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मेरा और खड़कुवा का बचपन

खड़कुवा और मेरी मांओं ने हमें ऐसे ही मिट्टी लिपे फर्शों पर जन्म दिया था और हमें गाँव किनारे के उसी पोखर पर नहलाया था जहाँ आज भी औरतें अपने बच्चों को नहलाती हैं. फर्क यह आ गया है कि अब वहाँ प्राकृतिक जलस्रोतों से बना पोखर नहीं, सरकारी नल लग गए हैं जिसमें पानी कभी-कभी ही रहता है. (Nainital Memoir by Batrohi)

नैनीताल की मिसेज बनर्जी

पचास साल पुरानी बातों को याद करना आज बहुत मुश्किल है मगर शायद तब यह पोखर इतना गंदा और बदबूदार नहीं था जितना कि सरकारी नलों में पानी न होने के बावजूद आज दिखायी देता है. लगभग दो मीटर डायमीटर के पोखर के बीचों-बीच का पानी उन दिनों एकदम पारदर्शी हुआ करता था जिसके किनारों पर घुटनों तक के दलदल के बीच मोटी-मोटी जोंकें और कभी आस-पास की दीवारों पर से सरककर आए हुए साँप घूमते रहते थे. गाँव के मवेशी भी इसी पोखर में पानी पीते और रह-रहकर फुँफकार भरते हुए, अपनी ऐंठन-भरी टेढ़ी पूँछ उठाये, इधर-से-उधर दौड़ते रहते. … लोग समझ जाते कि उनकी नाक में जोंक घुस गयी है और जब मवेशी बहुत तड़पने लगता तो लोग अछूत-गाँव के भंगिरुवा को बुला लाते जो लकड़ी के एक स्वनिर्मित चिमटे से चुटकी भर में नाक के अन्दर से जोंक को खींच निकालता.

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हम लोगों के लिए भंगिरुवा दुनिया का सबसे बुद्धिमान और बिंदास आदमी होता था, जिसके बराबर का दिमाग दुनिया भर में किसी के पास नहीं था.

पचास-पचपन साल पहले जिस घसपड़ गाँव में मेरा और खड़क सिंह रैक्वाल का जन्म हुआ था, उसकी भौगोलिक स्थिति को आज हू-ब-हू बता पाना असम्भव है क्योंकि तब से लेकर आज तक सब कुछ बदल चुका है. इस बीच भारत सरकार की दस पंचवर्षीय योजनाएँ सम्पन्न होकर गुजर चुकी हैं जिनके जरिए समूचे उत्तराखंड के विकास के नाम पर अरबों-खरब रुपया खर्च हो चुका है.

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इसी बीच, दस साल की उम्र में, मैं धसपड़ से नैनीताल भाग आया था हालाँकि आते वक्त कई दिनों तक खड़कुवा के साथ मेरी लम्बी गम्भीर बैठकें हुई थीं… अपने गाँव की समस्याओं और उन्हें ठीक करने के उपायों के बारे में हमने अनेक योजनाएँ बनायी थीं और खड़कुवा से मैंने वायदा किया था शहर जाकर मैं उन्हें जरूर पूरा कर लूंगा. उसने गाँव से तीन मील दूर स्कूल के पासवाली किताबों की दुकान से एक काॅपी चुराकर चुपके से मुझे दी थी और कहा था कि गाँव को ठीक करनेवाले अपने सारे सुझावों को मैं उसमें लिख लूँ जिससे कि उन्हें भूलने का कोई अंदेशा न रहे.

सात-आठ साल की उस कच्ची उम्र में उसने सुझाया था कि जब मैं गाँव लौट आऊंगा तो हम दोनों लोग पश्चिमी पहाड़ी की चोटीवाले सबसे ऊँचे देवदार के पेड़ के नीचे बैठकर उन सारे सुझावों पर पूरे दिन बातें करेंगे और जिस वक्त थका-हारा लाल सूरज पश्चिमी पहाड़ी के क्षितिज पर हमारी पीठ को छूकर धरती के गर्भ में समा रहा होगा, हम लोग नीचे गाँव की ओर उतर आयेंगे.

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नैनीताल में मैंने सातवीं कक्षा में एडमीशन लिया और फिर वहीं के अनेक स्कूलों और काॅलेजों में पढ़ाई करने और 1966 में एम.ए. करने के बाद उसी साल जून के महीेने में रिसर्च करने के लिए इलाहाबाद चला गया. करीब चालीस साल की नौकरी के बीच में मैं तीन साल के लिए भारतीय सांस्कृतिक संबंध परिषद् की ओर से हंगरी की राजधानी बुदापैश्त गया, और वहाँ से कुछ समय के लिए आस्ट्रिया, जर्मनी, फिनलैंड, लंदन और पोलैंड के विश्वविद्यालयों में घूमा.

यह स्वीकार करने में मुझे कोई संकोच नहीं है कि इस बीच मुझे गाँव के सपने आने काफी कम हो गए थे. शहर आकर गाँव का जैसा अवकाश नहीं था, और वहाँ की समस्याओं पर बातचीत करने के लिए सिर्फ खड़कुवा ही नहीं था, सैकड़ों हमउम्र लड़के थे, जो मदद करने की अपेक्षा टाँग-खिचाई में कहीं अधिक रुचि लेते दिखाई देते थे, अपने देश-समाज की नहीं, अपनी निजी कुंठाओं की बातें करते थे.

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फ़ोटो: मृगेश पाण्डे

 

लक्ष्मण सिह बिष्ट ‘बटरोही‘ हिन्दी के जाने-माने उपन्यासकार-कहानीकार हैं. कुमाऊँ विश्वविद्यालय में हिन्दी विभाग के अध्यक्ष रह चुके बटरोही रामगढ़ स्थित महादेवी वर्मा सृजन पीठ के संस्थापक और भूतपूर्व निदेशक हैं. उनकी मुख्य कृतियों में ‘थोकदार किसी की नहीं सुनता’ ‘सड़क का भूगोल, ‘अनाथ मुहल्ले के ठुल दा’ और ‘महर ठाकुरों का गांव’ शामिल हैं. काफल ट्री के लिए नियमित लेखन करेंगे.

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