फोटो- हेम पन्त
[एक ज़रूरी पहल के तौर पर हम अपने पाठकों से काफल ट्री के लिए उनका गद्य लेखन भी आमंत्रित कर रहे हैं. अपने गाँव, शहर, कस्बे या परिवार की किसी अन्तरंग और आवश्यक स्मृति को विषय बना कर आप चार सौ से आठ सौ शब्दों का गद्य लिख कर हमें kafaltree2018@gmail.com पर भेज सकते हैं. ज़रूरी नहीं कि लेख की विषयवस्तु उत्तराखण्ड पर ही केन्द्रित हो. साथ में अपना संक्षिप्त परिचय एवं एक फोटो अवश्य अटैच करें. हमारा सम्पादक मंडल आपके शब्दों को प्रकाशित कर गौरवान्वित होगा. चुनिंदा प्रकाशित रचनाकारों को नवम्बर माह में सम्मानित किये जाने की भी हमारी योजना है. रचनाएं भेजने की अंतिम तिथि फिलहाल 15 अक्टूबर 2018 है. – सम्पादक.]
बढ़ते शहर गांवों को निगलते जा रहे हैं. मेरा गांव भड़कटिया भी गांव से शहर बनने की दिशा में तेजी से बढ़ रहा है. भड़कटिया, पिथौरागढ जिला मुख्यालय से केवल 6 किमी की दूरी पर पिथौरागढ-झूलाघाट रोड पर स्थित है. लोकमान्यताओं के अनुसार इस जगह पर बसासत बसने से पहले युद्धस्थल था और युद्ध में भड़ों (योद्धाओं) के कटने का स्थान होने के कारण इस जगह का नाम “भड़कटिया” कहा गया. यह सोरघाटी, पिथौरागढ के लगभग मध्य में स्थित है और तीन ओर से सैन्य छावनी के बीच घिरा है. वर्तमान समय में राजकीय इंटर कॉलेज और कुछ निजी स्कूल संचालित हो रहे हैं. जिला मुख्यालय का केन्द्रीय विद्यालय भी गाँव के समीप ही है. पिथौरागढ-झूलाघाट मुख्य मार्ग पर होने के कारण इस जगह एक छोटी सी बाजार भी बन गई है जो आस-पास बसे गाँवों के निवासियों की जरूरत को पूरा करती है. गाँव में 70-80 परिवार रहते हैं और जनसंख्या लगभग 1000 है, जिनमें से लगभग 95%लोग शिक्षित हैं. वैसे तो गाँव के कई परिवार स्थाई रूप से दिल्ली, मुम्बई हल्द्वानी तथा देश के अन्य शहरों में बस चुके हैं लेकिन अभी भी उनका जुड़ाव गाँव से बना हुआ है. सभी सुख-सुविधाओं की उपलब्धता के कारण गांव में किरायेदारों की संख्या भी बहुत है. इन किराएदारों में बिहार-यूपी से आए मजदूर भी हैं और अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए दूर के गांवों से यहां आकर रहने वाले परिवार भी हैं.
पूरी ‘सोर घाटी’ में भड़कटिया एक सुशिक्षित और आदर्श गाँव माना जाता है. आधुनिकीकरण के इस दौर में भी ग्रामीणों के बीच आपसी भाईचारे और सामाजिक सौहार्द बहुत मजबूती से कायम है. अभी भी गाँव में सहकारिता की भावना इतनी सुदृढ है कि शादी-ब्याह जैसे आयोजनों को सुचारु रूप से निपटाना गाँव के सभी लोग अपनी निजी जिम्मेदारी समझते हैं. गाँव के अधिकांश सामाजिक कार्य आपसी सहमति से ही निपटाये जाते हैं. यहाँ तक कि गाँव के प्रधान चुनने की प्रक्रिया भी पिछले दशक तक निर्विरोध ही निपटा ली जाती थी. हालांकि पंचायतों में आरक्षण लागू होने के बाद इस स्थिति में कुछ बदलाव आया है लेकिन परस्पर रिश्तों में अभी भी ज्यादा कटुता नहीं घुल पायी है. गाँव के निवासियों और प्रवासियों की यही एकजुटता विभिन्न त्यौहारों पर भी दिखाई देती है. गाँव में होली, आंठू-गमारा, चैंतोल जैसे पारम्परिक त्यौहार सामूहिक तौर पर बड़े उल्लास के साथ मनाये जाते हैं.
उत्तराखण्ड के अन्य गाँवों की तरह मेरे गाँव भड़कटिया के युवा भी नौकरी के लिये पलायन का रास्ता ही अपनाते हैं. पिछली पीढियों के कुछ लोग शिक्षा विभाग और सेना में शामिल हुए थे, लेकिन अपना राज्य बनने के इन 18 सालों में शायद ही किसी युवक की सरकारी नौकरी लगी है. जिले का सैन्य भरती कार्यालय जो हमारे गाँव के पास ही था, अब बन्द हो चुका है. किसी जमाने में इस भर्ती कार्यालय में हर सप्ताह में भर्ती होती थी और लगभग हर महीने हमारे इलाके के किसी युवक के भर्ती होने का समाचार मिलता था. इस तरह यह भर्ती केन्द्र क्षेत्र के युवाओं के लिये देशसेवा से जुड़ने और बेहतर भविष्य के लिये एक टिकाऊ नौकरी पाने का एक माध्यम था. लेकिन सैन्य सेवाओं में राज्य का कोटा कम हो जाने के कारण यहाँ से भर्ती कार्यालय समेट लिया गया है और अब साल में सिर्फ एक या दो भर्ती रैलियां आयोजित की जाती हैं.
