Featured

रसमलाई का ज़ायका

अब से तुम्हारे साथ कहीं आना ही नही है… कहीं नहीं.

शिखर होटल चौराहे से एनटीडी की ओर जाती लिंक रोड के एक रेस्तराँ के बाहर ये स्वर थे रौनक के .

नीली जीन्स उस पर घुटनों तक लटकता बूटेदार गर्म कुरता, लाल जैकेट की जेबों में हाथ डाले रौनक ख़ासा गुस्से में थी और हो भी क्यों न महीनों बाद आज वह जित्तू से मिल रही थी.

जित्तू यानि जतिन अभी-अभी बी.एस.सी. थर्ड सेमिस्टर के दौरान फौज की दौड़ लगाने और बहुविकल्पीय उत्तरों की सीढी पार कर रंगरूटिया हुआ था. बेसिक ट्रेनिंग के बाद छुट्टी के पहले ही दिन वो रौनक के साथ प्रेम की रस्सा कस्सी में था.

जनवरी की ठंडी सुबह, पाले भरी हवाऐं मफलर ओढ़े हुए कानों और दस्तानों में छिपी हुई ऊँगलियों तक असर में थी और ऊपर से ये रौनक का गुस्सा माहौल को बेरौनक कर रहा था.

करीब दो महीने पहले रात फोन पर बात करते हुए रौनक ने अपनी इच्छा को पूरा करने का आश्वासन लिया था और जित्तू ने हम्मममम… कह कर हामी भरी थी कि जब आप छुट्टियों में आयेंगे तो हम पैदल – पैदल कसार देवी तक चलेंगे और खूब बातें करेंगे. लौटते वक्त नंदा देवी के पास उस रेस्तरां में रसमलाई खायेंगे जहाँ अक्सर हम-उम्र लड़के-लड़कियाँ अपने लिए किसी तरह प्रबंधित किए हुए वक्त का ज़ायका लेते हैं.

तब से रोज रौनक कॉलेज आते-जाते रेस्तरां के बाहर लड़के-लड़कियों में अपने को जतिन के साथ होने का ख्वाब देखती, उसने पिछले दिनों किसी तरह 200 रूपये बचा के इसलिए रख लिए कि इस रेस्तरां में वो जित्तू के लिए मिठास अपने पैसों से खरीदेगी और इन्हीं ख्वाबों में ही रास्ते तय हो जाया करते. उधर कठिन ट्रेनिंग के दौर में मशक्कत से थोड़ा कतरा ख्वाब का जतिन भी ढूढ लिया करता और उसी कतरे को सीने में रखकर गहरी नींद में चला जाता.

खैर, वक्त की एक कभी न भूलने वाली आदत होती है कि कुछ भी हो वो गुजर ही जाता है. गुजरता वक्त जित्तू की ट्रेनिंग खत्म होने का सबूत था. महीनों बाद वो अपने दूगालखोला के ढलान में बड़े घर में आ चुका था. घर तब और भी घर लगने लगता है जब आप घर से दूर चले गये होते हैं. मम्मी-पापा और बहन के साथ तमाम अनुभव बांटने के बाद अब अगला दिन रौनक के लिए नियत था. रौनक पोखरखाली में कही रहती है. इसलिए सांई मंदिर के पास जित्तू ने स्कूटी खड़ी की और रौनक का इंतजार किया. रौनक दूर से आती हुई दिखी तो जित्तू को वो ख्वाब का कतरा जमीन पर आता हुआ लगा जिसे सीने में रखकर वो हर रात सो जाया करता. खैर कसार देवी को जाने के रास्तों के चुनाव को लेकर दोनों में तनातनी हो गई. रौनक का तर्क था कि जेल रोड की ओर से जाने में पड़ोसियों की नज़रों का शिकार होना पड़ सकता है इसलिए रानीधारा के बीच के रास्ते से कहीं शार्ट कट ले लेंगे, लेकिन जित्तू का कहना था कि इस जमाने में हमारे डरने का यह कारण कतई समझ नहीं आता और इन जाड़ों के दिनों में जेल रोड से सुबह धूप में जाना अच्छा रहेगा. तनातनी इतनी बढ़ी की दोनों ने अपने मुंह फुला लिए और एक दूसरे के विपरीत खड़े हो गए 10 मिनट बाद जित्तू ने कहा रौनक चलो ये प्लान की कैसिंल करते हैं, चलो रसमलाई खाने चलते हैं वहीं बैठकर बातें करेंगें. पहले तो रौनक नहीं मानी लेकिन मिठास का कोई विकल्प अब रसमलाई के ही बहाने सही यही सोचकर दोनों सड़क के बाँयी तरफ एक-दूसरे से सटकर चलते रहे.

