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घोषणा पत्रों में चरम सुख

गैरीगुरु की पालिटिकल इकानोमी : अथ चुनाव प्रसंग-3
पिछली कड़ी- गुलदाढू से सावधान भोंकता कम काटता ज्यादा है

शस्य श्यामला धरती में किसानों की मेहनत फल फूल रही हैं. गोठ-भकार-खेत खलिहान अन्न से भरे पड़े हैं.लाला महाजन पुरानी फिल्मों के सूदखोर कन्हैयालाल की तरह पर्दे से गायब है. पेट्रोल 35 और डीजल 20 पर अटका पड़ा है. सब वाहन सोलर पावर से चल रहे हैं. पैदल चलते लोग एक दूसरे का हालचाल जान रहे हैं.

ओएनजीसी ने धरती और महासागर में तेल के इतने कुएं खोज दिए हैं कि ईरान इराक सऊदी अरब को तेल निर्यात कर पेट्रो डॉलर कमाए जा रहे हैं. भुगतान संतुलन का संरचनात्मक असमायोजन अब अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के स्पेशल विंडो से टपकते एसडीआर या विशेष आहरण अधिकार का मोहताज नहीं. गैस सिलेंडर ओवरवेट होकर मात्र 100 रुपये में आंगन में लुढ़क रहे हैं.

आतंरिक स्थायित्व के अधीन कीमत व रोजगार की दशाएं किसी भी तेजी-मंदी या व्यापार चक्र से ‘अछूत कन्या’ की तरह दूर दूर है. डिजिटल भारत में खाने-पीने, नहाने-रगड़ने, चुपड़ने-पोतने, छिड़कने-लगाने के साथ ही पहनने व उतारने की सभी वस्तु, वस्तुओं की टोकरी, मदों के झोले व सेवा के बोरे होम डिलीवरी पर न्यूनतम कीमत में डोर बैल बजने के तुरंत बाद हाजिर हो जाती हैं.

पुनर्निर्माण क्षेत्र के अधीन कभी कुकुरमुत्तों की तरह उगे कॉन्वेंट पब्लिक स्कूलों का प्रदर्शन प्रभाव सरकारी विद्यालयों महाविद्यालयों पर कायारूपांतरण की भांति पड़ गया है. उनके जर्जर जीर्ण-शीर्ण भवनों का मुखाकृति विज्ञान बदल चुका है. अब वह आधुनिकतम उठने बैठने दौड़ने भागने खेलने कूदने की विधाओं से परिपूर्ण हो आदर्श गुरुकुल का स्वरूप धारण कर चुके हैं. उच्च शिक्षा जो कभी नेतागिरी ठेकेदारी व रंग बाजी का अड्डा समझी जाती थी अब कौटिल्य के अर्थशास्त्र से चतुरंगिणी मानी जानि लगी है. इनका अवमूल्यन कभी वृंदावन गार्डन मुगल गार्डन और लोदी गार्डन में हो रही तोता मैना बाजी और लिपटा पटकी के प्रतिमान स्थापित कर गया था. अब उसे नालंदा व तक्षशिला की मात्र गुरु-शिष्य की एकनिष्ट परंपरा से समावेशित कर दिया गया है.

हर क्षेत्र में वैज्ञानिक सोच बलवती है. अन्धविश्वास और कुरीतियों के साथ रुढ़िवादी विचारधारा के भी वैज्ञानिक आयाम खोज लिए गए हैं. टेक्नोलॉजी प्रबंध व् मेडिकल कालेज तथा फैशन डिजाइनिंग इंस्टीट्यूटों को ‘एगमार्क’ व् ‘एफसीएसएसआई’ की मान्यता मिल गई है. इससे वह कम पूंजी के साथ उच्च मानव शक्ति के प्रमाणीकृत श्रम का संयोग कर न्यूनतम लागत पर उत्पादन करने में दक्ष फर्में चलाने में समर्थ हैं.

