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एक समय था जब भाबर में बसने के लिए सरकारी सहयोग मिलता था

यहां भाबर के लिए एक शब्द अक्सर प्रयोग में लाया जाता है भबरी जाना, यानि खो जाना. यह बात पहले भी कही जा चुकी है कि इस खो जाने की प्रक्रिया को भबरिया कहा जाने लगा. ऐसा शब्द किसी भी शब्दकोश में नहीं मिलेगा लेकिन. इसका अर्थ केवल खो जाना मात्र ही नहीं है. ये शब्द तो बहुत पुराना है लेकिन इसका अर्थ खो जाना मात्र ही नहीं है. यह खो जाना कई अर्थों को अपने में समेट कर चलता है. अपनी सभ्यता,संस्कृति, कला, आचार-व्यवहार इन सब से विरत हो जाना भी खो जाना ही तो है. यह शब्द तो बहुत पुराना है, तब भबरी जाना या खो जाना शायद किसी अन्य अर्थों में प्रयुक्त होता होगा. शायद पहाड़ की परंपराओं, सांस्कृतिक मूल्यों, आचार-व्यवहार से विरत हो जाना रहा होगा. यहां के बीहड़ जंगलों में एक दिशाहीनता में भटक जाना होगा. व्यक्ति और ना जाने क्या-क्या होता होगा. लेकिन यदि इस शब्द का असली अर्थ तलाशना हो तो वह आज तलाशा जा सकता है. सचमुच आज हल्द्वानी में आदमी भबरी गया है, खो गया है.  Forgotten Pages from the History of Haldwani- 37

एक समय था जब यहां मुफ्त में बसने के लिए सरकारी सहयोग मिलता था. जमीन में चाहरदीवारी करवा दी जाती थी मकानों की तैयारी के लिए मेहनताना मिलता था. चारों ओर लहराते आम अमरूद के बगीचे थे. बाद में लीची भी इन बागानों में झूलने लगी. शहर और उसके आसपास बगीचे और साल, शीशम, खैर, पाकड़, वटवृक्ष के अलावा कई अमूल्य वनस्पतियों से आच्छादित था यह क्षेत्र. बरेली रोड अब्दुल्लाह बिल्डिंग के बाद रामपुर रोड पीपुल्स कॉलेज के बाद कालाढूंगी रोड मुखानी नहर के बाद हीरानगर शीशम बाग और मुखानी ने से काठगोदाम तक सब जंगल ही तो था. बीच-बीच में गांव और उन गांवों के बीच से जाती कल-कल, छल-छल करती नहरें. हीरा नगर से पश्चिम की ओर वाली नहर में सिंचाई विभाग की एक पनचक्की थी. पीयरसनगंज. भोटिया पड़ाव, दोनहरिया के पास हल्दुचौड़ तथा अन्य स्थानों में पनचक्कियां थी, जिन्हें ठेके पर दिया जाता था. तब गांवों में पनचक्की में पिसे आटे से हाथ की चक्की का आटा अच्छा माना जाता था और शहर में मिल के आते से पनचक्की का आता अच्छा माना जाता था. आईटीआई वाले एरिया की ओर बह रही नहर के दोनों ओर घनी झाड़ियां, बड़े वृक्ष व आम, लीची, कटहल के बगीचे थे. इस नहर के किनारे घूमने में बड़ा ही आनंद मिलता था.

नहर के किनारे झाड़ियों में कहीं-कहीं कौंच की झाड़ियाँ भी हुआ करती थी. इसमें फलियां होती हैं, फलियों के अंदर बीज लगता है. बीज बहुत सख्त होता है, उसे तोड़ कर पानी के साथ पत्थर में घिसने से गोंद की तरह चिपचिपा पदार्थ निकलता है. इसका बीज बहुत पौष्टिक माना जाता है. कहा जाता है कि राजा-महाराजा, बादशाह लोग इसकी खीर खाया करते थे. इसकी गिनती वीर्यवर्धक औषधियों में की जाती है. लेकिन इसकी फलियों के बाहर जो रोयें चिपके रहते हैं वह बहुत खतरनाक हुआ करते हैं. यदि भूलवश या हवा के साथ उड़ कर यह रोयें शरीर से छू जाएं तो असहनीय खुजली शुरू हो जाती है. खुजलाने के बाद हाथ जहां-जहां लगता है वहीं खुजली शुरू हो जाती है.

लाजवंती छुईमुई की झाड़ियां भी काफी होती थी. लाजवंती के बीज भी औषधि गुण वाले होते हैं. आईटीआई से पहले जंगलात की एक नर्सरी भी हुआ करती थी. इस नर्सरी के चारों ओर चंदन के पेड़ भी बहुत थे. आईटीआई पहले बरेली रोड में गौजाजाली के निकट थी जो बाद में यहां स्थानांतरित हुई. मुखानी से आगे हरे-भरे खेत व बगीचे थे. दयाल कॉलोनी, बसंत विहार, कृष्णा कॉलोनी, आनंद विहार, अशोक विहार, दुर्गा कॉलोनी, चंद्रावती कॉलोनी, श्याम गार्डन, जेके पुरम, रौतेला कॉलोनी, रूपनगर, जज फार्म की अनेक गलियों के बाद डहरिया, छडायल मानपुर तक बसी अलीशान कॉलोनियों ने हरियाली को लील लिया है और नहर के किनारे घूमने का आनंद ना केवल अतीत का हिस्सा बन गया है बल्कि काठगोदाम से सुशीला तिवारी अस्पताल तक इस नहर को पटालों से ढककर चौड़ा रास्ता तैयार कर दिया गया है. Forgotten Pages from the History of Haldwani- 37

(जारी)

पिछली कड़ी : जब नैनीताल की बहुमूल्य विरासत जलकर खाक हो गयी

स्व. आनंद बल्लभ उप्रेती की पुस्तक हल्द्वानी- स्मृतियों के झरोखे से के आधार पर

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Girish Lohani

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