लेखक के अग्रज गाँव के विद्यालय में
पिछली क़िस्त पहाड़ और मेरा बचपन – 3
गांव की और भी कई धुंधली यादें हैं. मसलन यह कि मैं ज्यादातर अपनी हमउम्र लड़कियों के साथ खेलता था. दो के नाम मां आज भी लेती है. एक कल्यूरी और दूसरी आशा. दोनों ही मेरे बाज्यू यानी ताऊजी की बेटियां थीं. अलग-अलग ताऊजी की. एक की शादी बहुत गरीब घर में हुई. मां से पूछा तो उसने बताया कि वह इन दिनों चंडाक से ऊपर कहीं झूड़ी-मलाड़ में रहती है. उसका एक बड़ा बाईस साल का बेटा कुछ वर्षों पहले गुजर गया था, पर उसके बाद ईश्वर ने उसे पुन: एक बेटा दिया, जो अब शायद चार-पांच साल का होगा. आशा भी पिथौरागढ़ के बाजार में रहती है. उसका एक बेटा और दो बेटियां हैं. आशा के पिताजी की मुझे अच्छी तरह याद है कि वे बीड़ी बहुत पीते थे और उम्र के अंतिम सालों में बहुत झुककर चलने लगे थे. कल्यूरी और आशा के साथ मैं अक्सर बेर तोड़ने जाता था. वे पहाड़ी झगुले पहने मेरे पीछे ही घूमती रहती थीं. बड़े होने के बाद मैं कल्यूरी से तो कभी नहीं मिल पाया, पर आशा से जरूर मिला. पर वह बहुत ही ज्यादा शर्माती थी. मेरे जोर-जबरदस्ती करने पर उसने कभी हां-हूं में जवाब दिया हो तो दिया हो, अन्यथा वह मेरे सामने आने पर चुप ही रही. असल में मैं जब उससे मिला, तो एक होनहार बालक के रूप में मिला, जो दिल्ली जैसी जगह में रहकर आया था. उसकी नजर में मेरी छवि ‘इलीट वर्ग’ जैसी हो गई थी और चूंकि वह खुद चौथी-पांचवी के बाद नहीं पढ़ी थी, उसका मुझसे बातचीत करने लायक आत्मविश्वास ही नहीं बन सका. मुझे आशा की तो धुंधली-सी शक्ल याद है, पर कल्यूरी के नाम पर स्मृति में कुछ नहीं है.
वहां एक बेचेहरा लड़की है, मेरे साथ उचक-उचक कर बेर तोड़कर अपने झगुले में भरती हुई. बहुत सालों बाद ऐसा ही दृश्य ठुलीगाड़ में रहने के दिनों में दुहराया गया जब मैं अपनी सहपाठी और मकान मालिक की बेटी रेनू के साथ किरमोड़े और हेंसालू तोड़ने जाता था. वह कहानी बाद में. मां बताती है कि मैं कल्यूरी के साथ खेलने को इतना उतावला रहता कि सुबह जिस तरह मुर्गा बांग देता है, मैं उठते साथ ही ऊपर के घर से उसे आवाज देता, जिसे कि पहाड़ी में धदाना कहते हैं. जैसे-जैसे उम्र हो रही है और जीवन में चीजों के महत्व बदल रहे हैं- अब पैसे और रुतबे की जगह शांति और अपनत्व ने ले ली है. मेरा बहुत मन है कि मैं अपने बचपन को समृद्ध करने वाले इन किरदारों से मिलूं. मुझे इसका जरा भी अंदाज या पहाड़ी में कहें तो अंताज नहीं कि मैं आज कल्यूरी की स्मृति में कितना बचा हूं. हूं भी कि नहीं. पर यह जानने का मेरा बहुत मन है. इसलिए हो सकता है कि अगली बार कभी पिथौरागढ़ गया, तो बाजार घूमने की बजाय कल्यूरी से मिलने को चंडाक की ओर निकल जाऊं. वह अपने दरवाजे पर एक शहरी इलीट को देखकर दंग रह जाएगी और जब मैं उसे अपने बारे में बताऊंगा कि मैं वही हूं जिसके साथ वह पांच साल की उम्र में फटा झगूला पहन खेतों से बेर तोड़ने जाती थी और धूल-मिट्टी में खेलती थी, उसके पैरों के नीचे से तो जमीन खिसक ही जाएगी. लेकिन उस दृश्य में कितनी तो मिठास होगी. यह सब लिखते हुए उस मिठास को पाने की दिल में जबरदस्त इच्छा हिलोर मार रही है.