अब प्रवास, पलायन व आव्रजन की कोई गुंजाइश ही नहीं क्योंकि हर कल कारखाना फैक्ट्री-उपक्रम और छोटा-मझोला-विशाल उद्योग ‘ अतुल्य भारत’ ‘शाइनिंग इंडिया’ मेक इन इंडिया के जयघोष वाली उस लहर के बनने और प्रसारित करने में सक्षम व दक्ष हो गया है जिसे विजन 2014 में प्रस्तावित किया गया था. ‘थर्ड वेव’, ‘फ्यूचर शौक’ और पावर शिफ्ट में सूचनाओं के समंदरमें डूबती उतरती मगर सूचनाओं और सरकारों से कटी पहली दूसरी व अनगिनत लहरों के जनक आर्थिक भविष्यवेत्ता ‘एलविन टाफलर’ की आत्मा ऐसी डिजिटल संचार क्रांति की अभूतपूर्व सफलता से तरंगित हो रही है. आभासी दुनिया में लाईक व शेयर से बड़ी-बड़ी सरकारें हिलने डोलने लगी हैं.

अपने देश के भौगोलिक भूभाग और राजनीतिक सीमा के भीतर पहली लहर का स्पन्दन कमाई वाले दिहाड़ी मजदूर, बटाईदार, यंत्र-तंत्रों के मिस्त्री-मैकेनिक, लोहार शिल्पकार, जुगाड़ू टेकनीक से आजीविका कमाने वाले हरफनमौलाओं व सफाईकारों के साथ समस्त तृतीय व चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारियों द्वारा महसूस किया गया था. जिन्हें हर हालत में सरकार द्वारा हर माह पहली तारीख को जीरो बैलेंस अकाउंट में भी वेतन राशि का भुगतान करना ट्रेजरी हेतु अनिवार्य कर दिया गया है. छुटपुट अनशन, धरना, सामूहिक तालाबंदी व यूनियन बाजी कर्मचारियों के मनोबल व कार्य उत्साह के डोपामाइन स्तर को बढ़ाते हैं. इसलिए ऐसी छुटपुट घटनाएं उनके वेतन कटने का कारण नहीं बनेगी. इसके अतिरिक्त जीपीएफ, बीमा पेंशन व नसबंदी भत्तों पर भी डियरनेस एलाउंस होगा.

दूसरी लहर में समाज में व्याप्त मुंशी, लाला, सी.ए, वकील, दलाल, ठेकेदार व मनोरंजन जगत के कास्टिंग डायरेक्टरों की एक अलग रेजीमेंट बनाई जाएगी. जिनका मार्गदर्शन आजीवन कारावास व फांसी की सजा भुगत रहे पेशेवर करेंगे. ताकि वह आंतरिक शत्रुओं के साथ विदेशी आततायियों को अपनी जोंक सी खून चूसने वाली नैसर्गिक प्रतिभा के द्वारा नेस्तानाबूद कर दें. ऐसे में सर्जिकल स्ट्राइक के प्रमाणीकरण की आवश्यकता भी न्यूनतम हो जाएगी. अंडरकवर ऑपरेशन चलते रहेंगे. अब बचा मध्यवर्ग जो सामान्यतः घर गृहस्थी के विषम दुष्चक्र में फंसे होते हैं. वह भावनात्मक रूप से शिथिल, घर के भीतर ‘हजार ख्वाहिशें पाले’ और ‘ पड़ोसी की कैसे जले जान’ से अनुप्राणित रहते हैं. इसलिए इन्हें हर छूट, अनुग्रह अनुदान से परिपूर्ण रखा जाएगा.

