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तो जाना ही पड़ा लखनऊ से

कहो देबी, कथा कहो – 38

पिछली कड़ी- कहो देबी, कथा कहो – 37

शहर लखनऊ में जब हम कायदे से रस-बस गए, शहर ने हमें अपना लिया और हमने लखनऊ से बाहर पूरे अंचल में अपने बैंक के लिए जनसंपर्क और प्रचार की बिसात बिछा ली तभी मेरी भाग-दौड़ भरी ज़िंदगी में हलचल मच गई. एक दिन बैठे बिठाए दिल्ली हेड ऑफिस से चंडीगढ़ के लिए मेरे तबादले का आर्डर आ गया. तबादला और यों अचानक? मेरे आने के साल भर बाद मेरे चार नए हमपेशा साथी भी बैंकिंग भर्ती बोर्ड से चुन कर बैंक में आ गए थे. वे पटना, जयपुर, मेरठ और लुधियाना में काम कर रहे थे. पता लगा, और कोई तबादला नहीं हुआ है. मैं हैरान हुआ, आला अफसर से पूछा भी लेकिन उन्होंने ‘हम क्या कर सकते हैं, हेड आफिस का आर्डर है,’ के अंदाज में जवाब दे दिया.

दोनों बड़ी बेटियां लालबाग गर्ल्स इंटर कालेज में पढ़ रही थीं तो छोटी बेटी और बेटा स्थानीय ब्लू बैल्स स्कूल में. पूरे परिवार को देखने, संभालने वाले केवल हम दो- मैं और मेरी पत्नी. कमाने वाला सदस्य सिर्फ मैं. कहां छोड़ कर जाऊंगा पूरा परिवार? दिन का चैन, रातों की नींद हराम होनी ही थी, हुई. तनाव अलग से. दिन भर काम और रातें आंखों में काटने लगा. पत्नी समझाती- ‘अरे, फिक्र मत करो. संभाल लेंगे. हमने किसी का बुरा नहीं किया है, किसी का दिल नहीं दुखाया है, ऊपर वाला हमारी मदद करेगा.’

उसकी बात सुन कर, अक्सर विचारों में खोया रहने वाला वह कुर्सी-बुनकर याद आ जाता जिसने अपने साथियों के साथ खुली छत पर हमारी कुर्सियां बुनी थीं. कुर्सी बुनते-बुनते अक्सर वह किदवई साहब की कोठी की उस ऊंची छत पर खड़ा हो जाता और आसमान की ओर हाथ फैला कर बोलता, “या खुदा, तू यहां से कितना करीब है!” और फिर काम में जुट जाता.

हालांकि, मैं यह भी बखूबी जानता था कि तबादले वाली नौकरी है तो तबादला हो ही सकता है. लेकिन, यह भी सुना था कि तबादला बच्चों की परीक्षाएं हो जाने के बाद होता है ताकि नई जगह जाकर बच्चों का एडमिशन कराया जा सके. इतनी मानवीयता होती ही है. लेकिन, मेरे बच्चों की तो पढ़ाई चल रही थी. फिर बेटाइम मेरा ट्रांसफर क्यों?

कुछ समझ में नहीं आया तो मैं वरिष्ठ लेखक गोपाल उपाध्याय जी के पास गया. उनसे चर्चा की. संयोग से वे उस समय के केन्द्रीय वित्तमंत्री श्री नारायणदत्त तिवारी को जानते थे. वे बोले, “बच्चों की पढ़ाई के बीच में इस तरह तबादला तो गलत है. देखो, मैं बात समझाने की कोशिश करता हूं.”

उन्होंने किससे, कब, कहां बात की होगी, मुझे पता नहीं. दो-एक दिन बाद फिर मिला तो उन्होंने कहा, इंतजार करो. मैं इंतजार करता रहा. लेकिन, कई दिनों तक कुछ पता नहीं लगा. मैं हर समय सोचता रहता कि आखिर मुझे किस अपराध की सजा दी जा रही है? इसी तनाव के कारण मेरी टांगों में तेज दर्द उठने लगा. लगता था, जैसे साइटिका का दर्द हो. महानगर के राजकीय स्वास्थ्य केन्द्र में डॉक्टर रावत से मिला. जांच के बाद उन्होंने दवाइयां लिख दीं, फिक्र न करने और हफ्ता-दस दिन घर पर पूरा आराम करने की सलाह दी. उनकी सलाह मान कर मैंने मेडिकल अवकाश ले लिया. इसे मेरी हिमाकत मान लिया गया. मुझे अपने गांव का मुहावरा याद आया, ‘मेरि बलै, त्यार कथप’ यानी ‘मेरी मुसीबत और तेरे लिए क्या, कहां!’

