डी एस बी कॉलेज के वे दिन

देवेंद्र मेवाड़ी

लोकप्रिय विज्ञान की दर्ज़नों किताबें लिख चुके देवेन मेवाड़ी देश के वरिष्ठतम विज्ञान लेखकों में गिने जाते हैं. अनेक राष्ट्रीय पुरुस्कारों से सम्मानित देवेन मेवाड़ी मूलतः उत्तराखण्ड के निवासी हैं और ‘मेरी यादों का पहाड़’ शीर्षक उनकी आत्मकथात्मक रचना हाल के वर्षों में बहुत लोकप्रिय रही है.

मैंने सन 1962 में जब ओखलकांडा इंटर कालेज से इंटर की परीक्षा पास की तो सवाल उठा कि अब आगे मुझे कहां पढ़ाया जाए? मेरे ददा श्री दीवान सिंह मेवाड़ी वहां शिक्षक थे. उन्होंने कहा, “मैं तुम्हें आगे पढ़ाना चाहता हूं. बोलो, कहां पढ़ोगे- नैनीताल या पंतनगर? नैनीताल के बारे में मैं सुनता रहता था. वह मेरे सपनों का शहर था. इसलिए मैंने कहा, “नैनीताल.”

ददा मुझे नैनीताल ले गए. मैं तब कंधों तक लंबे बाल रखता था. हालांकि मैं विज्ञान वर्ग का विद्यार्थी था, लेकिन निराला और सुमित्रानंदन पंत मेरे प्रिय कवि थे. मन में उनकी छवि के कारण ही मैंने भी अपने बाल बढ़ा लिए थे. नैनीताल जाकर सबसे पहले तल्लीताल में नाई की दूकान पर बाल कटवाए. फिर मल्लीताल में कोहली फोटोग्राफर्स के यहां पासपोर्ट फोटो खिंचवाए. अगले दिन ददा मुझे एडमिशन के लिए नैनी झील के उस पार की पहाड़ी पर हरे-भरे देवदार और बांज के वृक्षों के बीच स्थित देब सिंह बिष्ट राजकीय महाविद्यालय ले गए जो बोलचाल में डी.एस.बी. डिग्री कालेज कहलाता था. वहां फार्म जमा किया और मुझे बी.एससी. में एडमिशन मिल गया. कालेज के प्रिंसिपल तब जाने-माने भौतिक विज्ञानी डा. डी. डी. पंत थे.

बी.एससी. में मैंने जूलाजी, बाटनी और कैमिस्ट्री विषय लिए थे. कक्षा में छात्रों की संख्या बहुत थी. सोलह छात्राएं भी हमारी कक्षा में थीं जिनसे बात करने का प्रश्न ही नहीं था क्योंकि तब लड़कियों से बात करने का रिवाज नहीं था. मैं तो गांव से आया था और यों भी बहुत संकाची था. लेकिन, मन ही मन में यह हसरत जरूर रहती थी कि काश कोई छात्रा मुझसे भी बात करती. कक्षा में सभी छात्राएं सबसे आगे की बैंचों पर बैठती थीं.

हमारा वह नैनीताल आज से कुछ अलग था. चारों ओर खूब हरियाली थी और उसी हरियाली के बीच इमारती लकड़ी का बना हमारा आर्ट्स ब्लाक बहुत भव्य लगता था. उसकी पहली मंजिल पर कक्षाओं के कमरे थे और भूतल पर लाइब्रेरी. कक्षाओं से छात्र-छात्राएं नीचे उतरतीं तो लकड़ी की चैड़ी सीढ़ियों पर खट्-खट् की आवाज होती थी. पुस्तकालय में पुस्तकें लेने और लौटाने का सिलसिला चलता रहता था. वाचनालय में भी छात्र-छात्राएं पढ़ते नजर आते थे. उन दिनों किताबें पढ़ने का एक माहौल ही अलग था. आर्ट्स ब्लाक के पीछे ऊपर कैमिस्ट्री लैक्चर हाल था.