तीसरी लहर में उच्च वर्ग को हवाला निवाला की सटर-पटर जैसे पूंजी हस्तांतरण करने से मुक्त रखने हेतु लिंक के ताले और गोदरेज की इलेक्ट्रॉनिक तिजोरियों के गैजेट्स का आवंटन कर दिया गया है. हर कक्ष के अरबों खरबों से बनी उनकी अट्टालिकाओं को किसी भी प्रकार के ख़ुफ़िया कैमरों व् सीआईडी की टीम से मुक्त कर दिया जाएगा ताकि कुछ तो गड़बड़ है का झोल न रहे. इससे उनका मान सम्मान घर के भीतर सुरक्षित रहेगा साथ ही देश के घरों में विलास कर रही लक्ष्मी भी सत्ता के कोप और प्रतिशोध की कार्यवाही से बची रहेगी. उनकी सुरक्षा की निगहबानी आपसी तालमेल व् द्विपक्षीय संघियों द्वारा होती रहेगी. ऐसे में यह वर्ग विदेशी बैंकों के प्रलोभन में भी नहीं फंसेगा. यह याद दिलाना आवश्यक है कि धनाढ्यों से अराजक तत्वों द्वारा की जाने वाली हफ्ता वसूली बंद की जा चुकी है. संरक्षण की नीति और इंस्पेक्टर राज को त्यागे हुए भी दशक से अधिक हो चुके हैं. यह भी दृष्टव्य है कि गुंडे मवाली उठाईगीरों बदजबान अफवाह बाजों व केकड़े बुद्धिजीवियों की शिनाख्त कर उनके प्रदूषित तन पर चिप लगा दी गई है. जीपीआरएस की सतर्क निगरानी के साथ हर चाल, गली, मुहल्ले, चौराहे- पगडंडी पर एनकाउंटर जोन बने हैं जहां मित्र पुलिस तैनात है. बाल बच्चे मनोरम मनोहारी पार्कों में मनभावन खेल खेल रहे हैं. गुल्ली डंडा, खो-खो,छुप्पम-छुपाई, अड्डू, चितपट जैसे खेलों की मान्यता बनी हुई है. आईपीएल पर बैन लग गया है. चुनाव के मौसम में तो क्रिकेट देखना, खेलना, सुनना व इसके विषय में सोचना भी प्रतिबंधित है क्योंकि इसकी चरसी लत पंजे के छक्कों के विषय में मन एकाग्र ही नहीं कर पाती. चांद से वापस आकर इंस्पेक्टर मातादीन ने सुरक्षा तंत्र के समस्त छिद्रों को वहां की शीतल जंग व फफूद रहित सीमेंट से पाट दिया है.

हर दृष्टि से महिला शक्ति का निर्भया स्वरुप स्वच्छंद हो आहार विहार में किसी भी प्रकार की लुच्च लफंगई से मुक्त कर दिया गया है. तमाम मनुवादी साहित्य के साथ झोलाछाप प्रगतिशील कचड़े को पुरातत्व विभाग के गोदामों में फ्रीज कर दिया गया है. देशभर में समान नागरिकता संहिता लागू होने से सांप्रदायिक सौहार्द की पुष्प लड़ियां गली-गली में एक दूसरे के गले में लटका तिलकधारी- दाढ़ीधारी एक-दूसरे के दरख्सतान में बनी परसादी खा परमतृप्ति की डकार मार रहे हैं. फुसकार-भोंकार-टंकार व डंकार की गुंजाइश ही नहीं क्योंकि इन्वायरमेंट सेंसिटिविटी टेकनीक इतनी बेहतर व कारगार बना दी गई है कि आमजन में इसका प्रयोग हो सके. इसे प्रोफेसर ‘शूमाखर’ ने अपनी किताब ‘स्मौल इज ब्यूटीफुल’ में इंटरमीडिएट टेक्नोलॉजी के द्वारा समझाया था. वायु ध्वनि के साथ वैचारिक प्रदूषण को सोखने वाले हाई कार्बन-सिलिकॉन जैमर पूरी कुशलता के साथ विशुद्ध ऑक्सीजन का स्प्रेड इफेक्ट फैला चुके हैं. दुमंजिले से ऊंचे मकानों भवनों में व्याप्त ओजोन परत के समस्त छिद्र भी कवर किए जा चुके हैं.

वाह्य संतुलन की दृष्टि से काणी आंख वाले पड़ोसी देश जो कश्मीर में हमेशा ही न जाने कितने बबाली जिन्न खबीस बेताल शैतान टारगेट कर देता था को सबक सिखा दिया गया है. पीरों के पीर महा फकीर बाबा बंगाली के अचूक काट वाले जालिम जंतरों व अजूबी मंतरों से इन्हें हैवान बना चेनाब के पानी में गला और डल झील में जमा हूर की परियों के आने को गुलों में रंग भर दिए गए हैं. जन्नत के शहर में फिल्म सीरियल वेब की रात दिन शूटिंग गुलजार है.कश्मीर के लोक संगीत के साथ भोजपुरी गीतों का फ्यूजन हो रहा है. सपना चौधरी, मोनालिसा, निरहुआ की तिकड़ी गली गली टोटल धमाल कर गई है. सारे पत्थरबाज, पुलम, खुमानी, अखरोट, चिलगोजे और सेव की रेहड़ी सजा दिए हैं. चीड़ के स्यूंते भी बिक रहे हैं और दहशत दर्द जाफरान के उद्योग में लौट आए हैं. हुनरमंद कश्मीरी रफूगर जात धरम के हुल्लड़ में फट गई पोशाकों पर कसीदाकारी कर चुके वहीं हाफ़िज, दाऊद व् मसूद बाघा बार्डर पर रस्सी से बंधे तड़प रहे हैं. बस गुसल को बायां हाथ छोड़ दिया गया है ताकि खाली समय अल्युमीनियम का कटोरा थाम ऊपर वाले की सुनवाई व अपनी थोड़ी कमाई कर सकें.