फिर गोपाल जी के पास गया. उन्होंने कहा, “वित्तमंत्री के एक निजी सचिव से बात की थी. वे कुछ दिनों के लिए मां के साथ तीर्थ यात्रा पर हैं. लौटेंगे तो पता लगेगा कि क्या कुछ हो सकता है. यानी, फिर इंतजार. उनके घर पर बैठा ही था कि लेखक कामतानाथ और कुबेरदत्त उनसे मिलने आ गए. साहित्यिक चर्चा शुरू हो गई. गोपाल जी ने कहा, “चाय पीएंगे?”

उन्होंने कंधे में लटके झोले की ओर इशारा करके कहा, “हमारे पास है इंतजाम.” फिर कुबेरदत्त ने भावुक होकर देर रात का किस्सा सुनाया कि, “जब वे एकांत सड़क पर जा रहे थे तो उन्हें एक श्वान मां दिखाई दी. वह पास आई और उन्हें प्यार से देखा. उसकी आंखों में मां का प्यार भरा हुआ था. उसकी उन आंखों से आंखें नहीं हटती थीं.”

मैं उन्हें सुनता और भीतर-भीतर पिघलता रहा. मां याद आती रहीं जो तब विदा हो गई थीं, जब मैं छठी कक्षा में पढ़ता था. कुछ देर बाद कामतानाथ और कुबेरदत्त चले गए. गोपाल जी ने कहा, “इंतजार ही करना है. कुछ दिन और रुको.”

रुका, मैं कुछ दिन और रूका. और, चारा भी क्या था? वे भी क्या कर सकते थे. कई बार परिस्थितियां भी साथ नहीं देतीं. उन दिनों भी यही हो रहा था. दो-एक बार देर शाम स्टाफ सैक्शन के मैनेजर साथी से मिलने गया. उन्हें बताया कि मेरी सचमुच तबियत खराब है. टांगों में तेज दर्द उठता है. वे बोले, “अब वे सिविल सर्जन से जांच कराने की बात कर रहे हैं.”

मैंने पूछा, “आखिर मेरी गलती क्या है? काम ही करता रहा हूं, फिर मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है? मैं बच्चों को लेकर परेशान हूं. पढ़ाई के बीच में उन्हें कहां छोड़ जाऊं?”

“आपकी बात सही है. आपके साथ जो हो रहा है, वह भी गलत है, लेकिन आई एम सॉरी मिस्टर मेवाड़ी, “आइ कैन नॉट हेल्प यू.” (मुझे दुख है, लेकिन मैं आपकी कोई मदद नहीं कर सकता.) भला वे कर भी क्या सकते थे? वे भी तो व्यवस्था की मशीन का ही एक पुर्ज़ा थे.

निराश मन से घर लौटा. पैरों में दर्द की शिकायत बढ़ती जा रही थी. रातों को सो भी नहीं पा रहा था. छुट्टियां बढ़ा ली थीं लेकिन कोई रास्ता समझ में नहीं आ रहा था. तंग आकर मैंने आखिर तय कर लिया कि दफ्तर ज्वाइन कर लेना चाहिए. जो होगा, देखा जाएगा. और, मैं दफ्तर चला गया. आला अफसर टूर पर बरेली गए हुए थे. दूसरे नंबर के आला अफसर ने व्यंग्य से मुस्करा कर पूछा, “और, कैसी है तबियत?”

मैंने कहा, “पैरों में तेज दर्द रहता है. नींद नहीं आती.

“कोई बात नहीं, ठीक हो जाएगा.” मैं जानता था, फाइल पर वही सिविल सर्जन से जांच कराने का सुझाव दे रहे थे और मुझसे हमदर्दी के साथ बात कर रहे थे. खैर मैंने ड्यूटी ज्वाइन कर ली.

