हर साल फिजिक्स का नोबेल पुरस्कार घोषित होता है. हर साल कलेजे पर लम्बे समय से चस्पां पुराना नासूर दुखने लगता है. विज्ञान और ख़ास तौर पर फिजिक्स को लेकर मेरे मन में बचपन से ही बड़ा उत्साह था लेकिन आयु के अलग-अलग मरहलों पर मिले ज्यादातर साइंसाध्यापकों ने मेरी नैसर्गिक वैज्ञानिक प्रतिभा पर खूब मठ्ठा फेरा. (Nuances of Urban Physics Classes)
छठी क्लास में हमारे साइंस मास्साब ने हमें एक पखवाड़े तक ज़िंदा कछुवे से खेलना सिखाया, लकड़ी के बुरादे से भरे बीकरों में चने उगाना सिखाया, लेंस से घास जलाने और कच्चे आम पकाने में कारगर बदबूदार कार्बाइड और जर्दे के खाली डिब्बे की मदद से सुट्टन बम बनाने का प्रशिक्षण दिया. उन्हीं के दिए ज्ञान की प्रेरणा से लाल-नीली-हरी स्याही को पहले बिखेरने और फिर उसे ब्लॉटिंग पेपर की मदद से साफ करने या चीनी को पानी में घोल और फिर उस घोले को सुखाकर वापस चीनी बनाने जैसे साइंटिफिक करतब करने के एवज में घर पर बारम्बार सुताई हुई.
बाद की कक्षाओं में सबसे पहले वर्नियर कैलीपर और स्क्रू गेज की ड्राइंग बनाने में चार महीने तबाह किये. दक्षिण अमेरिका में पाए जाने वाले एक पक्षी की चोंच जैसी आकृति वाले स्क्रू गेज का चित्र मुझसे कभी नहीं बना. उसका ऐसा आतंक था कि जब मैंने उस बित्ते भर के औजार को पहली बार असल में देखा तो बहुत दुःख हुआ. (Nuances of Urban Physics Classes)
‘पदार्थ की भौतिक अवस्थाएं’ विषय पर किया गया पहला घरेलू प्रयोग कामयाब तो हुआ लेकिन मार तब भी पड़ी. हुआ यों कि हमारे एक रिश्ते के चचा अपने सायंकालीन कार्यक्रम के लिए बाजार से एक किलो बर्फ लेकर आये. बीड़ी फूंकने जैसे किसी महत्वपूर्ण काम पर उनका घर से बाहर निकलना और उनकी बर्फ पर मेरी निगाह पड़ना एक साथ हुआ. बर्फ को लेकर मैं छत पर चला गया और डूबने तैयार सूरज की अंतिम किरणों के सामने उसे स्थापित कर उसे पहले द्रव और फिर वाष्प में बदलते देखता रहा – पीठ पर पड़ी चचा की धौल द्वारा धराशाई कर दिए जाने से पहले तक.
देखते देखते बात मिलीमीटर, सेंटीमीटर से अणु-परमाणु पर आ पहुंची. कॉलेज के हमारे एक फिजिक्स प्रोफ़ेसर थे जिनके बारे में पिछले तीस-चालीस सालों से शहर भर में यह बदनामी फैलाई जाती रही थी कि वे नैनीताल क्लब में बिला नागा हर रात दो-ढाई बजे तक दारू और जुए में मुब्तिला रहते हुए अपने शोधार्थियों को रिसर्च कराते थे.
उनके दो-एक शोधार्थी हमारे हॉस्टल के सीनियर थे. ये भविष्य के भौतिकविज्ञानी दोपहर तीन बजे से पहले नहीं उठते थे और उठते ही दारू के ठेके का रुख करते थे.
प्रोफेसर साहब हमें मोशन पढ़ाते थे. हैंगओवर उनकी आँखों से बाढ़ की मोशन में बह रहा होता और वे बड़े से ब्लैकबोर्ड पर कुछ न्यूमेरिकल हल करते जाते. हमारा काम होता था उनके लिखे को कॉपी करना. कई बार कैलकुलेशन बहुत लम्बी हो जाती. ब्लैक बोर्ड भर जाता. उसे मेटने से पहले वे पूछते – “उटाल्लिया ठब ने?”.
उनके मुंह में आधा क्विंटल गुटखा ठुंसा रहता और उनके घोड़े जैसे होंठों के दोनों कोनों से उपजी रुधिर-धाराओं की लकीरें किसी मरियल पहाड़ी गाड़ की सूरत में बहती हुई उनकी कमीज के कॉलर तक पहुंचा चाहती थीं. हमारे उत्तर की प्रतीक्षा किये बिना वे जेब से गुटखे की दो पुड़िया निकालते, पहले से ही फुल कैपेसिटी भरे मुंह में उन्हें उड़ेलते और डस्टर से ब्लैकबोर्ड साफ़ करने लगते.