दूसरी तरफ उत्तर पूर्व के प्रदेश में फल फूल रहा माओवाद किम उल जोन के रॉकेट लांचरों की जद में है. डीआरडीओ और इसरो इतना महत्वहीन काम हाथ में नहीं लेते. उनके टारगेट में अंतरिक्ष है. छपरा बिहार उड़ीसा झारखंड के नक्सली अब गया के पंडितों से प्रशिक्षित हो पुरखों का श्राद्ध करने में पारंगत हो गए हैं. अरे हां, वह नीरव मोदी, विजय माल्या ललित मोदी जी और मेहुल चौकसी लेखा व वित्तीय संस्थानों में विजिटिंग प्रोफेसर बना दिए गए हैं ताकि वित्त, राजकोष व हवाला के निर्यात- पुर्ननिर्यात पर प्रभावी रोक लगी रहे तथा देश आत्मनिर्भरता व स्वावलंबन की दिशा में प्राचीन भारत के स्वर्ण युग की गरिमा के समकक्ष रहे.

देश का भाल हिमाल है. नील गगन मंडल से नीचे नगाधिराज हिमालय की नयनाभिराम उपत्यकाओं में पर्याप्त हिम है, हिमनद बह रहे हैं, सरिताएं किलक रही हैं. पर्यटक यहां परिज्रावक की भांति अपना थाली-लोटा सहेज आ रहे हैं. यहां की दुर्लभ घास वनस्पति भेषज व कंदमूल फलों से धारणीय क्षमता बहुत बढ़ गई है. अवलंबन क्षेत्र में प्लास्टिक व पॉलीथिन के कच्चड़ के साथ टिनफूड बियर देसी विदेशी केन के स्वतः विनिष्टीकरण से पारिस्थितिकी पर अनुकूल प्रभाव पड़ गया है.

हिमालय पट्टी के समस्त राज्य पुनर्गठन अधिनियम 1966 में संशोधन करते हुए अब इस क्षेत्र को मल्ला हिमालय और तल्ला हिमालय के नाम से जाना जाएगा. प्रकृतिवादियों (फिजियोक्रेट्स) के सिद्धांत का अनुसरण करते हुए इसे ठंडे और गर्म के विभाजन में बांटा गया है. मल्ला हिमालय में सिर्फ पहाड़ी क्षेत्र हैं. जिसके भूमिप्रबंध, नौकरी हेतु पलायन प्रवास रोकने को यहां के निवासी शत प्रतिशत आरक्षण के पात्र होंगे. यहां राज्य कर्मचारियों की सेवा शर्तें शुद्ध पहाड़ी राज्य होने से शत प्रतिशत केंद्र जैसी होंगी. साथ में न्यूनतम 25% ग्रीन बोनस हर परिवार को मिलेगा. क्योंकि स्थानिक विशेषताओं में यह पाया गया कि हर परिवार अपने घर के आगे लाई- मूली, हालंग-पालंग, मेथी-चुआ, धनिया- पुदीना के साथ तुरई कदुए ककड़ी और गेठी की बेल ताने रखता है. साथ ही गाय, बकरी, मुर्गी, बिल्ली, कुत्ता जैसे मित्र पशु पक्षियों को शरण देता है.

दूसरी ओर तल्ला हिमालय में तराई-भाभर का क्षेत्र शामिल है. जहां पहाड़ से रिस-रिसकर आई संपदा पर कइयों का अधिकार बना हुआ है. इसे परिवहन व भारी कमाई वाले उद्योगों का सुरक्षित जोन बनाया जाना ईष्ट है. हर फर्म, फैक्ट्री मकान दुकान हाट मंडी मैं दिख रही तराजू के साथ यहां हर चेहरे के आगे भी तराजू लटकी दिखती है जिससे वह बात करने में भी अपना नफा नुकसान तोलता रहे और वाणिकवाद (मरकेंटलिज्म) की फिलोसोफी को बनाए रखे.

