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उत्तराखंड के सबसे गरीब गांव से तस्वीरें

वनराजी, वनरौत या वनरावत उत्तराखंड की एक जनजाति है. वनराजी उत्तराखंड के दो जिलों पिथौरागढ़ और चम्पावत में रहते हैं. पिथौरागढ़ की दो तहसीलों धारचूला और डीडीहाट में वनराजी रहते हैं.

धारचूला व डीडीहाट में कुल 9 बसासतों किमखोला, भोकतिरवा, गांनागांव, चिपलतरा, कूटाचैरानी, मदनपुरी, जमतड़ी, कट्यूली, औलतडी में वनराजी रहते हैं. चम्पावत में खिरद्वारी में वनराजी परिवार रहते हैं.

अधिकांश जनजाति की तरह वनराजी भी अत्यंत संकोची स्वभाव के होते हैं. डेढ़ दशक पहले तक वनराजी जंगलों की गुफाओं में रहते थे. वनराजी वस्तु विनिमय प्रणाली द्वारा ही अपना भरण पोषण करते थे.

लकड़ी के बर्तन बनाकर रात्रि के समय वनराजी लोगों के घरों के आगे रख देते थे जिसे वह बर्तन लेना होता वह उसमें कुछ अनाज रखकर छोड़ देता जिसे अगली रात वनराजी ले जाते और खाली बर्तन वहीं छोड़ जाते.

जून 1967 में भारत सरकार ने पहली बार इन्हें जनजाति की मान्यता दी. 1974 में उस समय की उत्तर प्रदेश सरकार ने उन्हें भूमि अधिकार दिये जो आज तक उन्हें पूरे नहीं मिले हैं.

भारत सरकार के प्रयासों से इनके घुमन्तु जीवन में कुछ बदलाव आये और आने वाले कई दशक तक वनराजी आस-पास के गावों और बाजारों में संभ्रांतों के यहां लकड़ी काटते या चीरते पाये गए.

डीडीहाट तहसील में जमतड़ी ग्राम सभा के अंतर्गत वनराजियों का एक गांव है कन्तोली. जिसकी सड़क मार्ग से दूरी आज भी चार किमी है और मुख्य बाजार से दूरी 10 किमी है.

विकासखंड कनालीछीना में पड़ने वाले इस गांव में सभी वनराजी ही रहते हैं. जिनकी कुल संख्या लगभग 50 के आस-पास है. इस गांव के सभी परिवार अन्त्योदय वाले हैं अर्थात् समाज के अंतिम तबके से जुड़े हैं.

अत्यंत गरीबी में रहने वाले ये परिवार बेहद मेहनती होते हैं. इनकी आजीविका का मुख्य स्त्रोत कृषि है. मुख्य रूप से ये लोग गेहूं, भट्ट और मडवा उगाते हैं. उत्तराखंड के संभवतः सबसे गरीब गांव की तस्वीरें देखिये :

वनराजियों के विषय में अधिक पढ़िये : उत्तराखण्ड की वनरावत जनजाति

मूलरूप से पिथौरागढ़ के रहने वाले नरेन्द्र सिंह परिहार वर्तमान में जी. बी. पन्त नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन एनवायरमेंट एंड सस्टेनबल डेवलपमेंट में रिसर्चर हैं.

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Girish Lohani

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