दिन शांति से गुजरा. मैं अपनी मेज पर काम करता रहा. बातचीत के लिए कम लोग पास आए. मुझे न जाने क्यों, बहुत पहले ‘धर्मयुग’ में पढ़ी एक कहानी याद आती रही. कहानी में अफ्रीका के किसी घास के मैदान का जिक्र था जिसमें बहुत सारे जेब्रा घास चर रहे थे. तभी दबे पांव एक शेर आया और पास में खड़े जेब्रा पर झपटा. बाकी जेब्राओं ने चौंक कर उस ओर देखा और फिर चुपचाप घास चरने लगे, जैसे कहीं कुछ हुआ ही न हो. उन्होंने यथास्थिति को स्वीकार कर लिया. शेर ने उनके ही सामने जेब्रा को मार डाला. साथी जेब्रा घास चरते रहे.

पांच बजते न बजते, हलकी हलचल हुई. स्टाफ सैक्शन का मैनेजर साथी दो-तीन बार दूसरे नंबर के आला अफसर की केबिन में गया और आया. ठीक पांच बजा और उसने चपरासी के हाथ मेरे पास पीयोन बुक में चढ़ा कर एक लिफाफा भेजा. मैंने उसे रिसीव करना था, किया. लिफाफा खोल कर पत्र पढ़ा. वह लखनऊ अंचल कार्यालय से मेरा रिलीविंग आर्डर था. उसमें मुझे आगे की ड्यूटी के लिए अंचल कार्यालय, चंडीगढ़ में रिपोर्ट करना था.

मैं अब रिलीव हो चुका था और चुपचाप बैठा था. तभी उम्र में बड़े दो-एक साथी सीनियर मैनेजरों को पता लगा. वे मेरे पास आकर बोले, “दिस इज नो वे. ये लोग ऐसा कैसे कर सकते हैं? हम बात करके देखते हैं,” यह कह कर वे भीतर केबिन में गए और थोड़ी देर बाद वापस आकर उन्होंने कहा, “आप थोड़ा रुकिए, बरेली में आला अफसर से बात करते हैं. ये लोग कह रहे हैं कि उन्होंने आज ही रिलीव करने को कहा है.” उन वरिष्ठ साथियों ने फोन पर आला अफसर से बात की जिन्होंने उनसे कहा कि आज ही रिलीव करना है. वे कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थे. साथियों ने कहा, “इन्होंने दफ्तर में इतने वर्षों से काम किया है. इस तरह अचानक रिलीव करना सम्मानजनक नहीं है. हम इन्हें ढंग से विदाई देना चाहेंगे. आप लौट आएंगे तो इन्हें उसके बाद रिलीव किया जा सकता है.”

लेकिन, वे नहीं माने. अब कुछ नहीं हो सकता था. एक साथी को मेरी विदाई के लिए प्रतीक चिह्न लेने के लिए बाजार भेजा गया. हॉल में जितने साथी तब तक रुके हुए थे, उन्होंने मेरे काम और स्वभाव की तारीफ करते हुए मुझे भावभीनी विदाई दे दी.

अब मैं न यहां का रहा, न वहां का. यहां से रिलीव हो गया और वहां ज्वाइन किया नहीं था. त्रिशंकु हो गया. उस बीच भूले से भी दफ्तर का कोई भी साथी मेरे घर की ओर नहीं आया. डर रहा होगा कि कहीं आला अफसर को पता न लग जाए. मेरा पूरी तरह आइसोलेशन हो गया. बस, मैं था और मेरे बच्चे थे. दिन काटना जितना मुश्किल होता, रात काटना उससे भी कठिन. तिनके का सहारा था तो केवल गोपाल उपाध्याय जी. इसलिए फिर उनके पास गया और बताया कि मुझे दफ्तर से रिलीव कर दिया गया है. यह भी बताया कि अब मैं बहुत परेशान हो गया हूं इसलिए तय कर लिया है कि मैं चंडीगढ़ चला जावूंगा. सुन कर उन्हें भी दुख हुआ. उन्होंने दिल्ली में अपने संपर्क से बात की और उन्हें इस बारे में बताया. संपर्क ने राय दी कि केस शुरू करके इस तरह अब पीछे न हटें. बैंक में बात की गई है. अगर पीछे हटे तो वे बहुत परेशान करेंगे. वे लोग भूलते नहीं हैं. इसलिए अभी कहीं न जाएं. बल्कि, अच्छा यह होगा कि एक बार यहां आकर वित्त मंत्री महोदय से मिलें और स्वयं अपनी परेशानी बताएं.

