Featured

माफ़ करना हे पिता – 3

(पिछली क़िस्त: माफ़ करना हे पिता – 2)

एक दिन सुबह के वक्त मैं खेलता हुआ मकान मालिक के आँगन में जा पहुँचा. सामने रसोई में श्रीराम कुछ तल-भुन रहा था और मुझ से भी बतियाता जा रहा था. तभी अचानक न जाने क्या हुआ कि आँगन में एक ओर बने गुसलखाने का दरवाजा भड़ाम से आँगन में आ गिरा. भीतर मकान मालिक की बहन नहा रही थी. दरवाजा गिरते ही वह उकड़ूँ अवस्था में न जाने किस जनावर की सी चाल चलती तथाकथित कोने में खिसक गयी- श्रीराम को पुकारती हुई. श्रीराम ने रसोई से निकल कर श्रीकृष्ण की सी हरकतें कीं. उसने दोनों हाथों से टिन का दरवाजा उठाया, उसकी आड़ से गुसलखाने के भीतर एक भरपूर नजर डाल कर दरवाजा चौखट से यूँ टिका दिया, जैसे लाठी दीवार से टिकाते हैं. आइये दो मिनट का मौन धारण कर उस लड़की की हिम्मत को दाद दें. ऐसे गुसलखाने कई बार देखे कि जिनके भीतर जाते ही गूँगा आदमी भी गवैया बन जाता है. मगर वैसा चौखट से जुदा, कील-कब्जों से सर्वथा विरक्त दरवाजे वाला बाथरूम फिर देखने में नहीं आया और न नहाती हुई लड़की ही फिर कभी दिखी. समय भी कई बार अजीब हरकत कर बैठता है. अब भला लॉलीपॉप की उम्र के बच्चे को शेविंग किट भेंट करने की क्या तुक है ?

शाम का वक्त है. पिता मेरा हाथ थामे द्वारका स्टोर बाजार (शायद यही नाम था) की ओर जा रहे हैं. कंधे में झोला है, झोले में तेल के लिये डालडा का डमरूनुमा डब्बा. राशन लेने निकले हैं. दुकान में भीड़ है. पिता उधार वाले हैं,उनका नम्बर देर तक नहीं आता. मैं काउण्टर से सट के खड़ा हूँ. खड़े-खड़े टाँगें दुखने लगी हैं. छत से टँगे तराजू में जब सामान तोल कर उतारा जाता है तो उसका एक पल्ला पेंडुलम की तरह झूलता है और मैं हर बार अपना सर बचाने के लिये पीछे हटता हूँ. यह दृश्य उधार वाले ग्राहक के प्रति दुकानदार की नापसंदीदगी के प्रतीक के रूप में मुझे खूब याद है. यह बिम्ब भी अकसर कोंचता है. तगादा सा करता हुआ यादों के मुहाफिजखाने में कहीं मौजूद है. इसका भी कोई इस्तेमाल नहीं हो पाया.

पिता दफ्तर से दो-एक किलो रद्दी कागज उड़ा लाये हैं, जिन्हें बेच कर कुछ पैसे मिल जायेंगे. शाम के झुरमटे में साइकिल में मुझे साथ लिये कबाड़ी के पास जा रहे हैं. साइकिल दुकान के बाहर खड़ी कर मेरा हाथ थामे पानी कीचड़ से बचते आगे बढ़ते हैं कि एकाएक बड़ी फुर्ती से मुझे गोद में उठा कर साइकिल की ओर भागने लगते हैं. बहुत देर तक ताबड़तोड़ साइकिल चलाते रहते हैं. साँसें बुरी तरह फूली हुई हैं. मैं कुछ भी समझ नहीं पाता, डरा सहमा सा साइकिल का हैंडल कस कर पकड़े हूँ. बाद में पिता बताते हैं कि कबाड़ी की दुकान में सी.आइ.डी. का आदमी खड़ा था ताकि उन्हें सरकारी कागज बेचते रंगे हाथ पकड़ ले. पिता के मुताबिक साइकिल ने इज्जत रख दी, वर्ना जेल जाना तय था. उन्हें अपनी साइकिल पर बड़ा नाज था. बकौल उनके वह मामूली साइकिल नहीं थी, रेलवे की थी. रेलवे की साइकिल का मतलब अब वही जानें. जहाँ तक मुझे याद है, वह साइकिल उनकी अपनी नहीं थी,किसी की मार रखी थी.

देहरादून की यह यादें सन 1971 के आस-पास और उसके कुछ बाद की हैं. समय का अंदाज एक धुँधली सी याद के सहारे लगा पाता हूँ. शाम को रोशनदानों में बोरे ठूँस दिये जाते थे और कमरे के अंदर जलती हुई ढिबरी को गुनाह की तरह छिपाया जाता. बाहर घटाटोप अंधेरा. यकीनन उस समय सन 71 की भारत-पाक जंग चल रही होगी. उसी के चलते अंधेरे का राज था – ब्लैक आऊट. रोशनी से परहेज जंग में ही किया जाता है. न सिर्फ दिये की रोशनी से बल्कि दिमाग पर भी स्याह गिलाफ चढ़ा दिये जाते हैं. जो कोई अपने दिमाग पर पर्दा न डाले, युद्ध के वास्तविक कारणों, जो कि अमूमन कुछ लोगों के अपने स्वार्थ होते हैं, पर तर्कसंगत बात करे, वह गद्दार हैं. सामान्य दिनों में देश को अपनी माँ कह कर उसके साथ बलात्कार करने वाले अपनी माँ के खसम उन दिनों खूब मात्र भक्ति का दिखावा करते हैं.