कभी-कभी चलते-चलते मुस्कुराते हुए जित्तू रौनक का हाथ पकड़ता तो रौनक झट से अलग हो जाती. लड़ते-झगड़ते वो आखिर अपनी मंजिल तक पहुंच ही गये, रेस्तरा के बाहर काउंटर पर लगी भीड़ दोनों को शंका में डालने लगी. जित्तू ने दुकानदार से पूछा क्या उपर जगह नहीं है बैठने को? नहीं है जगह कह तो दिया सुन नहीं रहे, गुस्से में दुकानदार ने जवाब दिया, जतिन को यह पच नहीं पाया. थोड़ा गर्म मिज़ाजी से उसने पूछा कब कहा आपने जो मैं सुनता. दूकान में ग्राहकों की खेप लगी थी इसी गुमान में दूकानदार अपना तमीज भी खो चुका था. नौबत यहाँ तक आ गई कि जित्तू ने दुकानदार का गला पकड़कर अपने अनियंत्रित गुस्से को व्यक्त किया. रौनक जित्तू का हाथ खींचकर जबरदस्ती दूकान से बाहर ले आई चार कदम आगे आकर रौनक गुस्से में मुंह फुलाए थी और जित्तू तो गुस्से में उबल ही रहा था.

रौनक से किसी भी समर्थन ना पाने के कारण उसका गुस्सा बढ रहा था. वो तेज-तेज आगे बढ़ा तो पीछे-पीछे रौनक भी. मिलन चौक पर लगे लोहे के गेटों के बीच से जित्तू तेजी से बाजार की ओर चला गया. पीछे-पीछे रौनक. बहुत आगे जाने पर जित्तू ने पीछे रौनक को नहीं पाया तो दूर तक नज़रें की. गुस्सा अब शंका में बदल गया था. तेजी से लौटकर मिलन चौक पर पहुंचा तो देखा बांयी तरफ पान की दुकान के नीचे एक कुष्ठ रोग पीड़ित महिला अपने कटोरे को हिला-हिलाकर पैसों की गुजारिश कर रही थी.

रौनक ने अपने पर्स से 100 के 2 नोट उस कटोरी में डाल दिए. रुपया कभी-कभी ही सिक्कों के अलावा इस कटोरी में मयस्सर हुआ करता था. 200 रुपये देख बेबस महिला ने कह दिया “सदा सुहागन रहो बेटी.”

ये स्वर किसी सुफियाने संगीत की तान की तरह असर कर रहे थे. अचानक रौनक ने जित्तू को अपनी ओर एकटक देखते हुए पाया. दोनों की आखें एक-दूसरे में खो रही थी प्यार की रसमलाई का ज़ायका दिलों में उतर रहा था.

 

अल्मोड़ा के रहने वाले नीरज भट्ट घुमक्कड़ प्रवृत्ति के हैं. वर्तमान में आकाशवाणी अल्मोड़ा के लिए कार्यक्रम तैयार करते हैं

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

View Comments

  • अति सौन्दर्यपूर्ण वर्णन बड़े भाई

  • बहुत अच्छी और सहज कहानी है।अल्मोड़ा अपने शबाब पर है।

  • नीरज दा बहुत अच्छी और सच्ची कहानी लिखी है आपने♥️

Recent Posts

हरेला: प्रकृति, परंपरा और विज्ञान का अद्भुत संगम

हर साल पर्यावरण संरक्षण के नाम पर लाखों पौधे लगाए जाते हैं. तस्वीरें खिंचती हैं, अभियान…

7 days ago

हरेले के रंग में पहाड़ : फोटो निबन्ध

आज उत्तराखंड का लोक पर्व हरेला है जो हरियाली और प्रकृति से जुड़ा है. हरेले…

7 days ago

अब हल्द्वानी में पहाड़ी उत्पादों के सबसे विश्वसनीय ब्रांड ‘मुनस्यारी हाउस’ की शुरुआत

आपको मुनस्यारी की दुर्लभ राजमा कि तलाश है या फिर कुमाऊं-गढ़वाल के उच्च हिमालयी क्षेत्रों…

1 week ago

खड़कमाफी के जीवन में एक दशक से विचरते एकदंत गजराज

खड़कमाफी के जंगलों और आबादी के बीच पिछले लगभग एक दशक से एक परिचित छाया…

1 week ago

क्या उत्तराखंड, पारिस्थितिक वहन क्षमता को लागू कर सकता है?

हाल ही में मेरी उत्तराखंड यात्रा, हरिद्वार, मसूरी, देहरादून और टिहरी, ने मुझे यह गहरा एहसास कराया कि…

4 weeks ago

रिंगाल आधारित शिल्प : उत्तराखण्ड का एक परम्परागत कुटीर उद्योग

उत्तराखण्ड की पर्वतीय संस्कृति में प्रकृति और मनुष्य के बीच गहरा और आत्मीय संबंध दिखाई…

1 month ago