आर्ट्स ब्लाक की बगल में कैमिस्ट्री लैब थी. वहीं बाईं ओर स्टाफ रूम भी था. नीचे बाटनी डिपार्टमेंट और उसके सामने दूसरी ओर जूलाजी डिपार्टमेंट. कैमिस्ट्री लैब से ऊपर दाहिनी ओर फिजिक्स डिपार्टमेंट और फीस काउंटर. सबसे ऊपर ए.एन.सिंह हाल, जिसमें हमारे नाटक और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते थे.

कक्षाओं और प्रयोगशालाओं वाले सभी भवन पतले मार्ग से जुड़े हुए थे जिन पर टीन की छत थी. इसलिए बारिश में भी हम यहां-वहां आराम से आ-जा सकते थे. टीन की छत होने के कारण बारिश होने पर वर्षा-बूंदों का अद्भुत और सम्मोहक संगीत सुनाई देता था. सम्मोहक तो घना कोहरा भी होता था जो अचानक आकर हमें छूकर निकल जाता. वह पढ़ाई के दौरान हमारी बाटनी की कक्षा में भी चला आता था और अक्सर आर्ट्स ब्लाक के आंगन में टहलता रहता. कक्षा में कोहरा आने पर नींद-सी आने लगती. के.पी.सिंह सर तो इतने सख्त थे कि पलक झपकते भांप जाते कि कौन उनींदा है क्लास में. उसे कक्षा में खड़ा होने का आदेश मिल जाता. खिड़की से ऊपर छत से ढका रास्ता भी दिखता था. नींद आने लगे तो हम आंख उठा कर उस ओर देख लेते ताकि जाग्रत हो जाएं. एक बार मैंने इसी तरह भारी आंखों से उस ओर देखा ही था कि के.पी.सिंह सर की नजर पड़ गई. मेरी बदकिस्मती से ठीक उसी समय कोई छात्रा सिर झुकाए वहां से जा रही थी. सर ने आदेश दिया-मिस्टर मेवाड़ी खड़े हो जाओ! मैं निर्दोष था, लेकिन क्या करता? खड़ा हो गया.

वे पढ़ाते रहे और मैं खड़ा रहा. कक्षा समाप्त होने पर ही बैठ पाया. वे प्रैक्टिकल की कक्षा के समय लैब के दरवाजे पर खड़े हो जाते. देखते कि होम वर्क पूरा किया है कि नहीं. फिर पूछ कर चैक करते-पैंसिल? रबर? डिसैक्शन बाक्स? एक भी चीज कम होने पर भीतर नहीं आने देते थे. वे हमें आसपास ले जाकर प्रकृति में उगी रिक्सिया, मार्केंशिया आदि ब्रायोफाइट वनस्पतियां भी दिखाते थे. उनके उस अनुशासन ने हमें जीवन में व्यवस्थित होकर जीने और अनुशासित रहने की शिक्षा दी.