राष्ट्रीय परिसीमन आयोग की सिफारिशों से मल्ला व तल्ला हिमालय में आने वाले क्षेत्र में किसी भी मूलनिवासी के हक-हकूकों का अतिक्रमण किसी बाहरी व्यक्ति के द्वारा नहीं किया जाना तय किया गया. पर शोध अन्वेषण से यह ज्ञात हुआ कि यहां के मूलनिवासी तो खस हैं, बाकी तो सब बाहर से आए हैं, महाराष्ट्र से गुजरात से हिमाचल से और यहां तक नेपाल से भी. अतः अनेक रियायतों की प्राप्ति के साथ यहां की लुप्त सभ्यता, खोई संस्कृति व बिछुड़ी परंपराओं के अनुरक्षण व विकास के लिए विशेष प्रयास कर दिए जा रहे हैं. यहां के विकास के लिए उच्च अधिकारी व नेता कभी कोरिया गए तो कभी ताइवान कभी सिंगापुर मॉडल चला ! तो कभी मलेशिया का. कभी भांग पर फोकस किया गया कभी सिसूण पर. पर अब नीति आयोग ने डॉक्टर परमार के मॉडल के अंधानुकरण को ही उपयुक्त पाया है. हिमालय पुनर्गठन अधिनियम की धारा उपधारा, नियम अधिनियम स्पष्ट रूप से बिंदुवार वर्णित कर दिए गए हैं.

एक विशेष केस स्टडी की तरह दिख रहा उत्तराखंड भी अत्यंत गौरवशाली इतिहास का बोध कराता है. जिसके गठन के धुर विरोधी ही यहां मुख्यमंत्री बनने में संकोच विहीन रहे. अब ऑल वेदर रोड से जोड़कर इसे पूरी तरह मुख्यधारा से संयोजित कर दिया गया है. ऑल वेदर रोड की प्रदेश की भाग्य रेखा होगी. इससे यहां आ रही प्राकृतिक आपदाओं से यहां के निवासी तुरंत सुरक्षित तल्ला हिमालय जा पाने की सुविधा प्राप्त करेंगे. आबाद ग्रामों को गैर आबाद होने की कल्पना करेंगे तथा स्थायी पलायन प्रवास कर गए लोगों के साथ एनआरआई भी साल दो साल में गांव के द्याप्ता की पूजा व जागर लगाने में आवागमन की सुविधाएं प्राप्त कर पाएंगे.चार धाम यात्रा वाले तो बुलाए बिन बुलाए आते ही रहते हैं.

दूसरा सबल पक्ष है चूल्हा- चौका फूंकने में लकड़ी बीनना और दूध-दन्याली के फेर में घास के लूटे लगाना. जिनकी प्रातः से गोधूलि बेला तक की लकड़ी बीनने की संयुक्त चिंता से अबोध बालाओं के साथ स्कूल जाती किशोरियां व बात प्रसूत से ग्रसित मातृशक्ति भ्योलों से रड़ी जाने, घुरी जाने, भालू, कुकरी बाघ और बन डाढुओं के आक्रमण से मुक्ति पाने के अथक नौराटों से ग्रस्त हैं. इसीकारण सैणियों के हाथ गैस सिलेंडर थमा त्वरित समाधान कर दिया गया है. इससे उपभोक्ता की बचत के रूप में जो समय बचेगा उसका उपयोग घर कुड़ी के क्वीड़पाथ हर डाने काने की रोचक फसक द्वारा किया जा सकता है.

