समाज

पानी की मांग कर रहे लोगों पर मुकदमा कमजोर समाज की नियति

बेरीनाग में पानी के लिए प्रदर्शन कर रहीं चालीस महिलाओं समेत 70 लोगों पर मुकदमा दर्ज. धारचूला के आपदा पीड़ितों को अगले हफ्ते से भोजन नहीं मिलेगा. हैरत की बात है ऐसी खबरें अब लोगों को कतई प्रभावित नहीं कर रही हैं. विधानसभा सत्र के दौरान विधायकों की तरफ से पूछे गए 500 से ज्यादा सवालों में भी इनको जगह नहीं मिली. (Lawsuits Against Citizens Uttarakhand)

मेरी समझ से गांव वालों की जगह मुकदमा दर्ज उन अफसर और नेताओं पर होना चाहिए था जो अब तक गांव में पानी की व्यवस्था नहीं कर पाए. भोजन उनका बंद होना चाहिए था जो महीनों बाद भी आपदा पीड़ितों का पुनर्वास नहीं कर पाए. लेकिन लगता है कमजोर समाज की यही नियति है. मैं मानता हूं सरकारें केवल अपने हित साधने के लिए काम करती हैं. इससे ज्यादा न सरकार को जनता से मतलब है और न जनता सरकार से उम्मीद करती है. लेकिन पानी का अधिकार मांग रहे लोगों का इस तरह दमन? आठ महीने से एक हॉल में जानवरों जैसी जिंदगी जी रहे लोगों के खाने पर रोक?

ऐसा फरमान अपने ही लोगों के खिलाफ जिंदगी में पहली बार देख रहा हूं. उत्तराखंड के नागरिकों को जितना मैं जानता हूं उस आधार पर कह सकता हूं वे सरकार से किसी तरह की उम्मीद नहीं करते. हालांकि वोट देना कर्तव्य मानते हैं. बार-बार चेहरा बदलकर आने वाली सत्ताओं के हाथों ठगे जाते हैं लेकिन कोई शिकवा नहीं. महंगाई और टैक्स तक को ये नियति ही मानते हैं. इसके लिए सरकार को दोष नहीं देते.

इसे भी पढ़ें : वो पहाड़ी लड़का अब वापस लौटना चाहता है

कभी-कभार प्रदर्शन करते हैं जब सड़क के अभाव में मरीज अस्पताल पहुंचने से पहले मर जाता है. सड़क पर जाम लगा देते हैं जब महीनों मीलों दूर से पानी लाते-लाते थक जाते हैं. कभी जब बच्चों के भविष्य की चिंता सताती है तो शिक्षकों की मांग कर लेते हैं. इसमें भी इनकी अधिकांश कोशिश रहती है ज्ञापन देकर ही काम हो जाए. हां, आजकल क्या कर रहे हो? ऐसे सवालों से परेशान होकर युवा कभी जरूर तैश में आ जाते हैं. पहले सरकारें ऐसे तैश में आने वाले युवाओं और विरोध कर रहे लोगों पर ध्यान नहीं देती थी. अब सबक सीखाने की प्रवृत्ति विकसित हो गई है. इसके अच्छे परिणाम भी आए हैं. अच्छा माहौल बना है. शांति कायम हुई है.

बीते साल जून में हल्द्वानी में अग्निवीर का विरोध कर रहे लड़कों को जिस तरह घर भेजा गया वह देखने लायक था. अब पता नहीं कहां होंगे लेकिन शांति तो है? अंकिता को न्याय दिलाने की लड़ाई कहां पहुंची पता नहीं लेकिन शांति तो है? जोशीमठ में जो चले सो चले लेकिन शांति तो है? देहरादून में नौकरियों में हो रहे घपले के खिलाफ बोल रहे लड़के का फूटा सिर ठीक हुआ होगा या नहीं? लेकिन शांति तो है.

राजीव पांडे की फेसबुक वाल से, राजीव दैनिक हिन्दुस्तान, कुमाऊं के सम्पादक  हैं.

काफल ट्री के फेसबुक पेज को लाइक करें : Kafal Tree Online

कभी भूखा, कभी प्यासा भाग रहा पहाड़ी युवा पकड़ा गया

Support Kafal Tree

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Sudhir Kumar

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

3 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

3 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

3 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

3 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

4 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

4 weeks ago