उन दिनों छात्र यूनियन के चुनाव तो जरूर होते थे, लेकिन आंदोलन और हड़ताल नहीं होती थी. कालेज हर साल फाइनल परीक्षाओं के बाद नए सत्र में 7 जुलाई को या उस दिन अवकाश होने पर अगले दिन खुल जाता था. साल भर नियमित पढ़ाई होती थी. शिक्षक केवल शिक्षक ही नहीं हमारे लिए अभिभावक भी होते थे. हम उन्हें अपनी कठिनाइयां और परेशानियां बता सकते थे. वे हर संभव मदद और मार्गदर्शन करते थे. और, यह भावना जगाते थे कि तुम जीवन में कुछ करके दिखा सकते हो.
यह उन दिनों की पढ़ाई का माहौल ही था कि हर विद्यार्थी में कुछ करने का जज्बा दिखता था. कई छात्र-छात्राओं में प्रतियोगी परीक्षाओं में भाग लेने का जुनून होता था. वन सेवा के लिए मुझमें भी यह जुनून था. यही कारण था कि हम माल रोड में घूमते हुए भी आपस में जनरल नालेज के सवाल पूछते थे. हर रोज नगरपालिका की लाइबे्ररी में जाकर अखबार पढ़ते. प्रतियोगी परीक्षा देने इलाहाबाद और दिल्ली जाते थे. उस दौर में हमारे कई सहपाठी आइ.पी.एस., आइ.ए.एस., पी.सी.एस. और पी.एफ.एस. जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं में सफल हुए. प्रांतीय वन सेवा की परीक्षा में तो मैं भी वर्ष 1964-65 तथा 1965-66 में दो बार सफल हुआ था. अखबारों में जारी मैरिट सूची में मेरा नाम भी था लेकिन प्रशासनिक और राजनैतिक दांव-पैंचों के चलते प्रशिक्षण के लिए बुलावा कभी नहीं आया. मेरी पहचान भी केवल मेरे पिछड़े हुए दूर-दराज गांव और अपने कालेज के अलावा कहीं नहीं थी. लेकिन, मैंने हार नहीं मानी और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली यानी पूसा इंस्टिट्यूट में आवेदन किया और चुन लिया गया. दो माह बाद ही डी.एस.बी. के वनस्पति विज्ञान विभाग में प्रवक्ता के पद का भी आमंत्रण मिला लेकिन तब तक मैं पूसा इंस्टिट्यूट में नौकरी शुरू कर चुका था.

डी.एस.बी. में बी.एससी. की पढ़ाई के दिनों में मैं और मेरा मित्र नवीन भट्ट राक हाउस और किलार्नी काटेज में साथ रहे. हमने तय किया कि हम टाइम टेबल बना कर नियमित रूप से पढ़ेंगे और पढ़ने के साथ-साथ अन्य गतिविधियों में भी भाग लेंगे. इसलिए हमने वहां तैरना सीखा, वाइ एम सी ए का सदस्य बन कर बैडमिंटन सीखा, स्कैटिंग सीखी और एन.सी.सी लेकर अनुशासन सीखा. हम दोनों छुट्टी के दिन कभी पैदल चाइना पीक निकल जाते, कभी टिफिन टाप और कभी सातताल, भीमताल और नौकुचियाताल. उस हाइकिंग के दौरान मैं वनस्पतियों का अध्ययन करता और नवीन कीट-पतंगों व तितलियों का. ऐसी यात्राओं में हमारा कई. अनजान लोगों से परिचय हो जाता. एक बार नौकुचियाताल से पैदल लौटे तो भवाली में बस में एक विदेशी युवक डिक योल्डर से परिचय हो गया. उसके साथ नैनीताल आए. नैनीताल के मैथोथिस्ट चर्च में उसने हमें अपने साथियों से मिलाया. उस दिन उसके साथी एलन का जन्मदिन था. उसने काफी देर तक हमें गिटार बजा कर सुनाया और केक खिलाया. खाली समय में सीखने के लिए अब हमारे पास बहुत-कुछ था.