फिर आयुष्मान योजना को भी शत प्रतिशत आबादी से जोड़ दिया गया है. अब सब नानतिन, दाज्यू, बबा, इजा, कैंजा, बुबू, ठुलबू यहां स्थायी रूप से तैनात चरक व सुश्रुत चिकित्सकों से जन औषधि परियोजना के अधीन प्रदत्त संजीवनी बूटीयों के उपयोग से सुखी निरोग व शतायु आयु श्राप भोगने में समर्थ बनेंगे. अपार कष्टों रोग शोक से ग्रस्त होने की शंकाएं निर्मूल ही रहेंगी. डांडी डोली चारपाइयों में लादकर ले जा रही जतकालियों को बीच बाट में ह्वें-ह्वें की किलकारी भी नहीं सुनाई देगी.ऐसे विशिष्ट प्रावधान भी कर दिए गए हैं कि कोई भी मरीज हायर सेंटरों में रिफर नहीं होगा क्योंकि पहाड़ी क्षेत्र प्रदूषण मुक्त है अतः भारी रोगों के वायरस यहां क्रियाशील नहीं होते. द्यार का पानी, बांज का पानी पीने वाले हुए यहां के लोग. साथ ही स्थानीय जन पथरी गलाने के लिए घौत की दाल और सिलफोड़े का काढ़ा पीने पर विवश नहीं होंगे साथ ही अब बूंद बूंद पिशाब अटकने में किलमोड़े की जड़ चबाने की जरूरत भी नहीं होगी क्योंकि तमाम भेषजों का विदोहन सहकारी संघों के माध्यम से करते हुए उन्हें नया रंग नए रूप में ढाल गुटी, बटी,रस व अरिष्ट के साथ काढ़ा बनाने का उत्तरदायित्व हरिद्वार में गंगा मैया की पवित्र धरा पर स्थापित रोगांजलि इंस्टीट्यूट को सोंप दिया गया है.

पहाड़ से पलायन रोकने के लिए सचल कार्य दल बना दिए गए हैं. ग्राम पधानियों व ग्राम प्रधानों द्वारा नीचे से नियोजन की रणनीति अपनाई गई है. यह संकल्पना परखी जा रही है कि क्या पहाड़ में अभी भी भनमजुए, बैरा, वेटर, ड्राइवर, क्लीनर, सचिवालय के बाबू, एजी आफिस के प्रशासनिक आधिकारी ही पलायन को बाध्य होते हैं? यहां के सृजनशील चित्रकार, फिल्मकार, पत्रकार, कलाकार कितने जतन से ‘बेडु पाको बारामासा’ की उलट बांसी स्थापित कर पाए पर ऑपरेशनल रिसर्च चल रही है.

अब गुणमुण करते नखचडुए ऊंची धोतियों वाले बामण और तुर्रम मूछों वाले सूर्यवंशी राजपूत भी आरक्षण हेतु सुपात्र की श्रेणी में खींच लिए गए हैं. साइंस सिटी के साथ सैन्य धाम बनाने की योजना परवान चढ रही है जिनका व्यापक प्रचार-प्रसार चुनाव में व्यस्त दल सांस फुला हाड़ गलाकर किए जा रहे हैं. ओsssहोsss!

गुलुज्जी ओ गुलुज्जी ! लो चाय पीलो !
अरे लल्लन ! गैरीगुरु नींद से उठ जागे.
काकलोच के डिनल के बाद धल आए तो टुन्न हो गए. अब तक छोए लह गए. क्या-क्या बलबला रहे थे. खुश भी हो लहे थे. फिल खुल्लाते भी ले लहे थे.
गुलुज्जी. काकलोच को बली पाल्टी का टिकट मिल गया है. कब से खला है आप उठें तो आछीलवाद मिले. पुलानी पाल्टी से लिजाइन कल दिया.
सामने भुजंग चेला कालीचरण ऊर्फ काकरोच हाथ बांधे खड़ा था. अचानक ही उसकी विशाल देह धरती पर दंडवत हो गयी और उसका मस्तक गैरीगुरु के चरणों को घिसने लगा.
गैरीगुरु ने अपने दोनों हाथों से कालीचरण के घने बालों पर हाथ फिराया और फिर उसके दोनों कान उमेठ दिए.

(जारी)

जीवन भर उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के कुल महाविद्यालयों में अर्थशास्त्र की प्राध्यापकी करते रहे प्रोफेसर मृगेश पाण्डे फिलहाल सेवानिवृत्ति के उपरान्त हल्द्वानी में रहते हैं. अर्थशास्त्र के अतिरिक्त फोटोग्राफी, साहसिक पर्यटन, भाषा-साहित्य, रंगमंच, सिनेमा, इतिहास और लोक पर विषदअधिकार रखने वाले मृगेश पाण्डे काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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Girish Lohani

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