समाज

उत्तरांचल के लोकगीतों में नन्दा : बृजेन्द्र लाल शाह का एक महत्वपूर्ण लेख

अल्मोड़ा में ग्रीष्म की पीली उदास धुधलाई सन्ध्या की इस वेला में, मैं एकाकी बैठा कसार देवी के शिखर पर और देख रहा हूं सुदुर हिमाच्छादित नन्दादेवी के शिखर को ! थके मादे सूरज को अस्तमुखी कि रणे कुहासे में डूबे धूमिल छ, सिये शिखरों को सहला सी रही हैं। अतीत की स्मृतियों से उभरते हुए नन्दा शिखर को मैं हेर रहा हूं और धीरे-धीरे खोता जा रहा हूं. अतीत में सुने हुए उन भूले बिसरे गीतों में, जो उत्तरांचल की इष्ट भवानी नन्दा को आधार मानकर गाए गए थे.
(Lokgeeton main Nanda)

अब वह गायक भी नहीं रहे, वह श्रोता भी नहीं रहे और वह उत्साह भी नहीं रहा. धान की रोपाई के लिये तैयार किये हुए गीले लत-पथ सेरों में आज से तीस-बत्तीस वर्ष पहले (उत्तराखण्ड के सांस्कृतिक विकास अधिकारी के रूप में) मैंने सामूहिक कण्ठ से गाया जाने वाला हुड़किया-बोल सुना था.

भारती चन्द, अजुवा बफौला तथा सालवीर-घुगसाल की बीर गाथायें सुनी थी. लेकिन आज जनसंख्या के घनत्व के कारण, परात में खोये के कटे हुये चाकलेटी टुकड़ों की तरह सीमित और संकुचित तलाऊ के उन खेतों की मेढ़ों में एक ट्रांजिस्टर रखा होता है. उन खेतों में, टेरीकाट की साड़ी धूटनों तक समेटी हुई ग्राम्याएं तथा पिण्डलियों तक सलवार समेटी हुई ग्राम्य बालाएं रोपाई करती हुई दिखलाई देती हैं. रोपाई चलती है लेकिन रोपाई के गीत खो गये हैं.

भू-क्षरण और माटी कटान के साथ-साथ कटते और बहते जा रहे हैं अतीत के वह गीत जिनकी एक धूमिल स्मृति सी, ” सुदूर की घाटी में गंजकर खोती हुई तान सी, मेरे अन्तर्मन में छाई हुई है.

वह सब गीत और गाथाएं धुधला गई हैं और आज की इस धूमिल संध्या में अस्तमुखी सूरज की तरह पश्चिमी-क्षितिज में डूबती जा रही हैं और उन्हीं गीत-गाथाओं के साथ-साथ, धुंधलाई हुई नन्दादेवी के चारों ओर, छासिल-कुहासे की तरह लिपटे हुए नन्दा-गीत भी अस्त हो रहे हैं.

अपनी स्मृति की गहराइयों में डुबकी लगाकर, उत्तरांचल में नन्दादेवी के हेतु गाए हुए कुछ. लोक गीतों को मैं गाने-गुनगुनाने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कसार देवी की चोटी पर बैठा हुआ नन्दा के धूमिल शिखर को छलकीली आंखों से निहारता हुआ मैं लोकगीतों को खोजने वाला एक थका हुआ बंजारा.

सुदर दानपूर और मुनस्यारी के क्षेत्र में सामूहिक आराधना के रूप थे गाई जाने वाली चांचरी के कुछ बोल मन में उभरने लगे हैं. अभावग्रस्त जीवन जीने वाले शैलांचल वासियों की आकांक्षा अतृप्ति और अभाव को पूरा करने वाला वह सांकेतिक मासी का फूल कभी उन लोगों को मिल जाए अथवा उसे वह संघर्षरत होकर प्राप्त कर लें तो उस मासी के फूल को वह कहां-कहां अर्पित करेंगे? इसका आभास मिलता है हमें लोक गीत के इन बोलों में :