वित्तमंत्री विदेश यात्रा पर गए हुए थे. मैं भारी असमंजस में पड़ गया कि अब क्या करूं? आशा कर रहा था कि शायद समस्या का यहीं से कुछ हल निकल आए लेकिन अब वह आशा भी खत्म हो गई. गोपाल जी भी हैरान थे कि तबादले का मामूली-सा मामला इतना टेढ़ा क्यों हो गया? उन्होंने भी राय दी कि दिल्ली जाकर वित्त मंत्री से मिल लो.

वित्त मंत्री से? उनसे मेरा क्या परिचय? कभी मिला भी नहीं था इसलिए मन में उधेड़-बुन चलती रही कि दिल्ली जाकर उनसे मिलूं या नहीं. इसी उलझन में एक दिन मोटर साइकिल से आ रहा था कि दूसरी ओर से शाल ओढ़े राकेश आते हुए दिखाई दिए. वे कर्मचारी यूनियन के महामंत्री लेकिन मेरे लिए एक संवेदनशील साहित्यकार थे. वे इप्टा से जुड़े हुए थे और उन दिनों ‘रामलीला’ नाटक लिख रहे थे. उन्होंने मुझे देखते ही पूछा, “कहां, सुबह-सुबह कहां जा रहे हैं? काफी परेशान दिखाई दे रहे हैं?”

“यूं ही भटक रहा हूं राकेश जी. तबादले की परेशानी में उलझा हुआ हूं. ऐसी कोई पहचान भी नहीं है कि कोई मेरा यह मामला सुलझा दे.”

वे बोले, “आपको पहचान क्या चाहिए? क्या आपकी अपनी पहचान कम है? आपके साथ भी वही हनुमान जी वाला किस्सा है, याद दिलाने के बाद ही अपनी सामर्थ्य का अहसास होगा. आप खुद इस समस्या को हल करने की कोशिश कीजिए.”

मुझे लगा, एक ही रास्ता है- मुझे दिल्ली जाकर वित्त मंत्री से मिलना चाहिए. लेकिन, उनके पास तक पहुंचूंगा कैसे? पता लगा, वे अपना जनता दरबार लगाते हैं जिसमें लोग बारी-बारी से जाकर उनसे मिलते हैं. तो, इस तरह मिलने का निश्चय करके मैंने दिल्ली की राह पकड़ी. वित्त मंत्री की कोठी का पता लगाया. संयोग से वे उसी दिन बार्बेडोस से लौटे थे. वहां जाकर मैं भी अपनी अर्जी के साथ लोगों की कतार में जाकर खड़ा हो गया. मेरे आगे एक लंबे सज्जन खड़े थे. वे पीछे पलटे तो मुझे उनका चेहरा पहचाना हुआ लगा. वे नैनीताल के जाने-माने व्यक्ति चंद्रलाल साह जी थे. मैंने उन्हें नमस्कार किया, बातें हुईं और मेरी समस्या को सुन कर वे दुखी हुए. उन्होंने मुझे अपने आगे खड़ा किया और कहने लगे, “आपकी बात मंत्री जी से पहले होनी चाहिए. मैं भी उनसे बात करूंगा.” मेरे पीछे एक महिला खड़ी थीं. उन्होंने भी सहानुभूति दिखाई और कहा कि वे भी मेरे बारे में बात करेंगी.

कतार में लोग आगे बढ़ते रहे. वित्त मंत्री अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गए और लोगों की बात सुनने लगे. इसी बीच अचानक तराई के छह-सात लोगों के साथ एक नेत्री का आगमन हुआ और मंत्री जी ने अपने सहायकों से उन्हें बगल के कमरे में बैठाने को कहा. फिर वे उठे और ‘अभी आता हूं’ कह कर बगल के कमरे में चले गए. वे दस-पंद्रह मिनट बाद वापस आए और फिर लोगों की बात सुनने लगे. तभी मेरा नंबर आ गया. मैंने भी अपनी परेशानी उन्हें बताई और अर्जी उन्हें दी. उन्होंने मेरी ओर देख कर पूछा, “क्या प्रमोशन हुआ है?”

मैंने कहा, “प्रमोशन तो एक साल पहले हुआ था. इस समय यूपी बोर्ड से बच्चों की पढ़ाई चल रही है और किसी दूसरे राज्य में बच्चों को एडमिशन मिलना मुश्किल हो जाएगा.”

