Featured

बाड़ाहाट से मंगसीर बग्वाल की कुछ तस्वीरें

उत्तराखण्ड के गढ़वाल मंडल के सीमांत जनपद उत्तरकाशी के टिहरी, नौगांव, पुरोला. मोरी, जनपद के थत्युड, देहरादून के कालसी, चकराता, हिमाचल के शिमला, कुल्लू, सिरमौर में मैदानी इलाकों में मनायी जाने वाली दीपावली के ठीक एक माह बाद मंगसिर बग्वाल का आयोजन किया जाता है.
मान्यता है की गढ़वाल नरेश महिपत शाह के शासनकाल में तिब्बती लुटेरे गढ़वाल की सीमाओं में घुसकर लूटपाट किया करते थे. तब इनसे निपटने के लिए माधो सिह भंडारी व लोदी रिखोला के नेतृत्व में चमोली के पैनखंडा और उत्तरकाशी के टकनौर क्षेत्र से सेना भेजी गयी थी. यह सेना जीत हासिल करते हुए तिब्बत के दावाघाट तक पहुंच गई. युद्ध में व्यस्त हो जाने के कारण माधो सिह भंडारी कार्तिक मास की बग्वाल के लिए अपने गांव नहीं पहुंच पाए. ऐसे में उन्होंने अपने घर संदेश भिजवाया कि उनके लौटने पर ही बग्वाल मनाई जाएगी. एक महीने बाद माधो सिंह अपने गांव मलेथा पहुंचे तब स्थानीय ग्रामीणों द्वारा उत्सवपूर्वक बग्वाल मनाई गई. तभी से गढ़वाल में मंगशीर माह में इस बग्वाल को मनाने की परंपरा की शुरुआत हुई. तभी से हर साल मंगसिर के महीने में गढ़वाल के कई क्षेत्रों में बग्वाल का आयोजन किया जाता है. इस अवसर पर सामूहिक रांसी, तांदी लोकनृत्य पर स्थानीय ग्रामीण झूमते दिखाई देते हैं.

2007 से उत्तरकाशी में स्थानीय लोगों की पहल पर आजाद मैदान में बग्वाल का आयोजन बाड़ाहाट की बग्वाल के नाम से किया जाता है. इस माह, 6 एवं 7 दिसंबर 2018 (21 और 22 गते मंगशीर) को, बाड़ाहाट में आयोजित बग्वाल की कुछ तस्वीरें मयंक आर्या ने हमें भेजी हैं.

पौड़ी के एकेश्वर ब्लॉक के बिंजोली गाँव से ताल्लुक रखने वाले मयंक आर्या की परवरिश और शिक्षा-दीक्षा दिल्ली में ही हुई है. उत्तराखण्ड से गहरा सरोकार रखने वाले मयंक एक बेहतरीन फोटोग्राफर और लेखक के तौर पर जाने जाते हैं. उनका कैमरा और कलम दोनों ही उत्तराखण्ड के विभिन्न पहलुओं को अभिव्यक्त करते रहते हैं.

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Sudhir Kumar

Recent Posts

कुमाऊँ की विलुप्त होती जन्माष्टमी पट्ट-चित्र परम्परा

कुमाऊँ में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी केवल भगवान कृष्ण के जन्म का धार्मिक पर्व नहीं रही है,…

1 week ago

बद्रीदत्त पांडे और इंद्र सिंह नयाल ने रखा था ‘उत्तराखंड राज्य की संकल्पना’ का वैचारिक आधार

पिछली कड़ी : पहले समाज बदलो, राज्य अपने आप सार्थक हो जाएगा : इंद्र सिंह नयाल इन्द्र…

2 weeks ago

आकर्षक कलेवर में आंचलिक परिवेश की किताब “टुकड़ा-टुकड़ा जिंदगी”

पूरी तरह आंचलिक परिवेश में तैयार, "टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी" वरिष्ठ इतिहासकार डॉ निर्मल जोशी की नव प्रकाशित…

2 weeks ago

भूख न तीस न डर न फिकर छ्, मुट्ट बोटीं छन कसीं कमर छ्

ये सितंबर 1994 की सुबह थी जब खटीमा में पूर्व सैनिकों का जुलूस निकल रहा था. पूर्व…

2 weeks ago

उत्तराखण्ड के सरोवर

उत्तराखण्ड को सामान्यतः हिमालय, नदियों, झरनों और जलधाराओं की भूमि के रूप में जाना जाता है. किंतु…

2 weeks ago

दौड़ता अल्मोड़ा : फ़ोटो निबंध

पिछले 3 सालों से अल्मोड़ा के कुछ जागरूक युवा अल्मोड़ा मानसून मैराथन का आयोजन कर रहे हैं,जिसमें…

2 weeks ago