ला और चिल्ला गाँव के रहनेवाले हैं
कुछ काम हम करते हैं कुछ करते हैं पहाड़
उत्तर और दक्षिण के पहाड़ हमें बाहर देखने नहीं देते
वह चील हमसे ज्यादा जानकार है जो इन पहाड़ों के पार से
हमारी घाटी में आती है

पूरब का पहाड़ सूरज को उगने नहीं देता
पश्चिम का पहाड़ तीन बजे ही शाम कर देता है
दोपहर को सूर्योदय होता है सिल्ला गाँव में
सिल्ला गाँव में थोड़ा-थोड़ा सब कुछ होता है
बहुत ज्यादा कुछ नहीं होता

सिल्ला गाँव की बेटियाँ चिल्ला गाँव ब्याही हैं
चिल्ला गाँव के भी बहुतों की ससुराल है
सिल्ला गाँव में
पूरब पहाड़ के पश्चिम ढलान पर बसा है सिल्ला गाँव
इस ठंडे ठिठुरे गाँव में भी होते हैं रगड़े-झगड़े
होती है गरमा-गरमी

झगड़ा होता था एक दिन दो भाइयों में
बड़े ने कहा छोटे से कि कल सबेरे मुझे दिखना मत
(सबेरे सबेरे याने दोपहर बारह बजे कल सुबह)

किसी एक को एक दूसरे को उनमें से दिखना नहीं है
सिल्ला गाँव में
वरना बाकी का झगड़ा कल दोपहर में होगा सुबह-सुबह

सामने एक दूसरा गाँव है चिल्ला गाँव
यह पश्चिम पहाड़ के पूरब ढाल पर बसा है
चिल्ला गाँव में आता है सबसे पहले धाम
सबसे पहले वहाँ लोग उठ कर सिल्ला गाँववालों को
गाली देते हैं अभी तक सोए हुए होने के लिए
आवाज देते हैं कि सूरज चार पगाह चढ़ चुका है
सिल्ला गाँव के कुंभकरणों जाग जाओ

पहाड़ की छाया के अँधेरे में
सिल्ला की औरतें सुनती हैं चिल्लावालों की गुनगुनाहट
लगभग बारह बजे आ पाता है
सिल्ला गाँव चिल्ला गाँव के बराबर
तब सिल्ला से एक बहन आवाज देती है
चिल्लावाली बहन को कि तू मायके कब आएगी

चिल्ला गाँव का सूरज तीन बजे डूब जाता है
सिल्ला गाँव में पाँच-छह बजे तक धूप रहती है
चिल्ला में लोग तीन बजे से घरों में घुसना शुरू कर देते हैं
चूल्हे जलाना शुरू कर देते हैं शाम के
चिल्ला और चिल्ला गाँव आमने-सामने हैं

जब सिल्ला गाँव में रात पड़नी शुरू होती है तब चिल्ला के लोग
खाना खा चुके होते हैं
जब सिल्लावाले रात का खाना खाते हैं
तब चिल्लावाले सो चुके होते हैं
लेकिन पहाड़ों को और सूरज को वे
अलग-अलग तरह से देखते हैं

सिल्ला गाँव की सुबह और चिल्ला गाँव की शाम
दो भाइयों की तरह लड़ती हैं आपस में
दो बहनों की तरह दूर से देखती हैं एक-दूसरे को

लीलाधर जगूड़ी. फोटो: स्व. कमल जोशी

मेरे घर का भी सवाल है : लीलाधर जगूड़ी की कविता

हर पौधा तुम्हारी तरह झुका हुआ होगा :लीलाधर जगूड़ी की कविता

कलियों और फूलों की ख़ुशबुएँ : लीलाधर जगूड़ी की कविता

[वाट्सएप में काफल ट्री की पोस्ट पाने के लिये यहाँ क्लिक करें. वाट्सएप काफल ट्री]

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

उत्तराखंड के पहाड़ों का कटु सत्य है पायर “चिता”

विनोद कापड़ी द्वारा निर्मित चर्चित फ़िल्म पायर "चिता" पूरे देश में रिलीज गई है. 26…

2 days ago

डॉ. रघुनन्दन सिंह टोलिया: उत्तराखंड के इतिहास, समाज और अर्थव्यवस्था को समझने की एक दृष्टि

पिछली कड़ी : धन सिंह राणा ‘संघर्षनामा’ डॉ. रघुनन्दन सिंह टोलिया की पुस्तक, "द कुमाऊं…

2 days ago

पहाड़ का वह बूढ़ा पिता

पहाड़ के एक छोटे-से गाँव में एक पिता रहता था. उम्र अब ढलने लगी थी,…

2 weeks ago

कुमाऊं में रामलीला की परम्परा

सांस्कृतिक परम्परा की दृष्टि से उत्तराखण्ड एक समृद्ध राज्य है. समय-समय पर यहां के कई…

3 weeks ago

‘पायर’ फिल्म के सुलगते सवाल…

जाने-माने पत्रकार, साहित्यकार और फिल्म निर्देशक विनोद कापड़ी से कल शाम मुलाकात हुई. दरअसल,उनके निर्देशन में…

3 weeks ago

हुक्का क्लब अल्मोड़ा की रामलीला से एक्सक्लूसिव तस्वीरें

उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी अल्मोड़ा के मुख्य आकर्षण में से एक रामलीला का मंचन इन…

3 weeks ago