वे अचानक खड़े उठे, अर्जी मेरे हाथ में दी और भाषण के सधे अंदाज में बोले, “आज हमारे नौजवानों को हिम्मत से काम लेना होगा, उन्हें पंजाब जाकर सेवा करके उदाहरण प्रस्तुत करना होगा. उन्हें समस्याओं का सामना करना होगा.” यह कहते-कहते उन्होंने मेरे पीछे खड़े चंद्रलाल साह जी से बातचीत शुरू कर दी. साह जी ने मेरे बारे में भी उनसे कुछ कहा. इसके साथ ही मैं हाथ में अर्जी लिए लोगों की भीड़ में असहाय खड़ा हो गया. बाहर की ओर निकलने को ही था कि एक सज्जन पास आए और उन्होंने मुझसे अर्जी मांगी. बोले, “फिक्र मत कीजिए, देखते हैं क्या हो सकता है.” पता लगा वे भी मंत्री जी के स्टाफ में हैं. मैंने कातरता से उनकी ओर देखा और हाथ जोड़ कर नमस्कार करके बाहर आ गया. रात की ट्रेन से लखनऊ लौट आया. लौट कर पता लगा, साहित्यकार गोपाल उपाध्याय जी का संपर्क सूत्र भी वही थे. बहरहाल, निराशा के उन क्षणों में मैंने अंतिम रूप से तय कर लिया कि चंडीगढ़ चला जाऊंगा. अब तो वेतन भी वहीं से मिल सकता था. मैंने चंडीगढ़ जाने के लिए रेल का आरक्षण करा लिया. टिकट जेब में रख कर मन से परेशानी को मिटाने की कोशिश में जुट गया.

रात का खाना खाने के लिए अपनी खुली-चौड़ी छत पर मेज-कुर्सी लगा कर बैठा. पत्नी ने थाली में खाना लगा कर दिया. मैंने खाना शुरू किया. पहला ही ग्रास मुख में रखा था कि अचानक गले में असहनीय दर्द उठा. ग्रास थाली में ही छूट गया. पानी पीने की कोशिश की लेकिन वह भी संभव नहीं हुआ. मैं उस दर्द से दुहरा हो गया. कुछ भी निगलना संभव नहीं था. समझ में नहीं आ रहा था कि अचानक यह क्या हो गया? किसी तरह रात बीती और सुबह पत्नी के साथ निशातगंज में डॉ. एम. डब्लू. खान के दवाखाने में पहुंचा. उन्होंने गले की जांच की. रूई का फाहा भिगा कर बैंगनी दवा से गले को सहलाया. दवाइयां दीं. जब हमने उनको बताया कि दो दिन बाद मुझे ड्यूटी ज्वाइन करने चंडीगढ़ जाना है तो वे बोले, “इस हालत में मैं आपको चंडीगढ़ जाने की सलाह बिल्कुल नहीं दे सकता. आप सप्ताह भर बेड रेस्ट करेंगे. दवा चलती रहेगी. आशा है तब तक आराम मिल जाएगा.”

इस तरह चंडीगढ़ नहीं जा सका और रेल का टिकट बेकार चला गया. एक अजीब उदासी ने बुरी तरह घेर लिया था. टांगों का दर्द बरकरार था जिसके लिए सरकारी डिस्पेंसरी के डॉ. रावत की दी हुई दवाइयां लेता रहा. तभी एक दिन जब मैं पत्नी के साथ दोपहर के समय चंडीगढ़ जाने के लिए अपना जरूरी सामान पैक कर रहा था, दफ्तर से मेरे एक साथी डॉ. जायसवाल आए और हंसकर बोले, “कहां जाने की तैयारी हो रही है? आपको कहीं नहीं जाना है. नंबर दो आला अफसर ने आपको बुलाया है.” मैं थोड़ा चौंका क्योंकि मुझे भी साफ पता नहीं था कि कहां क्या हुआ था. साथी ने मुस्करा कर कहा, “ऐसा कैसे हो सकता है, आपको पता न हो? चलिए चलते हैं. आपको यहीं ज्वाइन करना है.”

