मन का गद्य
-शिवप्रसाद जोशी
एक हल्की सी ख़ुशी की आहट थी. लेकिन जल्द ही ये आवाज़ गुम हो गई. फिर देर तक एक बेचैनी बन गई. जैसे उस ख़ुशी को समझने का यत्न करती हुई. क्यों थी वो. क्या थी वो. बेचैनी गाढ़ी होती गई. फिर जैसे एक दिन सहसा कोई तेज़ बौछार पड़ी भीतर कहीं. और चीज़ें अपनी जगह से हिलने लगीं. वे मानो तैरने लगीं. वे एक पारदर्शी पानी में तैर रही थी. ये ख़ुशी का पानी था. न जाने कहां से फूटा.
कैसे उसका वेग बना और वो फै़लता हुआ इधर से उधर जाने लगा. उसमें आवाज़ें भी आ रही थीं. उसमें वो एक जानीपहचानी आवाज़ भी बह रही थी जिसे आहट के रूप में दर्ज किया गया था. ख़ुशी अपने भीतर अपनी आहटें अपनी तड़पें अपनी वेदनाएं अपनी थरथराहटें लेकर चल रहीं थीं. प्रेम को समझ जाने की ख़ुशी बहुत दुर्लभ है. वो बहुत कम समय के लिए भी होती है. प्रेम बहुत क्षण भर के लिए समझ में आता है.
बाक़ी समय वो व्यवहारिकता की ओट में चला जाता है. उसे निभाने का उपक्रम करते रहना होता है. वह कुल जीवन में बहुत थोड़ा सा वक़्त होता है जब वह अपने उद्दाम वॉल्यूम में दिख जाता है. विराट. पूरा का पूरा. प्रेम पलक झपकते होता हो या न होता हो लेकिन पलक की झपक जितनी देर उसका रहना तो होता ही है. जो वास्तव में प्रेम करते हैं वे पलक के झपकने की आवृत्तियों को सहेज कर रख लेते हैं.
जैसे चिड़िया कई कई दिनों तक तिनका तिनका लाती है घोंसला बनाने के लिए. वह न जाने बनते हुए घोंसले पर कितनी बार आती है कितनी बार वहां से जाती है. चिड़िया का घोंसला बनते हुए देखने के लिए भला हम बैठे हुए कैसे रह सकते हैं. प्रेम इसी उड़ान और उसके उन्हीं नामालूम अंतरालों के बीच अटका हुआ रहता है. वह हमारे धैर्य और अधीरता के बीच किसी बिंदु पर डगमगाता रहता है. ख़ुशी बहुत कम देर रहती है. बाक़ी समय वो तकाज़े पर बिताती है. लेकिन जितना देर वो रहती है वही एक बड़ा समय है. एक बड़ा और मुकम्मल और सार्थक समय.
एक पक्का वास्तविक यथार्थ. भरा पूरा. इसी कम देर में सभी अच्छी और सुंदर चीज़ें घटनाएं संभव हो सकती हैं. जैसे प्रेम जैसे मनुष्यता. इस कम समय का फैलाव और इसकी परिधि बहुत व्यापक है. ऐसा मत मानिए कि शताब्दियां ख़ून हिंसा बर्बरता और अन्याय से भरी हुई हैं. वे प्रेम और ख़ुशी और साहस और अनेक अच्छाइयों से भी भरी रहती हैं. हम जिस समय में आचरण करते हैं उस समय में वे बहुत कम समय के लिए प्रकट होती आती हैं कुछ देर वहां भटकती हैं और वापस अपने उस बड़े समय में रहने चली जाती हैं. हम एक पल को जो ठिठक जाते हैं अपनी दुनिया में असल में ये वही है.
इस ठिठकन को हम कहां समझ पाते हैं. भला पलक के उठने गिरने पर हमारा कोई विशेष ध्यान रहता है. इतनी चीज़ें और भी हैं जो नामालूम ढंग से चुपचाप हमारे आसपास घटित होती जाती हैं हमें पता कहां चलता है. प्रेम भी तो ऐसे ही आता है. और जब तक हम उस ठिठकन से निकलते हैं चौंक कर कि ये क्यों था वह छिप जाता है. वह हमारा इम्तहान लेता है. वह परिंदों के घोंसलों में चला जाता है. एक उड़ान के साथ किसी तिनके की नोक पर बैठा हुआ. एक चिड़िया उसे अपने श्रम से वहां ले जाती है. हम उसे वापस ला सकते हैं. लाना चाहिए.