माँ बीमार है, अस्पताल में भर्ती है. पिता दफ्तर, अस्पताल और घर सब जगह दौड़े फिर रहे हैं. मैं दिन भर घर में छोटे भाई के साथ रहता हूँ. यह भाई कब कहाँ से टपका, मुझे याद नहीं. मैं खुद बहलाये जाने की उम्र का हूँ, उसे नहीं बहला पाता. उसे झुलाने, थपकियाँ देने के अलावा बोतल से दूध पिलाता हूँ और अपनी समझ के मुताबिक पानी में चीनी घोल कर देता हूँ. शहद वाले निप्पल से कई बार बहल भी जाता है. उसे बहलाते हुए अकसर मुझे नींद आ जाती है. रोते-रोते थक कर वह भी सो जाता है. गर्मियों के दिन, दरवाजे चौखट खुले हुए.

शाम को पिता दफ्तर से लौट कर खाना बनाते हैं, फिर छोटे भाई को गोद में लिये एक हाथ से दरवाजे में ताला लगाने का करतब करते हैं. कंधे में बिस्तरा, झोले में खाना और चाय का सामान, एक हाथ में स्टोव लिये मुझे साथ लेकर पैदल अस्पताल जाते हैं. अस्पताल के बरामदे में लकड़ी की दो बेंचों के मुँह आपस में जोड़ कर बिस्तरा बिछाया जाता है, जिसमें दोनों बच्चे सो जाते हैं. पिता रात भर माँ और हमें देखते हैं. यह सिलसिला न जाने कितने दिन, लेकिन कई दिनों तक चला. दून अस्पताल की धुँधली सी यादें हैं. गेट के बाहर सड़क में खाली शीशियाँ बिका करती थीं. तब अस्पताल में अनार के जूस सा दिखने वाला एक घोल भी मरीज को मिलता था, जिसके लिये लोग शीशी खरीदते थे. समझदार लोग शीशी घर से लाते, दस-बीस पैसे की बचत हो जाती. यह घोल मिक्सचर कहलाता और हर मर्ज में मुफीद मान कर दिया जाता था. मिक्सचर स्वाद में शायद कसैला सा होता था लेकिन मीठा तो हरगिज नहीं.

(जारी)

 

शंभू राणा विलक्षण प्रतिभा के व्यंगकार हैं. नितांत यायावर जीवन जीने वाले शंभू राणा की लेखनी परसाई की परंपरा को आगे बढाती है. शंभू राणा के आलीशान लेखों की किताब ‘माफ़ करना हे पिता’  प्रकाशित हो चुकी  है. शम्भू अल्मोड़ा में रहते हैं और उनकी रचनाएं समय समय पर मुख्यतः कबाड़खाना ब्लॉग और नैनीताल समाचार में छपती रहती हैं.

अगली क़िस्त : माफ़ करना हे पिता 4

वाट्सएप में पोस्ट पाने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री
हमारे फेसबुक पेज को लाइक करें: Kafal Tree Online

काफल ट्री वाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिये यहाँ क्लिक करें: वाट्सएप काफल ट्री

काफल ट्री की आर्थिक सहायता के लिये यहाँ क्लिक करें

Kafal Tree

Recent Posts

बजट में युवाओं के लिए योजना का ढोल है पर उसकी गमक गुम है

उत्तराखंड के आय व्यय लेखे 2026-27 को समझते हुए यह आशंका उभरती है की क्या…

2 weeks ago

जापान में आज भी इस्तेमाल होती है यह प्राचीन भारतीय लिपि

भाषाओं का इतिहास हमेशा रोचक रहा है. दुनिया की कई भाषाओं में ऐसे शब्द मिलते…

2 weeks ago

आज है उत्तराखंड का लोकपर्व ‘फूलदेई’

उत्तराखंड को केवल 'देवभूमि' ही नहीं, बल्कि उत्सवों की भूमि कहना भी बिल्कुल सटीक होगा. यहाँ साल भर…

2 weeks ago

द्वी दिना का ड्यार शेरुवा यौ दुनीं में : अलविदा, दीवान दा

‘यौ डाना कौ पारा, देख्यूंछ न्यारा-न्यारा’ दीवान सिंह कनवाल की आवाज़ में ये गीत पहली कुमाऊनी फ़िल्म…

3 weeks ago

हिमालय को समझे बिना उसे शासित नहीं किया जा सकता

कुमाऊं-गढ़वाल हिमालयी क्षेत्र के लिए भिन्न प्रशासन, विशेष नीति या मैदानी भागों से भिन्न व्यवस्था…

3 weeks ago

पहाड़ों का एक सच्चा मित्र चला गया

बीते दिन सुबह लगभग चार बजे एक ऐसी खबर आई जिसने कौसानी और लक्ष्मी आश्रम…

3 weeks ago