रूमी गेट, लखनऊ. फोटो : गूगल से साभार

मैं उनकी मोटरसाइकिल में पीछे बैठ कर आफिस गया और नंबर दो आला अफसर से मिला. उन्होंने बड़े प्यार से बात की और समझाया कि एक अर्जी लिख दें कि “अभी बच्चों की पढ़ाई और पारिवारिक परेशानी के कारण आप बाहर नहीं जा सकते. इसलिए फिलहाल यहीं रहने दिया जाए.” उनकी बात ने मरहम का काम किया और मैंने पत्र लिख कर दे दिया. मुझे क्या पता था कि वह समस्या का केवल अस्थाई हल था क्योंकि उसके बाद मुझे फिलहाल तीन महीने लखनऊ में ही रहने की अनुमति दे दी गई. तीन महीने बाद फिर मामला शुरू हो गया और मैंने फिर लिख कर दिया. यानी, समस्या खत्म नहीं हुई थी. उसी बीच काशीपुर का विशाल ऋण मेला लगा. नंबर वन आला अधिकारी ने मेरा काम देखा, प्रशंसा-पत्र दिया और अपने साथ लखीमपुर-खीरी में एक कार्यक्रम का संचालन के लिए ले जाते समय कहा, “मारवाड़ी, मुझे आपसे कोई नाराजगी नहीं है. आप लखनऊ में रहना चाहते हैं तो यह बात हेड आफिस को बता सकते हैं. अपना तबादला रुकवा सकते हैं.”

मैंने कहा, “सर, आप कहेंगे तो रुक ही जाएगा.”

वे बोले, “मैं स्वयं नहीं कह सकता.”

मैंने कहा, “ठीक है सर. मैं आपकी अनुमति लेकर दिल्ली जाऊंगा और पता करूंगा कि मेरा तबादला क्यों हो रहा है.”

लौट कर मैंने आला अफसर से कह कर तीन दिन की छुट्टी ली और दिल्ली को रवाना हो गया. दफ्तर में खबर फैली कि मेवाड़ी जी फिर छुट्टी पर चले गए हैं. इस बीच बैंक में मेरे आने में साल भर बाद आए मेरे हमपेशा चारों साथियों को भी मेरे तबादले की खबर लग चुकी थी. उसी बीच मुझे मेरठ से मेरे हमपेशा साथी का पत्र मिला जिसमें उसने लिखा था, “आपका यह अनुमान बिल्कुल गलत है कि चंडीगढ़ के तबादले का आर्डर अब भी बना हुआ है. मैं आपको विश्वास दिलाता हूं कि आज की तारीख में ऐसा कोई आर्डर पेंडिंग नहीं है. इस बात पर आप मेरा विश्वास कर सकते हैं.”

विश्वास किया. वे पिछली बार हेड आफिस की एक मीटिंग में अनुरोध कर रहे थे कि मेरठ में न सुव्यवस्थित प्रेस है, न रेडियो-टेलीविजन. इसलिए बेहतर होगा कि उन्हें चंडीगढ़ भेज दिया जाए. इस पर शायद विचार भी हुआ होगा लेकिन फिर न जाने क्या हुआ?

जीवन में कई बार कई अजीब संयोग सामने आ जाते हैं. ऐसा ही एक संयोग हेड आफिस की लिफ्ट में मेरा इंतजार कर रहा था. दिल्ली पहुंच कर मैं सीधे हेड आफिस गया और जनसंपर्क तथा प्रचार विभाग में जाने के लिए लिफ्ट में चढ़ा. तभी बात करते-करते दो आदमी लिफ्ट के भीतर आए, एक ने मेरे मेरठ के साथी का नाम लेकर दूसरे से कहा, “पता है, उसने अपना ट्रांसफर पब्लिसिटी डिवीजन में करा लिया है? हो सकता है, ज्वाइन भी कर लिया हो.”

“अपनी-अपनी पहचान की बात है,” दूसरे ने कहा. तभी लिफ्ट खुली और मैं पहली मंजिल में उतर गया. सोचता रहा, साथी तो चंडीगढ़ की बात करता था. अब माजरा कुछ समझ में आ रहा था कि तबादले के तीर का रुख मेरी ओर क्यों मुड़़ गया होगा. बहरहाल, मैं विभाग में गया और साथियों से मिला. विभाग की मुखिया मुझसे खास परिचित नहीं थी. सभी साथियों से काफी देर बातें कीं. मैं बिना किसी पूर्व सूचना के विभाग में पहुंचा था. मैंने दुखी होकर पूछा कि मेरा तबादला चंडीगढ़ क्यों किया जा रहा है. वे बोले, “तबादला तो कार्मिक प्रभाग करता है.” साफ-साफ कुछ पता नहीं लगा और मैं विभाग में साथियों से मिल-मिला कर लखनऊ लौट आया.

