पिथौरागढ़ जिले से छः किलोमीटर की दूरी पर एक गांव कासनी है. पिथौरागढ झूलाघाट रोड पर स्थित इस गांव के पास ही एक देवल समेत का शिव मंदिर स्थित है. इसे सेरादेवल मंदिर कहते हैं.
सेरादेवल शिव मंदिर देवभागा और चन्द्रभागा नदियों के संगम पर बसा है हालांकि वर्तमान में इन नदियों का स्वरूप केवल एक गाड़ जितना है.
इस मंदिर के विषय में माना जाता है कि यह मंदिर 1500 साल पुराना है. मंदिर बनने के संबंध में दो मान्यताएं हैं. (बर्फबारी के बाद नारायण आश्रम की तस्वीरें)
पहली मान्यता है कि इस क्षेत्र में हल्दुका नाम का एक दैत्य रहता था. हल्दुका ने बम सेना को खूब परेशान किया था. स्थानीय लोगों ने जब देवताओं से हल्दुका के नाश की प्रार्थना की तो लाटा देवता ने हल्दुका का नाश कर दिया.
दूसरी मान्यता यह है कि एक बार एक व्यक्ति शिवलिंग लेकर कैलाश से लौट रहा था. उसे इस स्थान पर प्यास लगी जब उसने शिवलिंग नीचे रखा तो शिवलिंग इसी स्थान पर रह गया. बाद में बम राजा ने स्थान पर महादेव को प्रशन्न कर देवल समेत शिव का मंदिर बनाया.
सेरादेवल मंदिर के मध्य भाग में भगवान शिव का मंदिर है. उसके बगल में कालभैरव और दाएं लाटा देवता व बाएं तरफ नरसिंह और भैरव की मुर्तिया लगी हैं. मंदिर के पीछे की ओर क्षेत्रपाल की मूर्तियां स्थापित की गयी हैं. (जौलजीबी मेला 2018 – फोटो निबन्ध)
2006 में नौ कुमाऊं रेजिमेंट के कमांडेंट आर. के. महाना और ब्रिगेडियर समीर चक्रवर्ती ने स्थानीय लोगों की सहायता से महाकाली की स्थापना की.
इस मंदिर को जाने के लिये पहले सेना परिसर के क्षेत्र से होकर जाना होता था वर्तमान में इसके लिये एक अलग मार्ग बनाया गया है. इस मंदिर में प्रत्येक महाशिवरात्रि के दिन मेले का आयोजन होता है.
मेले में भक्तजन भगवान शिव के दर्शन करने के लिये आते हैं. इस दौरान मंदिर के प्रवेश द्वार पर एक किमी तक की भीड़ लगती है.
देखिये वर्ष 2019 के सेरादेवल मेले की कुछ तस्वीरें. ( सभी तस्वीरें नरेंद्र सिंह परिहार ने ली हैं. )
मूलरूप से पिथौरागढ़ के रहने वाले नरेन्द्र सिंह परिहार वर्तमान में जी. बी. पन्त नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन एनवायरमेंट एंड सस्टेनबल डेवलपमेंट में रिसर्चर हैं.
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