धैं को टिपी ल्यालो मासी को फूल॥2॥
जो जालो बुग्याल मासी को फूल ॥2॥
धैं वी टिपी ल्यालो मासी को फूल ॥2॥
जो जालो हिवाल मासी को फूल ॥2॥
धैं वी टिपी ल्यालो मासी को फूल ॥2॥
कै देबा चढ़लो मासी को फूल ॥2॥
थाती को थत्याल मासी को फूल ॥2॥
ऊ नन्दॉ हिवाल मासी को फूल ॥2॥
को टै माई नन्दा मासी को फूल
वी देवी चढ़लो मासी को फूल
वर दैणा है जाए मासी को फूल
सबों की तरफ मासी को फूल ॥

जोहार की पारम्परिक ‘चांचरी’ में इष्ट देवी नन्दा के जन्म और रूप का वर्णन उपमा और अलंकारों से सुसज्जित करके किया जाता है :

देवी को जनमण भेंछ
तू देवी किया रूप भैछ।
तू देवी गठ्यूली सरौलै
जाँणी रीठा कसी रे दांणी।
तू देवी फितूरी सरौले
जाँणी धोबी कसी मुंगरी।
तू देवी जाडुणी सरौलै
जाँणी केला कसी रे खामा।
देवी को जनमण भैछ
तू देवी किया रूप भैछ ।
(Lokgeeton main Nanda)

देवी का जन्म हो जाता है, उसके अंग प्रत्यंगों की शोभा का वर्णन करने के उपरान्त उसे स्थापित किया जाता है और उसकी आराधना की जाती है. अन्त में उसे विभिन्न प्रकार की सामग्री (केवल गीतों में) चढ़ाकर अभावग्रस्त शैलवासी वरदान की कामना करने लगते हैं.

त्वै देवी चढौलो जऊंला निसॉण
हिमाल की नन्दा देवी किया वर देली
त्वै देवी चढ़ौंला द्वी जौल्या नॉगरा
हिमाल की नन्दा देवी किया वर देली
त्वं देवी चढौंला द्वी जौंल्या मुगरी
हिमाल की नन्दा देवी किया वर देली
निरपूती कै देली देवी तू पूत को वर
निरधन्या के देली देवी अन्न धन को वर
हिवाल की नन्दा माई सुफल है जाए
वरदैणा है जाए देवी हमारा ऊपर ॥

नन्दादेवी की मात्र स्थापना करके ही पूजन नहीं होता वरन उसकी डोली भी निकाली जाती है. और यह पर्व यदा कदा देखने में आता है गढ़वाल मण्डल में. वहां देवी की छोटी जात (शोभा यात्रा) ओर बड़ी जात निकला करती है. हरे पीले वस्त्रों तथा रंग-विरगे फूलों से सजे हुए नंदा देवी के छोटे बड़े डोले विभिन्न ग्रामों से जात में शामिल होने निकलते हैं साथ में निकलती है देवी की छतरितां.
(Lokgeeton main Nanda)

नंदा के डोले के आगमन पर गांव-गांव में स्वागत गीत गाए जाते हैं, इन्हें अधिकांश शैलांचल की ग्राम्याएं ही गाती हैं. हरे-भरे घने जंगलों और मखमली बुग्यालों के गांवों में जब सजा हुआ डोला पहुँचता है तो वातावरण में स्वागत गीत के यह मधुर बोल छा जाते हैं:

हरिया पातल देवी कै को डोलो आए ।
सेली रे बुग्याल देवी कै को डोलो आए ।
रमकन्या ठमकन्या तेरो डोलो आए ।
लपकन्या झपकन्या तेरो डोलो पाए ।
हरिया पातल देवी तेरो डोलो आए ।
क्या भलो लागदो देवी तेरो डोलो आए ।
क्या भलो लागदो देवी तेरी छात आए ।
हरिया पातल देवी तेरो डोलो आए ।

उसी नन्दादेवी से सुख समृद्धि का वर प्राप्त करने न केवल शैलांचल के राज परिवार जात लेकर जाते थे वरन सूदूर के राजे रजवाड़े भी अनेकों मनौतियां लेकर जात में शामिल होते थे. उन्हीं लोगों में एक बार (सम्भवतः दो तीन शताब्दी पूर्व) कन्नौज के राजा जसदेव भी गए थे और उनका पथ-प्रदर्शन किया था उरगम ग्राम के साहसिक पर्वतारोही ठाकुर धरमसिंह ने.