हमें कुछ ऐसा करना चाहिए कि प्रेम हमारे पास भी रहे और सब जगह रहे. ऐसा क्या कर सकते हैं हम. ऐसा हम शायद सबसे पहले तो ये कर सकते हैं कि आंखें बंद कर अपनी शिनाख़्त करें. कुछ इस तरह कि जैसा कहा गया है हम क्या थे क्या हो गए क्या होंगे अभी. हम ज़रा अपना चेहरा धुलें आंखों पर पानी के छींटे डालें और मुंह पौंछे. हम ज़रा रुकें. एक मनुष्योचित व्यवहार करें कि कम बोलें झपटें नहीं सुनें और फिर कहें. हम अपने आसपास जमा गंदगी की सफ़ाई करें. चालाकियां और उचक्कापन और झांसेबाज़ी और पवित्रता की रस्म अदायगी को इस तरह पास न फटकने दें जैसे जाले साफ़ कर देते हैं. फिर आ जाता है फिर साफ़ कर देते हैं.
हमें अपने उस अनिर्वचनीय एक पल को संजो लेने की ख़ातिर कुछ मेहनत तो करनी ही पड़ेगी. अपने वक़्त को कुछ इस तरह छीलते रहना होगा कि उसके भीतर से हम वो दुर्लभ नाज़ुक चीज़ हौले से निकाल लें. उसे कोई ठेस न लगे. दुनिया एक ही तरह की भाषा बोलने लगती है. खेत मल्टीप्लेक्स बनाए जा रहे हैं. किसान को उसके व्यवसाय से वंचित कर देते हैं. बीज अपनी मर्ज़ी से बना रहे हैं खेत में नहीं दुकान में. लोग ख़रीददार बनाए जा रहे हैं. उन्हें अपनी बचत के फंदे में कसा जा रहा है. निवेश की ऐसी चमकीली आंधी उड़ रही है कि कपड़े फटे जा रहे हैं उछाड़ पछाड़ हो रखी है.
हम सबकी हालत ऐसी हो जाने वाली है जैसे किसी एक बहुत विशाल दुकान के नीचे हम सारे के सारे खड़े हुए हैं पर गिरे हुए से खड़े हैं. ठुंसे हुए. और हमारे पसीने छूटे हुए हैं. संपदा वैभव इच्छाओं और वासनाओं और दुष्टताओं से हम तरबतर मध्यमवर्गीय. सब कुछ रोचक और सनसनीखेज़ बन जाता है. पर कुछ मानीखे़ज़ नहीं बनता. एक देश कहता है कि वो कहीं भी हमला करने को स्वतंत्र है. एक देश कहता है कि ख़बरदार उसे छुआ जो वरना महाविनाश आ जाएगा. एक देश अपनी राजनैतिक मक्कारियों से घिरा रहता है. एक देश में लोकतंत्र रहता है पर उसे माना नहीं जाता. एक देश देश होने के लिए लड़ता रहता है लड़ता रहता है और उसके लोग और उसके बच्चे मरते रहते हैं. एक देश कूटनीति के एक अटूट बोझ के नीचे दब जाता है.
एक देश क्रिकेट खेलता है और रात दिन यही करता है. एक देश के भीतर कई देश और कई स्वायत्तताएं आ जाती हैं क्योंकि एक देश कभी एक देश की तरह व्यवहार नहीं करता. देशों में निरंकुशताओं का बोलबाला है. वे देश हैं या बर्बरताएं. हम जिस देश के वासी हैं- कहते हैं पर उसमें गंगा के साथ साथ नाइंसाफ़ी लूट और ख़ून क्यों बहता है. एक आदि विद्रोही लड़ते लड़ते मारा जाता है एक लुटेरा लूट के उपक्रम के अयोग्य घोषित हो जाने के बाद यानी जब वो भूतपूर्व लुटेरा हो जाता है तो मार दिया जाता है. विद्रोह को आतंक कहते हैं. प्रतिरोध को बग़ावत. न्याय को वे क्या कहते हैं. वे संघर्ष को क्या कहते हैं. और नागरिकों को क्या.
हम जिस ख़ुशी की बात कर रहे हैं जिस प्रेम की बात कर रहे हैं जिस साहस जिस संघर्ष जिस आदमियत की बात कर रहे हैं वे हमारे पास यूं ही तो नहीं आएंगी. वे उस समय से निकालकर हमें अपने आसपास फैला देने होंगे जो समय इसी बना दिए गए समय के भीतर है. बल्कि किनारे किनारे चलता रहता है. बीतता रहता है. आता रहता है. पर हम ऐसा न करें कि ये कहें कि पहले ज़रा हम अपने रोज़मर्रा के योग ध्यान दर्शन खानेपीने से फ़ारिग हो लें, फिर सोचेंगें.
शिवप्रसाद जोशी वरिष्ठ पत्रकार हैं और जाने-माने अन्तराष्ट्रीय मीडिया संस्थानों बी.बी.सी और जर्मन रेडियो में लम्बे समय तक कार्य कर चुके हैं. वर्तमान में शिवप्रसाद देहरादून और जयपुर में रहते हैं. संपर्क: joshishiv9@gmail.com
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