एक सुकून भरी सुबह है. देवरिया ताल और तुंगनाथ ट्रैक हमने सफलतापूर्वक जो कर लिये हैं. चाय का कप हाथ में लिए पोतीबासा होटल की दूसरी मंजिल की बालकनी में बैठकर मैं दूर तलक फैले गहरे हरे रंग के जंगल का अपनी आंखों से भ्रमण कर रही हूं. कुछ खच्चर पंक्तियों में ऊपर की ओर आ रहे हैं, कुछ के मालिक इनकी पीठ पर बैठे हुए हैं. सुबह-सुबह इनके गले में बंधी घंटियों की टनटनाहट भोर के प्राकृत कलरव को मधुर ताल दे रही है. संभवतः खच्चरों का ये कारवां तुंगनाथ या देवरिया ताल उजरत के लिए जा रहा है. वहीं नीचे ही झुग्गी में एक मजदूर औरत ने भगोने में कुछ चढ़ा दिया है. यात्रा का सीजन है उसे भी पैसे कमाने के लिए कहीं न कहीं तो जाना ही पड़ता होगा. साथ ही साथ वह अपना कच्चा आंगन पत्तों से बुहार रही है. (Omkareshwar Temple Ukhimath)

चार दिनों तक पहाड़ों की सुबह को हमने तन और मन से आत्मसात किया और भोर की वैभवता में उत्पन्न मन की संपन्नता को हमेशा के लिए अपने साथ सहेज लिया है. साक्षात दिनकर की गरिमा और मौन तपस्वी सदृश हिमालय के गंभीर व्यक्तित्व को अनुसरण करने हेतु हम साथ लेकर जा रहे हैं. ऊखीमठ से देहरादून वापसी की ओर रास्ते में पड़ने वाले सभी प्रसिद्ध मंदिरों के दर्शन करने के पश्चात ही आराम से घर लौटने की हमने योजना बनायी है. जाख मंदिर, कालीमठ और तुंगनाथ मंदिर के दर्शन करने के उपरांत सांस्कृतिक धरोहर ओंकारेश्वर मंदिर के दर्शन हेतु सुबह करीब साढे-सात बजे हम ओंकारेश्वर मंदिर में रुक गये हैं.

यात्रियों की बहुत भीड़ है. ड्राइवर भैय्या परेशान है. उन्होंने कहा है कि पार्किंग के लिए जगह नहीं मिली तो गाड़ी बहुत दूर खड़ी करनी पड़ेगी, इसके चलते आप लोगों को मंदिर बहुत पैदल चलना पड़ेगा. लेकिन खुशकिस्मत हैं हम कि हमें पार्किंग की जगह मिल गयी है. पूजा का सामान बेचते व्यापारियों के तीव्र कोलाहल के मध्य मंदिर में गुंजायमान घंटियों और ढोल-दमाऊ की ध्वनि बहुत आह्लादित कर रही है. एक संकरी सी गली है जहां दुकानों से धूप, लोबान सुगंधित हो रहा है. चारपाइयों पर ओंकारेश्वर भगवान को अर्पित करने हेतु दोने में तरह-तरह के सुंदर व ताजे पुष्प रखे हुए हैं. मैंने पूछा दुकानदारों से “ये फूल कहां से आते हैं?” उन्होंने कहा “सब यहीं पर उगते हैं.” महान है ये देव-धरित्री! देवताओं के अलंकार एवं श्रृंगार हेतु पुष्प भी देवभूमि के ही अर्पित हो रहे हैं. मंदिर तक पूरी गली में विभिन्न प्रकार के पकवानों की भी महक आ रही है. कहीं पर गुलाबी सी लस्सी पर्यटकों को आकर्षित कर रही है.दर्शन करने के उपरांत निश्चित ही इस लस्सी का आनंद लेंगे यह सोचकर हम ओंकारेश्वर मंदिर की ओर प्रवृत्त हों गये हैं.

ओंकारेश्वर मंदिर क्योंकि ऊखीमठ में है अतः ऊखीमठ के बारे में जान लेना भी आवश्यक है. उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में स्थित ऊखीमठ सांस्कृतिक विरासत एवं पौराणिक मान्यताओं का नगर है. ऊखीमठ विभिन्न धार्मिक और पर्यटन स्थलों तक पहुंचने का केंद्रीय स्थल भी है. यहां से मद्महेश्वर (दूसरा केदार) तुंगनाथ (तीसरा केदार) और देवरिया ताल जाया जा सकता है. उत्तराखंड में  मंदिर व इनसे संबद्ध सांस्कृतिक एवं पौराणिक संपन्नता यत्र-तत्र देखी जा सकती है. उत्तराखंड के प्रत्येक मंदिर का अपना विशेष महत्व एवं  अस्तित्व है जिससे जुड़ी हुई हैं रोचक किंवदंतियां एवं पौराणिक मान्यताएं. ऊखीमठ समुद्रतल से लगभग 1311 मीटर की ऊंचाई और रूद्रप्रयाग से 41 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है. ओंकारेश्वर मंदिर के दर्शनार्थ मुख्य सड़क से थोड़ा भीतर की ओर जाना पड़ता है. मंदिर का सिंह द्वार बहुत सुंदर व कलाकृति से अलंकृत है माना जाता है कि ओंकारेश्वर मंदिर एकमात्र ऐसा प्राचीनतम मंदिर है जिसके द्वारपाल के रूप में ब्रह्मदेव व श्रीहरि विद्यमान हैं. अन्यत्र कहीं ऐसा नहीं है.