कन्नौज का राज परिवार, अन्य यात्री और धर्मसिंह सहित उरगम गांव के कई श्रद्धालु लोग सम्भवत: वापस लौटते समय हिम-झंझावात के चपेटे में आ गए और उस दल पर हिमखण्डों का स्खलन हुआ और वह यात्रा-दल रूपकुण्ड की शीतल गहराइयों में सदा-सदा के लिए सो गया.
(Lokgeeton main Nanda)

आज भी रूपकुण्ड में पड़े कंकालों से पास बिखरे हुए सामान के अवशेषों के अध्ययन से हमें कन्नौजी सभ्यता को स्पष्ट छाप दिखाई पड़ती है. उस सामूहिक लोकगीत में, जिसे मैंने आज से तीस वर्ष पूर्व सन 1958 में चमोली जिले के उरगम ग्राम के कतिपय जानकार बुजुर्गों ने गाया था. उस यात्रा-गीत के कुछ बोल आज भी मेरी स्मृति में कुछ इस प्रकार सुरक्षित हैं :

राजा जसोदेव हो… नन्दा जाती जांदो SSS ।
कुटुम्ब परिवार ल्हिके नन्दा जाती जांदो ।
बन्धु रे बान्धव ल्हिके नन्दा जाती जांदो ।
कन्नौज को राजा हो नन्दा जातो जांदो ।
राजा जसीदेव हो नन्दा जातो जांदो ।

यात्रा-गीत और आगे बढ़ता है. धर्मियां (ठा० धर्मसिंह) राजा जसदेव को नन्दा-जात का मार्ग निर्देशक बनकर नन्दादेवी के शिखरों की ओर प्रस्थान करता है. विदित नहीं वह यात्रा अपने गंतव्य स्थान तक पहुंचो भी कि नहीं उर्गम-ग्राम का दुखान्त लोकगीत कहता है कि :

अब पौछि गे रे SSS धर्मिया
नन्दा कोंट मॉजा SSS
अब पोंछि गे रे धर्मियां
नन्दा कुण्ड माँजा SSS
चलण लागी रे धर्मियाँ SS
ह्यूं की रे टंकारे SS
चलण लागी रे धर्मियाँ SS
विष की फुंकारे SSS
(Lokgeeton main Nanda)

और सम्भवत: उसी समय हिमखण्डों ने खिसक कर राजा जसदेव के समस्त दल को अपने में समेट कर रूपकुण्ड में पाट दिया. उस दल के ध्वंसावशेषों को शताब्दियों बाद कुछ खोजकर्ताओं ने बाहर निकालकर हमारे सामाने रखने का कार्य किया.

और उसी तरह. आज मैं भी उत्तरांचल के लोकगीतों के ध्वंशावशेषों को समय की खिसकती हई बर्फीली चट्टानों के मलवे से निकालकर आपके सामने लाने का असफल प्रयास कर रहा हूँ! मुझे यह भी विदित नहीं है कि हमारी पीढ़ी के बाद लोकगीतों के संकलन संरक्षण और प्रसार के लिए कितने शोधकर्ता, लेखनी-जीवी और रंगकर्मी आगे बढ़कर अतीत की धरोहर को सम्हाल सकेगे. यह उनकी आस्था, लगन श्रम तथा कर्तव्य-निष्ठा पर आधारित है. मैं और मोहनदा (मोहन उप्रेती) चाहते हैं कि शैलांचल की लोक संस्कृति में आस्था रखने वाले नई पीढ़ी के लोग, हमारे हाथों से (अब तक किसी भी प्रकार प्रज्वलित रखी हुई) मशाल लेकर आगे बढ़ें और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के महायज्ञ में ईधन स्वरूप समर्पित हो सकें.
(Lokgeeton main Nanda)

बृजेन्द्र लाल शाह

20 सितम्बर 1988 को कौशल किशोर सक्सेना द्वारा नंदा देवी सन्दर्भ पत्रिका अल्मोड़ा से प्रकाशित की गयी. पी.सी. जोशी और डॉ. निर्मल जोशी द्वारा सम्पादित इस पुस्तक के संरक्षक भैरव दत्त पांडे थे. बृजेन्द्र लाल शाह का यह लेख नंदा देवी पत्रिका से साभार लिया गया है.

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