Featured

सफल यात्रा का आशीर्वाद देता गुरना माता का मंदिर

टनकपुर तवाघाट राजमार्ग पर पिथौरागढ़ मुख्यालय से 13 किमी की दूरी पर स्थित है मां गुरना देवी मंदिर. गुरना गांव में मंदिर होने के कारण इसे गुरना मंदिर कहा गया है जबकि मंदिर का वास्तविक नाम पाषाण देवी मंदिर है.

यह मंदिर पिथौरागढ़ जिले के प्रवेश द्वार पर स्थित है. इस मंदिर के सामने से होकर जाने वाले सभी वाहन अपनी शुभ यात्रा की कामना करते हुए आगे बढ़ते हैं. वर्तमान में गुरना माता पूरे पिथौरागढ़ जिले की आराध्य देवी है. इस मंदिर के दर्शन हर रोज डेढ़ से दो हजार लोग करते हैं.

1950 के वर्ष पिथौरागढ़ जिला सड़क मार्ग से जुड़ा था. घाट से ऊपर की घुमावदार सड़क बनी जिसके कारण पिथौरागढ़ मुख्यालय से घाट के बीच आये दिन दुर्घटनाएं होती रहती.

माना जाता है कि एक रात पाषाण देवी के पुजारी के स्वप्न में माता आई और उन्हीं के आदेश पर सड़क किनारे मंदिर की स्थापना वर्ष 1952 में की गई थी. मूल मंदिर, जो कि सड़क से कुछ दूरी पर स्थित है, से कुछ दूरी पर सड़क किनारे एक मंदिर का निर्माण गांव वालों ने मिलकर किया.

समय के साथ-साथ मंदिर के संबंध में यह मान्यता बनने लगी कि मां का आशीर्वाद लेने से यात्रा मंगलमय होती है. आज यहां माता बड़ा मंदिर बना है जिसमें अनेक स्थानीय तीज त्यौहार में लोग दर्शन के लिये भी आते हैं. मनोकामना पूर्ण होने पर यहां अक्सर लोग भंडारों का आयोजन भी करते हैं.

कोई निजी वाहन हो या सरकारी वाहन हो मां गुरना के मंदिर सभी की गाड़ी रुकती है. सभी यात्री पिठ्याँ (टीका) लगाते हैं और प्रसाद ग्रहण कर ही आगे का सफ़र तय करते हैं.

मंदिर से कुछ दूरी पर पानी का एक धारा है जिससे वाहन चालक और यात्री ठंडा पानी भरा करते हैं. इसी के साथ लगे कुछ छोटे-छोटे होटल भी हैं. इन होटल में मिलने वाले आलू के गुटके एक दशक पहले तक बड़े ख्याति प्राप्त थे.

देखिये मां गुरना के मंदिर की तस्वीरें – (सभी तस्वीरें नरेंद्र सिंह परिहार ने भेजी हैं)

 

मूलरूप से पिथौरागढ़ के रहने वाले नरेन्द्र सिंह परिहार वर्तमान में जी. बी. पन्त नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ हिमालयन एनवायरमेंट एंड सस्टेनबल डेवलपमेंट में रिसर्चर हैं.

वाट्सएप में काफल ट्री की पोस्ट पाने के लिये यहाँ क्लिक करें. वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री के फेसबुक पेज को लाइक करें : Kafal Tree Online

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Girish Lohani

Recent Posts

क्या उत्तराखंड, पारिस्थितिक वहन क्षमता को लागू कर सकता है?

हाल ही में मेरी उत्तराखंड यात्रा, हरिद्वार, मसूरी, देहरादून और टिहरी, ने मुझे यह गहरा एहसास कराया कि…

19 hours ago

कानिया के प्रेम में दीवानी सुबनी : लोककथा

रात ढलते ही जब सुबनी और लाली दोनों बहनें पानी भरने के लिए गाँव के…

1 week ago

चीड़ की छाल को कलाकृतियों का रूप दे रहा एक कलाकार

चीड़ के जंगल उत्तराखण्ड के कुमाऊं व गढ़वाल क्षेत्र में 900 से 1500 मीटर की ऊंचाई पर बहुतायत में पाये…

1 week ago

मेरी यादों का पहाड़ : एक बहुआयामी किताब

2013 सन् में नेशनल बुक ट्रस्ट ने देवेन्द्र मेवाड़ी की किताब 'मेरी यादों का पहाड़' छापकर सराहनीय…

1 week ago

पहाड़ की पुकार जो खींच ले गई मुझे

नौ साल बाद पिथौरागढ़ जा रहा था. पिछले कुछ वर्षों में जब भी छुट्टी मिली, बेटी…

2 weeks ago

‘मनिला डांडे की देवी मां आज बहुत उदास है

देवी मां उदास है परन्तु परलोक गया पुत्र आज भी यादों में आकर उसको हिम्मत…

2 weeks ago