मैं खाली समय में कहानियां लिखता था और नवीन अंग्रेजी के उपन्यास पढ़ता था. मुझे जितना ही हिंदी से प्रेम था, नवीन को उतना ही अंग्रेजी से लगाव था. डी एस बी में हिंदी विभाग हर साल कहानी प्रतियोगिता आयोजित करता था. मैंने भी अपनी कहानी भेजी जिसे प्रथम पुरस्कार मिल गया. खोजबीन हुई कि यह लड़का कौन है, तो पता लगा, विज्ञान वर्ग का छात्र है. हिंदी विभाग में तब डा. विश्वंभरनाथ उपाध्याय, डा. पुत्तूलाल शुक्ल और गोविंद शर्मा जी जैसे शिक्षक थे. उन्हें यह देख कर बहुत खुशी हुई कि विज्ञान का विद्यार्थी होकर भी मेरी साहित्य में इतनी रूचि है. मैं उनका स्नेह भाजन बन गया. हिंदी विभाग से पुरस्कार में मिली पुस्तकें ‘गीतांजलि’ (रवींद्रनाथ टैगोर) और ‘दर्द दिया है’ (नीरज) आज भी मेरे पास है.
एक बार बातों-बातों में विचार आया कि क्यों न विभिन्न रुचियों के सहपाठियों का पता लगा कर उन्हें एक मंच पर लाया जाए? हमने देखा, विद्यार्थियों में से किसी को लिखने का शौक है, कोई चित्रकार है, किसी की रुचि संगीत में है, किसी की अभिनय में, किसी की खेलकूद में, तो कोई वाद-विवाद में आगे रहता है. इस विचार ने हमें उत्साह से भर दिया. हमने विभिन्न रुचियों के विद्यार्थियों की खोज शुरु कर दी. ऐसे विद्यार्थी, जो चलती-फिरती खुराफातों के बजाय क्रिएटिव खुराफातें करते हों. साथ ही, अपनी इस नई एसोसिएशन का नाम भी सोचने लगे.

लेकिन, एसोसिएशन क्यों? यह तो घिसी-पिटी चीज हो जाएगी. इसमें नयापन नहीं है. हम कुछ करेंगे तो हट कर करेंगे. मिल-बैठ कर चर्चा कीः बटरोही, मैं, डी एस लायल, वेदश्रवा, सुबोध दुबे, मिताली गांगुली, बसंती बोरा और पुष्पेश पंत. नाम रखा ‘द क्रैंक्स’. अध्यक्ष यानी सुपरक्रैंक बनाए कालेज के प्रिंसिपल और भौतिक विज्ञानी डा. देवीदत्त पंत. साथ में डा. विश्वंभर नाथ उपाध्याय, डा. मोहनलाल, डा. बांबवाल, डा. मायाराम और प्रो. निरंकारस्वरूप श्रीवास्तव. विभिन्न रुचियों के विद्यार्थी जुटते गए. उद्घाटन के लिए आचार्य कृपलानी को बुला लाए.

हमने द क्रैंक्स की ओर से कई गतिविधियां आयोजित कींः एक सफल कला प्रदर्शनी जिसमें सईद, कुसुम स्याल, रघुनंदन सिंह तोलिया, अजित कुंवर, ई एन खान, देवेन मेवाड़ी, मिताली गांगुली, नवीन भट्ट के चित्र और रमेश थपलियाल के व्यंग्य चित्र प्रदर्शित किए गए. आइंस्टाइन के आपेक्षिकतावाद और नार्लीकर-हायल सिद्धांत पर व्याख्यान, कहानी और विकासवाद पर सेमीनार, प्रेम विवाह की सफलता-असफलता पर वाद-विवाद आदि.

द क्रैंक्स ने कालेज में एक रचनात्मक सुगबुगाहट पैदा की और विभिन्न रुचियों के विद्यार्थी पढ़ाई के साथ-साथ अपनी-अपनी रुचि के क्षेत्र में काम करने के लिए प्रेरित हुए. बटरोही, मैं, मिलाती गांगुली, महेश जोशी, ओम प्रकाश कहानियां लिखने लगे. वीरेन्द्र डंगवाल, एम. सईद, मिताली, श्याम टंडन कविताएं रच रहे थे. एम. सईद, आर.एस.तोलिया व कुछ अन्य साथी चित्रकला में प्रयोग कर रहे थे. मेरा देवेंद्र से देवेन होना दोस्त वीरेन्द्र डंगवाल को जम गया और वह भी जल्दी ही वीरेन डंगवाल हो गया.
डी.एस.बी. में वे दिन हमारे निर्माण के दिन थे. वहां मिली शिक्षा और गुरुजनों के मार्गदर्शन ने हमें भविष्य की राह दिखाई. बहुत याद आते हैं वे दिन.

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