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समकालीनता अब छुटभैयों का अभ्यारण्य है

किस बात के नामवर? लेखन के, समालोचन के, अध्ययन के, अध्यापन के, सम्पादन के, वक्तृत्व के या इन सबसे इतर साहित्य, समाज और भाषा के किसी घालमेल के. किस बात के?

नामवर का नामवर होना इनमें से हर विधा में विवादित होने की हद तक विशेषज्ञ होना है. इनमें और इनके जैसे कई अन्य विषयों में ‘एक-अकेला-इकलौता’ होने की हद तक अलहदा होना है. नामवर होना रामचन्द्र शुक्ल, हजारी प्रसाद द्विवेदी की परंपरा से पृथक और स्वतंत्र परम्परा की खोज में मुब्तिला होना है.

नामवर सिंह मठाधीश हो जाने ( भाषा की मर्यादा में ‘समझे जाने’ शायद सही शब्द-युग्म हो) के लिए अभिशप्त थे. मूलतः समालोचना को अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति के लिए चुनने वाले नामवर सिंह ने कभी क्या यह नहीं महसूस किया होगा कि लेखक उनके चश्मे से अपनी रचनाएं गुज़र जाने का इंतज़ार करते हैं. किसी पुस्तक के बारे में उनके द्वारा लिखी (और कही गई ) टिप्पणी किताब की ‘टी आर पी’ तय करती है. ज़रूर रहा होगा उनको ये भान तभी तो कई दशकों में फैली अपनी रचनात्मक सक्रियता में उन्होंने आलोचक के दायित्वों का न केवल पूरी गम्भीरता से स्वीकारा है बल्कि भरपूर निर्वहन भी किया है.

ये और बात है विवादों ने उनका पीछा कभी नहीं छोड़ा. उम्र के आख़िरी पड़ाव तक भी नहीं. किसी लेखक के प्रमोशन और किसी की सायास उपेक्षा का आरोप उनपर लगता रहा. ये भी कहा गया कि हिंदी साहित्य की मठाधीशी संस्कृति का प्रचलन उन्होंने अगर शुरू नहीं किया तो उसे पालने पोसने में बड़ा किरदार तो अवश्य निभाया है. इसका फैसला ज़ाहिर सी बात है सुधी पाठक ही करते रहे हैं और आगे भी करेंगे क्योंकि नई प्रौद्योगिकी जैसे अन्य कई बदलाव हैं जो प्रकाशक-सम्पादक-आलोचक के गठजोड़ से उपजी मठाधीशी को तोड़ने में काफी हद तक सफल हो रहे हैं. आने वाले समय में इस बात का निर्णय आसान होगा कि नामवर सिंह ने जिन लेखकों को पहचाना उनमें से कितने साहित्य की कसौटी पर खरे उतरे.

अब जब ये बात या इस बात का एक बना बनाया नैरेटिव मौजूद है कि समकालीन राजनीति मार्क्सवाद का मर्सिया पढ़ रही है नामवर की अनुपस्थिति साहित्य ही नहीं समाज को एक अत्यंत आवश्यक विचार की अनुपस्थिति की तरह मिलेगी. उनके विचारों की प्रासंगिकता हर हाल बनी रहेगी. परम्परा के दूसरा होने का मतलब ही यही है कि उसकी उपस्थिति हर विपरीत परिस्थिति में बनी रहेगी.

नामवर सिंह लगातार प्रासंगिक बने रहे. बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से प्रारम्भ करके सागर विश्वविद्यालय, जोधपुर विश्वविद्यालय और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में अध्यापन के दिनों में उन्हें सुनने के लिए हिंदी ही नहीं अन्य भाषाओं के छात्र और शिक्षक भी आया करते थे. नामवर सिंह एक महान वक्ता थे, इस बात से इनकार (उनके ‘विरोधी खेमे’ के लोग भी नहीं करते.) नहीं किया जा सकता. इस लिहाज से नामवर हिंदी की वाचिक परम्परा से सीधे जुड़ते हैं. उनका लेखन कार्य इतना विस्तृत एवं अद्भुद है कि आश्चर्य होता है किसी एक व्यक्ति की रचनात्मकता इतनी विविध और व्यापक हो सकती है. आलोचना की कृतियों में-
आधुनिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ
छायावाद
इतिहास और आलोचना
कहानी : नयी कहानी
कविता के नये प्रतिमान
दूसरी परम्परा की खोज
वाद विवाद संवाद आदि पुस्तकें हैं.

उनके द्वारा सम्पादित पुस्तकों में-
संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो (आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी के साथ)
पुरानी राजस्थानी (मूल लेखक- डाॅ० एल.पी.तेस्सितोरी; अनुवादक – नामवर सिंह)
चिन्तामणि भाग-3
कार्ल मार्क्स : कला और साहित्य चिन्तन (अनुवादक- गोरख पांडेय)
नागार्जुन : प्रतिनिधि कविताएँ
मलयज की डायरी (तीन खण्डों में)
आधुनिक हिन्दी उपन्यास भाग-2
रामचन्द्र शुक्ल रचनावली (सह सम्पादक – आशीष त्रिपाठी) हैं .

इनके अतिरिक्त तमाम व्याख्यान एवं फुटकर लेख जो विभिन्न पुस्तकों, पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं. ये लेखन और वक्तव्य कार्य इतना ज्यादा है कि उनके ऊपर बहुत सी पत्रिकाओं के विशेषांक निकले हैं और उनके कृतित्व पर अनेक शोध कार्य हुए हैं. नामवर जी ने समकालीन रचनात्मकता की महत्वपूर्ण पकड़ रखने वाली पत्रिका ‘आलोचना’ का कई वर्षों तक सम्पादन किया.

इतने विस्तृत कार्यों के लिए उन्हें शलाका सम्मान, साहित्य भूषण सम्मान, शब्दसाधक शिखर सम्मान, महावीरप्रसाद द्विवेदी सम्मान के अतिरिक्त 1971 में ‘कविता के नये प्रतिमान’ पुस्तक के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया जा चुका है.

‘नामवर सिंह जैसे रचनात्मक व्यक्तित्व का जाना इस बात का द्योतक है कि हिन्दी में कोई बड़ा न रहा. समकालीनता अब छुटभैयों का अभयारण्य है’- शिरीष मौर्य. उम्र के नौ दशक व्यतीत कर लेने के बाद भी नामवर सिंह की सक्रिय उपस्थिति एक मजबूत स्तम्भ की तरह रही. उनका जाना हिंदी के समकालीन परिदृश्य में एक बिखराव तो है ही इस बात की आशंका का उठना भी है कि हितों के परस्पर टकराव में निर्णय के लिए अब किस दिशा में देखना होगा.

‘काफल ट्री’ परिवार की तरफ से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि !

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अमित श्रीवास्तव

उत्तराखण्ड के पुलिस महकमे में काम करने वाले वाले अमित श्रीवास्तव फिलहाल हल्द्वानी में पुलिस अधीक्षक के पद पर तैनात हैं. 6 जुलाई 1978 को जौनपुर में जन्मे अमित के गद्य की शैली की रवानगी बेहद आधुनिक और प्रयोगधर्मी है. उनकी दो किताबें प्रकाशित हैं – बाहर मैं … मैं अन्दर (कविता).

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Girish Lohani

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