न जाने क्या हुआ कि दो-चार दिन बाद ही मेरा तबादला दिल्ली हेड आफिस में करने के आदेश आ गए. नंबर दो आला अफसर ने व्यंग्य भरी मुस्कान के साथ कहा, “वाह जनाब, मियां की जूती मियां के सर? अब तो हेड आफिस से आप हमें आदेश दोगे?”

मैं हैरान होकर उनकी ओर देखता रह गया. विश्वास ही नहीं हो रहा था कि मेरा तबादला हेड आफिस के लिए हो गया है. वहां तो मेरा मातृ विभाग था जिसमें मैंने नौकरी ज्वाइन की थी. तबादले की इस खबर से बहुत सुकून मिला और हताश, निराश मन शांत हुआ. दो-चार दिन बाद मुझे भावभीनी विदाई दे दी गई. कुछ साथियों ने बड़े मन से लखनऊ के नामी कार्टंन होटल में एक शाम अलग से विदाई दी. वे बहुत भावुक क्षण थे. शामे-अवध के उन लम्हों में हमने लखनऊ में साथ बिताए उन तमाम वर्षों को याद किया और मैंने साथियों का तहेदिल से शुक्रिया अदा किया.

बच्चों का शैक्षिक सत्र चल रहा था. इसलिए मेरे अनुरोध पर परिवार को साल भर लखनऊ में रखने की अनुमति भी मिल गई. मैं ड्यूटी ज्वाइन करने के लिए दिल्ली चला गया. दिल्ली में नौकरी की नई कहानी शुरू हुई. मैंने रहने के लिए नया घर खोजा और साल भर उसमें एकांतवास किया.

साल भर बाद परिवार को लेने लखनऊ पहुंचा. साथी लोग अब भी मुझे भूले नहीं थे. उनके सहयोग से दिल्ली के लिए एक ट्रक का इंतजाम किया. दिन भर सामान की पैंकिंग करते रहे. उस दिन तेज आंधी-तूफान आ गया था जिसके कारण बिजली गुल हो गई. मई के महीने की तेज गर्मी पड़ रही थी. ट्रक को दिल्ली के लिए अपने सामने रवाना कर देना चाहते थे लेकिन देर शाम तक ट्रक नहीं आ पाया. हमें ट्रेन से जाना था इसलिए समय पर स्टेशन भी पहुंचना जरूरी था. समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करें? जब काफी देर हो गई तो मैं साथी प्रताप बिष्ट को जिम्मेदारी सौंप कर बच्चों के साथ टैंपो में चारबाग रेलवे स्टेशन के लिए रवाना हो गया. ट्रेन चलने ही लगी थी कि अचानक साथी राजीव चानना भाग कर आए और उन्होंने हमें बताया कि ट्रक में सामान चढ़ा कर उसे साथी प्रताप बिष्ट के साथ दिल्ली को भेज दिया गया है. आप बिल्कुल फिक्र न करें. ट्रक समय पर दिल्ली पहुंच जाएगा. सुन कर बहुत राहत मिली और राजीव को धन्यवाद दिया. चलती हुई ट्रेन से मैं काफी देर तक हाथ हिलाता रहा और कहा अलविदा लखनऊ!

“तो जाना ही पड़ा लखनऊ से?”

“हां नौकरी हुई, जाना तो पड़ता ही, लेकिन हेड आफिस चला गया. वहां जिम्मेदारियां और भी ज्यादा थीं. समझ लो, वहां नई जिंदगी शुरू की. बताऊं उस जिंदगी के बारे में?”

“ओं, बताओ ना.”

 

वरिष्ठ लेखक देवेन्द्र मेवाड़ी के संस्मरण और यात्रा वृत्तान्त आप काफल ट्री पर लगातार पढ़ते रहे हैं. पहाड़ पर बिताए अपने बचपन को उन्होंने अपनी चर्चित किताब ‘मेरी यादों का पहाड़’ में बेहतरीन शैली में पिरोया है. ‘मेरी यादों का पहाड़’ से आगे की कथा उन्होंने विशेष रूप से काफल ट्री के पाठकों के लिए लिखना शुरू किया है.

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Girish Lohani

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