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ठेठ गढ़वाल के जीवन से जुड़ी चीज़ों को समझने के लिए एक तरह का रोचक शब्दकोश है ‘काऽरी तु कब्बि ना हाऽरि’

बचपन में नए साल के ग्रीटिंग कार्ड बनाने के दौरान एक युक्ति सीखी थी. रंग में डुबाया हुआ धागा लेकर (रंग के नाम पर अमूमन हमारे पास स्याही ही होती) सादे कागज़ पर हौले से अगड़म-बगड़म आकार में रख देते. धागे का एक सिरा कागज़ के बाहर निकला होता. इस पर एक दूसरे सादे कागज़ को रखते. अब ऊपर से हथेली से दबाते हुए धागा खींच लेते. इस तरह से दोनों पन्नों पर एक ऐसी आकृति उभर जाती जो बहुत अनडिफाइंड होते हुए भी बहुत खूबसूरत होती. रयाल का लेखन मुझे उस कलाकृति की याद दिलाता है. अक्सर बिना किसी निश्चित पारिभाषिक आकार में होने के बाद भी बहुत खूबसूरत. उनके लिखे में अक्सर तारतम्य टूटता है, कहीं किसी घटना के कुछ बिम्ब उभरते हैं फिर किसी दूसरी घटना पर अध्यारोपित हो जाते हैं. कोई व्यक्ति आता है उसका प्रसंग उठता है कि अचानक किसी दूसरी तफ़सील में मुड़ जाता है. कोई संवाद आता है और आपको पिछली कही गई किसी बात के किसी पन्ने पर पटक देता है. आपको बार-बार उस धागे तक लौटना पड़ता है जो आकार बनाने के लिए कागज़ के बाहर निकला हुआ है. मैं हमेशा कहता हूँ रयाल को पढ़ने वालों का पाठकीय दायित्व बार-बार परीक्षित होता रहता है.
(Kaari tu Kabbi Na Haari Review)

गढ़वाली भाषा (भाषा की नरम पीठ पर चढ़े हुए लोग उसे बोली कहेंगे) के शीर्षक वाली इस किताब में मुझे भोजपुरी-मागधी-कचराही और ख़ालिस पूरवोत्तर कस्बाई खड़ी बोली बोलते अपने पिता मिलते हैं जगह-जगह, उनका संघर्ष (इसे पिटे हुए शब्द का प्रयोग करने के लिए मुआफ़ी) मिलता है, उनका परिवेश और सादा-खाँटी-कठोर-अनुशासित जीवन मिलता है. इस अतिशय व्यक्तिगत बात को कहने से बचा जा सकता था अगर किताब ‘पिता की जीवनी’ जैसे आवरण में न होती, ‘थी’, ‘था’, ‘थे’ इसके सहज वाक्यांत न होते और संस्मरण की परतें बार-बार परिवार के अंदर न खुलतीं. मेरे पिता से होते हुए ये उनकी पीढ़ी और उसके बाद हमारी जेनेरेशन की कहानी है. भाषा अलग, शहर-कस्बे-गाँव का परिदृश्य अलग, भूगोल अलग, सांस्कृतिक क्रिया-कलाप अलग, फिर भी एक गाढ़ा रिश्ता इस किताब के साथ क्यों जुड़ जाता है? इसलिए कि इसमें उस निम्न-मध्यम वर्ग का जीवन दिखता है जो आज़ादी के बाद हमारे देश में एक बड़े संवर्ग के रूप में आकार लेता दिखता है. खेती किसानी उद्योग धंधों और शुरुआती सेवा क्षेत्रों की थोड़ी स्थिरता इस वर्ग को बहुत से सांस्कृतिक-सामाजिक व्यवहार देती है जो भूगोल की सीमाओं का अतिक्रमण कर देते हैं. जो खुटहन का सच है वही खड़कमाफी का सच है. नब्बे के दशक के बाद भी जो बदलाव सासाराम देखता है वही पीलीभीत. यही वजह है कि ललित के जीवनानुभव कमोबेश अमित के जीवनानुभव से मेल खाते हैं.

मैं न तो किसी विशेष प्रसंग का उल्लेख करूंगा, न ही किसी व्यक्ति या तफ़सील का. आम आदमी के जीवन में व्यक्तियों, घटनाओं का इतना साधारणीकरण हो जाता है कि लगता है कुछ रोचक तो हुआ ही नहीं फिर कहानी कैसी? उसका ज़िक्र कैसा? दरअसल असल कहानी वहीं होती है. बच्चे का जन्म, खेत का बिकना, बहन की शादी, मेड़ बांधना, गाय चराने जाना, स्कूल में झगड़ा, दुकान से उधारी, हारी-बीमारी, दवा-दारू, दाल-रोटी दुनिया की कोई भी कहानी इन्हीं घटनाओं जैसी साधारण घटनाओं के बीच बुनी जाती है. ‘मारे गए गुलफ़ाम’ कहानी से बैलगाड़ी या गाड़ीवान निकाल लें तो? ‘कफ़न’ से अलाव या बच्चे का जनम, या दुकान से खरीदारी निकाल लें तो? या मुकुंद राम रयाल जी के जीवन से स्याही-दवात-मास्टरी निकाल लें तो? जैसे उन कहानियों की सुंदरता इन मामूली सी चीज़ों में महफूज़ हैं उसी तरह से एक आम निम्न मध्यमवर्गीय व्यक्ति के जीवन का सरमाया भी इन्हीं मामूली दिखती चीजों से बनता है तो फिर क्यों न उस जीवन का ज़िक्र हो? क्यों न कही जाए मुकुंद राम रयाल के जीवन की कथा?
(Kaari tu Kabbi Na Haari Review)

ख़ास बात कहन की भंगिमा में होती है. अमूमन ललित हास्य में लिपटा हुआ व्यंग्यात्मकता का दामन थामते हैं. थोड़ी चुटीली भाषा, थोड़ी तिरछी भंगिमा. लेकिन यहाँ संस्मरण भावनात्मक होने की वजह से सीधी खड़ी भाषा में हैं. साफ-सीधी-सपाट. पिता की स्मृति है इसलिए भी और पिता के व्यक्तित्व को उकेरने का लक्ष्य है, शायद इसलिए भी. विधा वही जो कथ्य गवाही दे.

हमारे जैसे लोग जो गढ़वाली भाषा नहीं जानते उनके लिए ठेठ गढ़वाल के जीवन से जुड़ी चीज़ों को समझने के लिए एक तरह का रोचक शब्दकोश है ये किताब. पीढ़ियों के बदलने में कैसे पूरा जीवन करवट ले लेता है उसकी सरल समझाइश है ये किताब. पिता के जूते में पाँव डालने की ख्वाहिश पाले पुत्र के लिए साथ-साथ चलने वाली पिता की एक विनम्र याद है ये किताब.
(Kaari tu Kabbi Na Haari Review)

अमित श्रीवास्तव

किताब यहां से खरीदी जा सकती है:
कारी तू कभी ना हारी 

उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं.  6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी तीन किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता) और पहला दखल (संस्मरण) और गहन है यह अन्धकारा (उपन्यास). 

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