अमूमन एक पीरियड में एक न्यूमेरिकल सॉल्व होता. एक बार उन्होंने पॉइंट ए से पॉइंट बी की दूरी सेंटीग्राम में निकाल दी. जब क्लास के सबसे होशियार छात्र ने इस खामी की तरफ उनका ध्यान दिलाया तो वे हल्की सी हंसी हँसते हुए बोले – “टैप्टर कौन्टा टल ला ऐ?” उन्हें याद ही नहीं था वे कब मोशन से भटकते हुए मोलेक्युलर वॉल्यूम और मास पर आ पहुंचे थे. इन महान विज्ञानवेत्ता गुरु की प्रेरणा से हमने काफी छोटी आयु में दारू पीना सीख लिया और पाया कि उसके अतिरेक के प्रभाव में दोपहर बारह बजे तक सोते रहना उनकी क्लास में जाने से बड़े पुण्य का काम है. (Nuances of Urban Physics Classes)
एटॉमिक फिजिक्स पढ़ाने वाले प्रोफ़ेसर साहब दार्शनिक तबीयत के दाढ़ीदार, ज्ञानी और अपने विषय से मोहब्बत करने वाले आदमी थे. सुना था वे बहुत अच्छा पढ़ाते थे लेकिन तब तक मैं दूसरे सैक्शन में पढ़ने वाली पल्लवी नाम्नी एक बला बाला की एकतरफा मोहब्बत में धंस चुका था और अपने खुद के छांटे हुए विषय अर्थात फिजिक्स को छोड़कर बाटनी की क्लास में छिप कर बैठा करता था. जाहिर है न एटॉमिक फिजिक्स कभी समझ में आई न पल्लवी.
इसी कॉलेज में एक आदिमानवकाल की प्रयोगशाला थी. हमने वहां से खूब सारे बीकर चोरी किये. ये बीकर दारू को सही मात्रा में नापने और गिलास के रूप में काम आने का टू-इन-वन उद्देश्य पूरा करते थे. फिर एक दिन इसी प्रयोगशाला में बीएससी का फाइनल वाइवा हुआ. परीक्षा लेने कानपुर से कोई घाघ बुढ्ढा प्रोफेसर आया था.
मुझे और मेरे पार्टनर को जो प्रयोग मिला उसमें दो अलग अलग बर्तनों में पानी और घासलेट को गर्म कर उनका बॉइलिंग पॉइंट निकाल कर उन्हें उलझे हुए तारों के एक जाल की मदद से जोड़ कर कुछ खुराफात की जानी होती थी. इसके पश्चात अंत में हम लॉग टेबल की मदद से एक कांस्टेंट या कोएफीशियेंट निकालते थे जो दस की कुछ घात में होता था. घासलेट और पानी के छोटे बर्तनों को इकठ्ठा जिस आयरन वेसल अर्थात लोहे के पात्र में रखा जाना होता था वह विश्वविद्यालय की तरफ से उपलब्ध कराई गयी जंग लगी लोहे की एक खुट्टल कढ़ाई थी जिसके पेंदे में दो छेद थे.
हम ने प्रयोग पूरा किया और जो कोएफीशियेंट निकाला वह मानक कोएफीशियेंट से कोई दस लाख गुना ज्यादा निकला. हम अपनी रीडिंग्स और कापी लेकर घाघ प्रोफेसर के पास पहुंचे तो प्रयोग का रिजल्ट देख कर उसने हमारी कापियां हवा में उड़ा दीं.
मेरा पार्टनर बाजपुर-गदरपुर जैसी बीहड़ बसासतों से आया छः फुट्टा किसान-जाट था. उसने प्रोफेसर साहब का गिरेबान थाम लिया और घसीटता हुआ उन्हें हमारी टेबल पर ले गया. उन्हें हड़काता हुआ वह दहाड़ रहा था –
“जे फुद्दू कडाई से त्तो रामजी बी कोफसेंट नी निकाल सक्ते माश्टर!”
समझा बुझा कर उसे प्रयोगशाला से बाहर किया गया. उसके पीछे पीछे पूंछ दबाये मैं भी बाहर आ गया. मुझे पक्का यकीन था कि इस हरकत के बाद हमें प्रैक्टिकल में फेल कर दिया जाएगा और घर वालों के सामने जलील होना पड़ेगा. यह और बात है कि हम दोनों को तीस में से अट्ठाईस-अट्ठाईस नंबर मिले थे. फिजिक्स के किसी भी और इम्तहान में उतने नंबर कभी नहीं आये थे. यही मेरा फिजिक्स का आख़िरी परचा भी था.
कोई तीन दशकों से एक स्क्रू गेज और वर्नियर कैलीपर खरीदने की बाबत विचार करता रहा हूँ. अभी भौत टैम है. सोचता हूँ इस दीवाली पर खरीद ही डालूं.
-अशोक पांडे
टीचर्स डे विशेष : लपूझन्ने की साइंस क्लास
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