पांच की उम्र में गांव से निकलने से पहले की कुछ और भी धुंधली यादें हैं. एक तो यह याद रहा कि गांव से निकलने के बाद हमारे पूरे परिवार ने एक पुल पार किया था, जिस पर गैप था. इस गैप के करीब पहुंच मेरे पैर ठिठक गए थे और पिताजी ने मुझे अपने कंधे पर बैठा उस गैप को लांघा था. मेरे दिमाग में जाने क्यों यह गैप इतना बड़ा हो गया कि मैं इसे याद करके अक्सर सिहर जाता कि अगर मैं उसमें से गिर जाता, तो सीधे नदी में गिरता. बड़े होने के बाद जब मुझे गांव जाने का पहला मौका मिला, तो मेरी सबसे ज्यादा जिज्ञासा इस गैप को देखने की थी. यह पुल कोई और नहीं रामगंगा पर बना पुल है, जो आज भी बदस्तूर इस्तेमाल होता है. सरयू पार करके जब आप रामेश्वर के मंदिर पहुंचते हैं, तो वहां से रामगंगा को पार करने के लिए इसी पुल का इस्तेमाल करते हैं. पुल पर मुझे दोनों सिरों पर जरा-जरा से गैप दिखे. जरा से बोले तो पांच-पांच इंच के.
मैं हैरान हुआ कि एक पांच इंच का जरा सा गैप मेरे दिमाग में इतना बड़ा कैसे हो गया कि मैं इतने सालों तक उसके बारे में सोचकर ही नदी में गिरने के डर से सिहरता रहा. यही है बचपन के दिमाग की बुनावट. वहां क्या बात किस रूप में दर्ज हो जाती है, उसकी वजहों को हम नहीं जान सकते. इसीलिए बचपन में हमारे साथ कैसी घटनाएं घटती हैं, उनका हमारे मानस पर गहरा प्रभाव पड़ता है. बहरहाल, पुल के इस गैप के अलावा मुझे याद है कि एक बार हमारे घर में बड़ा हड़कंप मचा था.
बाद में मैंने मां से पूछा था कि क्या हुआ था. मां ने बताया कि बाघ ने हमारे एक बछड़े को जंगल में मार दिया था. उन दिनों हमारे घर के ऊपर जा रही पगड़डी के समानांतर पूरे पहाड़ पर घना जंगल पसरा हुआ था. बाद में तो बाघ कम हो गए, लेकिन हमारे बचपन के दिनों में कभी-कभार बाघ अपने कारनामे दिखाकर ग्रामीणों के किस्सों में अपनी जगह सुनिश्चित करते रहते थे. मां ने ही बताया कि उन्हें अपनी सास से पता चला था कि कैसे एक बार बाघ हमारे गोठ में घुस एक ही बार में कुत्तों का भरा-पूरा परिवार खत्म कर गया था. मुझे हैरानी इस बात की है कि मुझे गांव में गुजारे पांच साल के जीवन में अपने बड़े भाई की कोई स्मृति नहीं है सिवाय इसके कि मैं उसके साथ सुबह करीब ही स्थित स्कूल जाया करता था. हमारे हाथों में पाठी और टिन के डिब्बे में चूने का घोल होता था, जिसमें हम अपने लकड़ी के कलम को डुबोकर क ख ग जैसा कुछ लिखते थे. मेरे और बड़े भाई में फर्क यह था कि वह थोड़ी जहीन प्रकृति का था और मैं एक दम गांव का गंवार. उसे मेरी कोई जरूरत नहीं थी क्योंकि वह मुझसे तीन साल बड़ा था और जब आपकी जमा उम्र पांच साल हो, तो तीन साल का फासला बहुत हो जाता है.
वह दुनिया के चलने के बहुत से तौर-तरीकों को समझने लगा था जबकि मैं अभी सीख ही रहा था. मुझे याद है जब हम दिल्ली गए, तो उन दिनों रविवार को वह टीवी में दूरदर्शन पर आने वाली फिल्म देखने अपने दोस्तों के घर जाता था. मैं हमेशा उसके पीछे हो लेता. लेकिन उसे मेरा गवांरपना पसंद न था, इसलिए वह मुझे वापस लौटाने की कोशिश करता. कई बार इस कोशिश में उसे मुझे पत्थर भी मारने पड़ते थे, पर मैं कम बड़ा ढीठ न था, पत्थर खा लेता पर अंतत: फिल्म देखकर ही लौटता था. बाद के सालों में एक बार उसने मेरे साथ एक और बड़ी शरारत की, जिसे याद कर वह आज भी हंसता है. उसने मुझे एक पत्ते को छूने को कहा. मैंने मासूमी में पत्ते को छुआ. मेरी उंगली में चुई चुभ गई जैसे. वह सिन्ने का पत्ता था. यह बाद की बात है. उसके बारे में विस्तार से आगे बताता हूं.
(जारी)
कवि, पत्रकार, सम्पादक और उपन्यासकार सुन्दर चन्द ठाकुर सम्प्रति नवभारत टाइम्स के मुम्बई संस्करण के सम्पादक हैं. उनका एक उपन्यास और दो कविता संग्रह प्रकाशित हैं. मीडिया में जुड़ने से पहले सुन्दर भारतीय सेना में अफसर थे.
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सर ,अच्छी यादें , खड़कू भल्या विद्यालय का फ़ोटो देख मैं आपको जानकारी देना चाहता हूँ कि हमारे मित्र श्री नेत्र सिंह कोरंगा इस विद्यालय में बहुत अच्छा कार्य कर रहे हैं,