मंदिर में प्रवेश करते ही बांये तरफ पंक्तिवार भवननुमा कमरे निर्मित हैं. जिसकी छत पठाली से बनी हुई हैं. हमें बताया गया है कि इस भवन में केदारनाथ के मुख्य पुजारी रावल शीतकाल में रहते हैं. पंचकेदारों की दिव्यमूर्तियां और शिवलिंग स्थापित होने के कारण इसे पंच गद्दीस्थल भी कहा जाता है.

ओंकारेश्वर मंदिर के बारे में मान्यता है कि इसके दर्शन कर लेने मात्र से ही पंचकेदारों के दर्शन हो जाते हैं.

ओंकारेश्वर मंदिर मंदाकिनी नदी के तट पर अवस्थित चारों ओर से प्राकृतिक छटा से सुशोभित है. ओंकारेश्वर मंदिर को बाबा केदारनाथ की द्वितीय गद्दीपीठ कहा जाता है क्योंकि भगवान केदारनाथ की उत्सव डोली इसी मंदिर में लायी जाती है और यहीं पर शीतकाल में बाबा केदार की छ: महीने तक और ओंकारेश्वर की साल भर पूजा होती है. केदारनाथ और मद्महेश्वर की उत्सव डोली ओंकारेश्वर मंदिर में पहुंचने पर यहां भव्य मेला लगता है.

मदमहेश्वर: जहां शिव की नाभि पूजी जाती है

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा बाणासुर की पुत्री ऊषा और भगवान कृष्ण के पोते अनिरुद्ध का विवाह इसी मंदिर में हुआ था. ऊषा के नाम से ही इस स्थान का नाम ऊषामठ पड़ा. वर्तमान में जिसका अपभ्रंश नाम ऊखीमठ है.

किंवदंती के अनुसार राजा मंधाता ने अपना सर्वस्व त्यागकर बारह वर्षों तक एक पैर पर खड़े होकर  इसी जगह भगवान शिव की अराधना की, जिससे ओंकार ध्वनि के रूप में शिवजी ने ऋषि मांधाता को दर्शन दिये.

उत्तराखंड के अधिकतर मंदिर कत्यूरी या नागर शैली में हैं ऊखीमठ मंदिर को बहुत से लोग नागर शैली में निर्मित मानते हैं. ऐसा भी कहा जाता है कि ओंकारेश्वर मंदिर विश्व का प्राचीनतम धारत्तुर परकोटा शैली में बना हुआ एकमात्र मंदिर है. इससे पहले सोमनाथ और काशी विश्वनाथ धारत्तुर परकोटा शैली में बने हुए थे किंतु आक्रमणकारियों ने इन्हें ध्वस्त कर दिया. ख़ैर! यह पुरातत्वविद और इतिहासकारों के सोचने का विषय है किंतु व्यक्तिगत तौर पर मुझे यह मंदिर उत्तराखंड के दूसरे मंदिरों की बनावट की तुलना में कुछ अलहदा तो महसूस ही हुआ. लगा कि कुछ तो ख़ासियत है ओंकारेश्वर मंदिर की बनावट में. मंदिर का क्षेत्रफल  वृहद है. दरअसल यह एक मंदिर ही नहीं समूह है कई देवी-देवताओं की स्थापनाओं का. यहां शिवलिंग, मान्धाता, पार्वती, ऊषा, अनिरुद्ध, चित्रलेखा, वाराही, भैरव, चण्डिका, गणेश, सूर्य, घंटाकर्ण, सत्यानारायण, केदारनाथ के प्रथम रावल भुकुंड, नवदुर्गा आदि की मूर्तियां दर्शनीय हैं. यहीं ऊषा और अनिरुद्ध के विवाह हेतु बनायी गयी वैदिक वेदी है.

हमने मंदिर के ही भीतर गद्दीस्थल और अन्य देवी-देवताओं के दर्शन किये. मंदिर की बाहरी भित्तियों के  छोटे ताखों में खूबसूरत नक्काशीदार मूर्तियां हैं. मंदिर के भीतर फोटो लेना मना है. हो भी क्यों न? मंदिरों के भीतर दिव्य मूर्तियां हैं. हमने मंदिर की चारों ओर से फोटो और विडियो लिये. लस्सी पी और अंततः अपने आगे के गंतव्य धारी देवी के लिए निकल पड़े.

देहरादून की रहने वाली सुनीता भट्ट पैन्यूली रचनाकार हैं. उनकी कविताएं, कहानियाँ और यात्रा वृत्तान्त विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं.

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