1962 के चीन युद्ध के पश्चात सरकार ने जब इस सीमान्त इलाके में सेना को स्थापित करने का निर्णय किया गया तो इस गाँव के जागरुक और शिक्षित ग्रामीणों ने राष्ट्रप्रेम की भावना के अनुसार अपनी उपजाऊ जमीन और जंगल सेना को समर्पित कर दिये, जिसका तत्कालीन प्रशासन ने बहुत ही मामूली मुआवजा दिया. पिछले कुछ सालों तक सेना के अधिकार वाली खाली जमीन पर गाँव के लोग पशु चरा लेते थे या घास काट लेते थे लेकिन सीमान्त क्षेत्र होने के कारण अब सेना ने सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ग्रामीणों की इन गतिविधियों पर रोक लगा दी है. अब स्थिति यह है कि ग्रामीणों के पास पशुओं को चराने के लिये चरागाह उपलब्ध नहीं है और घास-लकड़ी भी दूसरे गाँवों से खरीदनी पड़ती है. यही हाल बच्चों के खेलने के मैदानों का भी है. सेना के अधिकार क्षेत्र में पड़ने वाले खेल के मैदानों में अब बच्चों को नहीं जाने दिया जाता है. सैनिकों और उनके परिवारों पर भी स्थानीय बाजार में आने के लिये कुछ प्रतिबन्ध हैं जिसका स्थानीय बाजार के व्यापार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है.
शराब के विरोध में आंदोलित महिलाएं
शराब भी गाँव की एक अन्य गम्भीर समस्या है. सैन्य छावनी की निकटता से यह समस्या और अधिक गम्भीर हो जाती है क्योंकि सेना को आबंटित होने वाली शराब का कुछ हिस्सा आसानी से स्थानीय बाजार में पहुँच जाता है. शराब के कारण आस-पास का पूरा इलाका इस कदर कुख्यात हो चुका है कि ‘ठूलीगाड़’ नामक जगह का नाम परिवर्तित होकर ’रमगाड़’ हो गया है क्योंकि इस जगह पर सेवानिवृत्त सैनिकों की शराब की कैन्टीन है, जहाँ उन्हें शराब का कोटा आबंटित होता है. हालांकि पिछले कुछ सालों में हमारे गाँव के युवाओं ने गाँव के अन्दर शराब का धन्धा करने वाले लोगों के खिलाफ एकजुट होकर मुहिम चलाई और बाजार में शराब की बिक्री रुकवाने में काफी हद तक सफल भी रहे, लेकिन पूरे पहाड़ का कलंक बन चुकी यह समस्या शायद इतनी जल्दी हमारे गांव से भी नही खत्म होने वाली है.
जिला मुख्यालय से निकटता होने के कारण हमारा गाँव में छुट-पुट समस्याओं के बावजूद सभी मूल सुविधाएं उपलब्ध हैं. जिला मुख्यालय पिथौरागढ क्षेत्र शहरीकरण के फलस्वरूप फैलता जा रहा है और अब यह शहरीकरण हमारे गाँव भड़कटिया तक फैल चुका है. यही कारण है कि गाँव में जमीन के दामों में भारी उछाल आया है और पिछले दशक में जिले के दूरस्थ क्षेत्रों के दर्जनों लोगों ने जमीन खरीद कर गाँव के आसपास नये भवन बना लिये हैं. अब स्थिति यह हो गई है कि लोग अपने उपजाऊ खेतों को बेच रहे हैं, कृषि भूमि तेजी से खत्म होती जा रही है और उसकी जगह पर तेजी से भवन निर्माण का काम हो रहा है. इस शहरीकरण के कारण गाँव की जनसंख्या बहुत तेजी से बढ रही है लेकिन संसाधनों पर उस तेजी से काम नहीं हो पा रहा है. अभी तक तो गांव की सामाजिक एकजुटता और आपसी भाईचारा बरकरार है, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि हमारा गाँव शहरीकरण के बीच अपनी पहचान आखिर कब तक बचाकर रख पायेगा?
हेम पंत मूलतः पिथौरागढ़ के रहने वाले हैं. वर्तमान में रुद्रपुर में कार्यरत हैं. हेम पंत उत्तराखंड में सांस्कृतिक चेतना फैलाने का कार्य कर रहे ‘क्रियेटिव उत्तराखंड’ के एक सक्रिय सदस्य हैं . उनसे hempantt@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है.
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Nice article you have cover all most thinks related to your village sorry our village. I appropriates the content and the way you represent it, for few second i though we are sitting in front bipin shop . keep writing :-)
बहुत सुंदर सर
बहुत ही सराहनीय प्रयास है मेरी भी कोशिश रहेगी कि मैं इस कालम के लिए कुछ लिखु।
बहुत ही सुन्दर लेख ददा।
बहुत ही सुन्दर लेख ददा।
आप का विचार बहुत ही प्रसंनिय है आप का धन्यवाद्